सोशल मीडिया ने लोगों की भावनाओं को और विस्तार देने के बजाय और संकुचित किया।
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हकीकत यह है कि सोशल मीडिया ने लोगों की भावनाओं को और विस्तार देने के बजाय और संकुचित किया। जिसकी इन्तेहा थी कि एक जरा सा वायरस आया तो पहले से ही बंद दिल के दरवाजों पर हमने और मोटे-मोटे ताले डाल लिए। बिस्तरों में दुबक गए या पाजामों में मुंह गड़ाकर संतुष्ट हो गए कि अब संकट अपने आप भाग जाएगा। करीबियों का हाल-चाल जाना, लेकिन जैसे ही मदद करने की मांग हुई, बहाने बनाकर खिसक लिए। फिर फोन बंद, संपर्क खत्म।
बहुत पहले पढ़ी और इंटरनेट आने से बहुत-बहुत पहले ही लिख दी गई धूमिल की कविता का सच्चा सार मुझे कोरोना ने समझाया - प्यार, घनी आबादी वाली बस्तियों में मकान की तलाश है...और आज यह भी कि उन्होंने की हकीकत को यूं क्यूं लिखा - हां, अगर हो सके तो बगल के गुजरते हुए आदमी से कहो - लो, यह रहा तुम्हारा चेहरा, यह जुलूस के पीछे गिर पड़ा था...
नालों में फेंक दी गईं औषधियां, इस्तेमाल की हुईं बीमारियों की पहचान करने वाली किट्स और नदियों में बहा दी गईं संक्रमितों की लाशें बता रही हैं कि यह वह मानव नहीं है, जिसे बनाकर प्रकृति ने स्वयं को इतना संपूर्ण महसूस किया कि उससे आगे कुछ सोच ही नहीं पाई। कर ही नहीं पाई। यह हम कौन से परिवर्तन से गुजरकर कहां आ गए और कोई विचार क्यों नहीं होता कि हम वही संस्कृति हैं जो सोचा करते थे- सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया। क्यों डॉक्टरों से लेकर गली-कूचे तक में पैशाचिक प्रवृत्ति घर करती जा रही है- सर्वे भवन्तु दु:खिन:, सर्वे सन्तु रोगामया...
मैं अब समझ चुका हूं कि धूमिल ने क्यों लिखा - उसे मालूम है कि शब्दों के पीछे/ कितने चेहरे नंगे हो चुके हैं/ और हत्या अब लोगों की रुचि नहीं- आदत बन चुकी है/ वह किसी गंवार आदमी की ऊब से/ पैदा हुई थी और/ एक पढ़े-लिखे आदमी के साथ/ शहर में चली गई... और प्रमुथ्यु चट्टानों के बीच बंधा दिल को नोचे जाने से नहीं, मानवता के कुकर्मों से दहलकर और जोर से चिल्ला रहा है - ये इंसान वास्तव में आग के काबिल नहीं था। इंसान अपने पाप की आग से इस प्रकृति को भस्म कर देगा, मैंने सोचा नहीं था। देवताओं अपनी आग वापस ले लो, कहीं इसमें मानव ही भस्म ना हाे जाए...
शायद कोई भी ऐसा भविष्य नहीं चाहता। लेकिन, सदी की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि कोई भी इस पर विचार करने और संबधित उपाय योजनाओं पर अमल करने के लिए कहीं से कहीं तक चिंतित और विचारमग्न दिखाई नहीं देता। मैंने कोरोना के आने पर सोचा था कि अब परिवार जुड़ेंगे, नाते जुड़ेंगे, मुहल्ले जुड़ेंगे, नगर जुड़ेंगे, देश जुड़ेंगे। लेकिन, एकाकीपन से और मदमस्त होकर इंसान सिर्फ और सिर्फ स्वयं का विचार कर ऐसा विचारकुंद हो जाएगा, कल्पना से परे है।
मैं हताश हूं, पर निराश नहीं। क्योंकि चंद लोग भीड़ से अलग चलते हुए मानव सेवा में तन-मन-धन से जुटे हुए हैं। वक्त बीता नहीं है। सही राह पर चलने में देरी नहीं हुई है। मैं भी यथाशक्ति प्रयासों को अमल में लाने के साथ आह्वान तो कर ही सकता हूं - जागो, मानव जागो! स्वयं की शक्तियों को पहचानो। जानो, किस तरह अकेली दुर्गा ने महिषासुर को संपूर्ण सेना सहित काल के गाल में पहुंचा दिया था। जानो, राम ने किस तरह अजेय रावण को धूल में मिला दिया।
क्या आप यह आह्वान नहीं कर सकते?
मन में ही सही, करके तो देखिए, हो सकता है आपकी करुणामयी पुकार आसमान की छाती फाड़कर मानवता का संदेश हर ओर बरसा दे...
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