प्रियंका भी नहीं लगा पाईं कांग्रेस की नैया पार।
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सीटों में तब्दील नहीं हो पाई प्रियंका की मुखरता
सियासत के मैदान में पूरी तरह से आने के बाद प्रियंका गांधी ने मुखर अंदाज अपनाया। वह हर मौके और मुद्दे पर न सिर्फ अपनी आवाज उठाती रहीं, बल्कि कई अवसरों पर सत्ता के खिलाफ संघर्ष करती भी नजर आईं।
हाथरस रेप केस में पीड़ित परिवार के साथ उनकी मुलाकात काफी चर्चा में रही, क्योंकि योगी सरकार ने उन्हें वहां जाने से रोकने के लिए एक तरह से पूरी मशीनरी ही लगा दी थी। सीएए और किसान आंदोलन के दौरान भी वह सक्रिय रहीं। उन्होंने महिला सुरक्षा और रोजगार के मुद्दे को भी मुखरता से उठाया।
विधानसभा चुनाव में प्रिंयका गांधी ने चालीस फीसदी महिलाओं को टिकट देने का एलान किया था। उन्होंने कुल 144 महिला प्रत्याशी मैदान में उतारा। इनमें से सिर्फ एक प्रत्याशी रामपुर खास विधानसभा क्षेत्र से आराधना मिश्रा ही जीत सकीं। प्रियंका गांधी ने टिकट देने से पहले ‘लड़की हूं लड़ सकती हूं’ पंच लाइन के साथ एक मीडिया कैंपेन भी चलाई थी। शुरुआत में इसकी खासी चर्चा भी रही, लेकिन उनकी यह कैंपेन धरातल पर नहीं उतर सकी। नतीजे में 137 प्रत्याशी अपनी जमानत भी नहीं बचा सकीं।
आधी आबादी को सिसायत के मंच पर लाने की प्रियंका की यह सोच तब सीटों में तब्दील हो सकती थी, जब यह कैंपेन महिला वोटरों तक जा पाती।
कई स्तर पर कांग्रेस की लिए चुनौती
देश में मीडिया और सोशल मीडिया का सबसे बेहतर अगर किसी पार्टी ने इस्तेमाल किया है तो वह है बीजेपी। पीएम मोदी कोई बात कहते हैं तो उसे गांव-मोहल्ले तक आम आदमी तक पहुंचाने की जिम्मेदारी उनके कैडर ही पूरी करते हैं। भाजपा के कार्यकर्ता एक-एक बात का तोड़ लोगों को कुछ इस तरह से समझाते हैं कि पढ़ा-लिखा आदमी भी कुछ देर के लिए जवाब नहीं दे सकेगा।
कुछ महीने पहले एक प्राइवेट कार से लखनऊ जाते वक्त साथ चल रहे मीडिया के एक मित्र ने ड्राइवर से कहा कि पेट्रोल बहुत महंगा हो गया है। कैसे गुजारा करते हो? ड्राइवर का जवाब था, ‘साहब विकास चाहिए तो महंगा पेट्रोल तो लेना ही होगा।’ है कोई जवाब!
जाहिर बात है उस ड्राइवर को यह बात इतनी ही सहजता से समझाई गई और उसने इसे भरपूर ग्रहण भी कर लिया। कांग्रेस को भी ऐसे ही मजबूत कार्यकर्ता की जरूरत है जो उसकी बातों को घर-घर सहजता के साथ पहुंचा सके।
कभी कांग्रेस इस देश की सबसे बड़ी कैडर वाली पार्टी हुआ करती थी। आजादी के बाद कांग्रेस के पास बहुत मजबूत कैडर और संगठन था। पंडित नेहरू के बाद इंदिरा गांधी ने कैडर बनाने और संगठन को मजबूत बनाए रखने के लिए ज्यादा प्रयास नहीं किए। फिर जेपी आंदोलन के बाद कांग्रेस के कैडर में बिखराव हुआ। फिर उसे दुरुस्त करने की कोई कोशिश नहीं हुई।
पंडित नेहरू के लगाए पेड़ के फल कांग्रेस कुछ दशक पहले तक खाती रही, लेकिन खुद कोई पेड़ नहीं लगाया। यही हाल पार्टी के अनुषांगिक संगठनों का हुआ। एनएसयूआई का एक तरह से वजूद ही खत्म हो गया। न युवा दल बचा है और न किसान संगठन ही सक्रिय है। महिला संगठन का भी कुछ ऐसा ही हाल है।
आज बीजेपी की जो ताकत है, उसके पीछे उसकी सांगठनिक पकड़ भी बड़ी वजह है, जो कांग्रेस के पास नहीं है।
कुछ साल पहले यूपी कांग्रेस ने बड़े लेवल पर सीपीआईएमएल (लिबरेशन) से जुड़े लोगों को पार्टी से जोड़ा है। इसकी शुरुआत तीन साल पहले जेएनयू के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष संदीप सिंह के साथ हुई थी। बताते हैं कि प्रियंका गांधी उन्हीं की सलाह पर फैसले लेती हैं। संदीप सिंह के बाद यूपी कांग्रेस में वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग बड़ी संख्या में लाए गए। लगा जमीनी स्तर पर बड़े बदलाव नजर आएंगे। कांग्रेस पार्टी धरातल पर उतर कर मजबूती से काम करेगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
कहीं प्रियंका के झाड़ू देने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल किया जाने लगा तो कहीं सीएए आंदोलन के दौरान उनका स्कूटर पर पीछे बैठा हुआ वीडियो वायरल किया जाने लगा। यह वीडियो चर्चा जरूर बनाते हैं, लेकिन वोट आधार नहीं। जमीन से कट जाने की वजह से जिस तरह के कम्यूनिस्ट पार्टी हाशिये पर चली गई, उसी कम्यूनिस्ट पार्टी से आए थके-हारे लोग कांग्रेस का कितना और किस तरह से भला करेंगे, इसके नतीजे सामने आने लगे हैं।
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