चुनाव सुधार की दिशा में सबसे पहले 1990 में दिनेष गोस्वामी कमेटी का गठन हुआ।
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चुनाव सुधार हुए मगर चुनाव आयोग में सुधार नहीं हुआ
लोकतंत्र की मजबूती और उसके लिए चुनाव व्यवस्था की सुचिता के लिये काफी पहले से बहस चलती रही है और उन बहसों के फलस्वरूप चुनाव सुधार हेतु कमेटियों का गठन भी होता रहा है और समितियों की सिफारिशों पर कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते रहे हैं। जैसे मतदाताओं की न्यूनतम उम्र सीमा 18 वर्ष करना, फोटो पहचान पत्र की व्यवस्था, ईवीमए मशीनों का चलन, मतदान से पहले चुनावी सर्वेक्षणों पर रोक और नोटा की शुरुआत आदि कई नई व्यवस्थाएं शुरू हुईं मगर चुनाव आयोग को निष्पक्ष और सरकार के नियंत्रण से मुक्त करने की दिशा में प्रयास नहीं हुए।
चुनाव सुधार की दिशा में सबसे पहले 1990 में दिनेश गोस्वामी कमेटी का गठन हुआ। इस समिति ने सिफारिश की थी कि राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग के साथ पंजीकरण कराना चाहिए और अपने धन के स्रोतों का खुलासा करना चाहिए।
इसने यह भी सिफारिश की कि चुनावों में धन और बाहुबल के इस्तेमाल पर रोक लगाई जानी चाहिए। गोस्वामी समिति के बाद 1998 में इंद्रजीत गुप्त समिति ने सिफारिश की कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग के पास अधिक शक्तियां होनी चाहिए। इसने यह भी सिफारिश की कि राजनीतिक दलों को अपने वार्षिक लेखा परीक्षित खातों को चुनाव आयोग को प्रस्तुत करने की आवश्यकता होनी चाहिए। इसके बाद 2001 में संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए गठित राष्ट्रीय आयोग ने सिफारिश की कि लोकसभा (संसद के निचले सदन) और राज्य विधानसभाओं के चुनावों में आनुपातिक प्रतिनिधित्व की प्रणाली शुरू की जानी चाहिए।
इसके बाद 2015 में विधि आयोग ने चुनाव में धन और बल के इस्तेमाल को अपराधिक कृत्य मानने की सिफाारिश की। उसके बाद 2017 में एक विशेषज्ञ कमेटी ने इवीएम के साथ वीवीपैट की व्यवस्था की सिफारिश की। मगर अब तक निर्वाचन आयोग को सरकार के चंगुल से मुक्त करने की बात किसी ने नहीं की।
निर्वाचन आयोग का गठन
संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत भारतीय चुनाव आयोग की स्थापना 25 जनवरी 1950 को की गई थी। भारत में संसद और राज्य विधान मंडलों के निर्वाचन और राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति कार्यालय के निर्वाचन आयोजित करने तथा निर्वाचन सूचियां तैयार करने के पर्यवेक्षण, निर्देशन और नियंत्रण का कार्य निर्वाचन आयोग को सौंपा गया है। यह एक स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकरण है।
आयोग में वर्तमान में एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त होते हैं। जब यह पहले पहल 1950 में गठित हुआ तब से और 15 अक्टूबर, 1989 तक केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त सहित यह एक एकल सदस्यीय निकाय था। 16 अक्टूबर, 1989 से 1 जनवरी, 1990 तक यह आर. वी. एस. शास्त्री (मु.नि.आ.) और निर्वाचन आयुक्त के रूप में एस.एस. धनोवा और वी.एस. सहगल सहित तीन सदस्यीय निकाय बन गया।
2 जनवरी, 1990 से 30 सितम्बर, 1993 तक यह एक एकल सदस्यीय निकाय बन गया और फिर 1 अक्टूबर, 1993 से यह तीन सदस्यीय निकाय बन गया। मुख्य निर्वाचन आयुक्त समेत सभी सदस्यों की नियुक्ति केन्द्र सरकार अपनी इच्छा और सुविधानुसार करती है, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद प्रधानमंत्री, लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीष की कमेटी आयोग के सदस्यों का चयन करेगी।
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