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Coalition Politics: एक चर्चित किताब के बहाने गठबंधन की राजनीति के आयामों की तलाश

सार

Coalition Politics: बिहार में महागठबंधन की वापसी के बाद एक बार फिर गठबंधन की राजनीति की ताकत पर चर्चा तेज हो गई है। अब बात 2024 की फिर से होने लगी है। यह धारणा बना दी गई है कि 2024 में भी भाजपा को आने से कोई नहीं रोक सकता और खासकर जबतक मोदी हैं, उनकी स्वीकार्यता को चुनौती नहीं दी जा सकती...
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Coalition Politics: वीपी सिंह- चंद्रशेखर - फोटो : Amar Ujala (File Photo)
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विस्तार
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आज न तो विश्वनाथ प्रताप सिंह हैं, न चंद्रशेखर, न चौधरी चरण सिंह और न गठबंधन की राजनीति के कोई ऐसे पुरोधा जिनके भीतर सबको साथ लेकर चलने का माद्दा है। मुलायम सिंह यादव जरूर हैं, लेकिन अब उनकी उम्र और सेहत के बारे में सब जानते हैं। लालू प्रसाद यादव लंबे समय तक जेल में रहने के बाद और खराब सेहत की वजह से अब पूरी तरह तेजस्वी यादव पर निर्भर हैं। ऐसे में बिहार के घटनाक्रमों के बाद फिर से महागठबंधन की ताकत को लेकर जो चर्चाएं तेज़ हुई हैं, उसके पीछे के गणित को समझना जरूरी है। कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार 2024 के लिए इस गठबंधन की धुरी की तरह काम कर सकते हैं। ममता बनर्जी को लेकर भी अटकलें लगाई जा रही हैं। ऐसे में गठबंधन की राजनीति को लेकर और खासकर तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की राजनीतिक प्रतिभा को लेकर लिखी गई जाने-माने पत्रकार संतोष भारतीय की चर्चित किताब को पढ़ना और समझना ज़रूरी लगता है।  

2024 में मोदी या भाजपा के विकल्प की चर्चा तेज़

वैसे तो सियासत के दांवपेंचों पर लिखी कई किताबों पर लंबी चौड़ी बात हो सकती है और होती भी रहती है लेकिन संतोष भारतीय की किताब ‘वीपी सिंह, चंद्रशेखर, सोनिया गांधी और मैं’ की एक बार फिर से आज के संदर्भ में चर्चा इसलिए जरूरी हो गई है क्योंकि एक बार फिर महागठबंधन और 2024 में मोदी या भाजपा के विकल्प की चर्चा तेज़ हो गई है। बिहार की सियासत में जो नई हलचल है और जिस तरह एक महागठबंधन ने देश की सबसे बड़ी और मजबूत सत्ताधारी पार्टी भारतीय जनता पार्टी को चुनौती दी है, उसमें संतोष जी की किताब के कुछ संदर्भ गठबंधन की राजनीति के मायने भी समझाते हैं और इसके फायदे नुकसान की तह तक पहुंचने की कोशिश करते हैं।   

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पहले ये जानने की कोशिश करते हैं कि संतोष जी की पांच पुस्तकों के बाद आई यह छठी पुस्तक ही इतनी चर्चा में क्यों रही। संतोष जी खुद बताते हैं कि इसकी 10 हजार से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं और खासकर युवाओं में इसे पढ़ने को लेकर खासा उत्साह दिखा है। पुस्तक में जिस तरह सियासत के जोड़तोड़ के साथ उस दौर के नेताओं के कामकाज की शैली, सौम्यता और सबको साथ लेकर चलने के साथ ही देश के बारे में सोचने की चिंता का जिस तरह जिक्र आया है, उससे आज के दौर के नेताओं को सीखने समझने की जरूरत है। दरअसल वी पी सिंह एक ऐसे सियासी शिल्पकार थे जिन्होंने करीब तीन दशकों तक कभी परदे के आगे तो कभी पीछे से गठबंधन की राजनीति के तौर तरीके समझाए। बेशक वह प्रयोग लंबे समय तक कामयाब नहीं हो पाया और इसके पीछे कई वजहें रहीं, लेकिन आज के दौर में गठबंधन की राजनीति ही मौजूदा सत्ता की निरंकुशता का सामना कर सकती है या मजबूत विकल्प बन सकती है।    

संतोष भारतीय ने ये कोई पहली किताब नहीं लिखी है। इससे पहले संतोष जी पांच पुस्तकें लिख चुके हैं – निशाने पर – समय, समाज और राजनीति, पत्रकारिता – नया दौर, नए प्रतिमान, चुनाव रिपोर्टिंग औऱ मीडिया, दलित अल्पसंख्यक सशक्तिकरण और कमज़ोर दुनिया का रास्ता। लेकिन इन पांचों की इतनी चर्चा नहीं हुई जितनी उनकी छठी किताब की हुई। वजह साफ है – आज मोदी युग में जब अन्य राजनेताओं की बात होती है तो वह बहुत सतही अंदाज़ में होती है, सुनी सुनाई और इधर उधर से जुटाई गई जानकारियों के आधार पर होती है, लेकिन संतोष भारतीय की इस किताब में हर जगह वह खुद मौजूद हैं।
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दरअसल संतोष भारतीय ये बताने की भी कोशिश करते हैं कि भारतीय राजनीति में गठबंधन की राजनीति और कांग्रेस विरोधी लहर कैसे उठी, बही और बदलाव के रास्ते लेकर आई। बेशक ये सारे प्रयोग उतने सफल नहीं हो पाए लेकिन वीपी सिंह, चंद्रशेखर, चरण सिंह, मोरारजी देसाई और उस दौर के नेताओं ने कितने उतार चढ़ावों के बाद सत्ता के खिलाफ एक बड़े और असरदार गठबंधन की नींव रखी थी। जाहिर है इसकी सबसे बड़ी और मजबूत शुरुआत 1974 आंदोलन के बाद जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने की और 1975 में इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाकर इसे और उर्वर बना दिया। जनता पार्टी बनी और 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी। ये घटनाएं एक संदर्भ के तौर पर इस्तेमाल की गई हैं क्योंकि तब संतोष भारतीय जेपी आंदोलन का हिस्सा थे और बाद में पत्रकार बने। लेकिन जिस तरह पत्रकार रहते हुए वी पी सिंह और चंद्रशेखर के साथ उनके रिश्ते रहे और इन नेताओं की राजनीति को उन्होंने समझा, साथ ही इन नेताओं की तोड़ने के नहीं, बल्कि अपने साथ जोड़ लेने के सियासी हुनर को उन्होंने करीब से देखा, इसे बेहद दिलचस्प तरीके से इस किताब में पेश किया गया है।

गठबंधन की राजनीति के मास्टर रहे वीपी सिंह

इस किताब का आखिरी यानी 37वां हिस्सा जो सोनिया गांधी पर आधारित है और 2004 के लोकसभा चुनाव से पहले और बाद की गठबंधन की राजनीति को सामने लाता है, वह कम दिलचस्प नहीं है। कैसे उस दौरान भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की कसरत हुई और कैसे तमाम कांग्रेस विरोधी पार्टियों को भी उनका समर्थन करने के लिए साथ लाया गया। बेशक बाद में सोनिया गांधी ने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की वजह से प्रधानमंत्री बनने से मना कर दिया और अपनी जगह डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना दिया। लेकिन इन सबसे दिलचस्प जो इस किताब में है वह है गठबंधन की राजनीति के मास्टर रहे वीपी सिंह की भूमिका। वीपी सिंह बेशक बहुत कम वक्त तक देश के प्रधानमंत्री रहे, लेकिन परदे के पीछे से गठबंधन की राजनीति को मजबूत करने में उनकी भूमिका अहम रही। खासकर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के बाद जब प्रधानमंत्री के तौर पर लालकृष्ण आडवाणी का नाम चला और उन्हें पीएम इन वेटिंग के तौर पर पेश कर 2004 का चुनाव लड़ा गया, तब दोबारा कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए को सत्ता में लाने में वीपी सिंह की अहम भूमिका रही। कांग्रेस से तमाम विरोधों के बावजूद वीपी सिंह और तमाम नेताओं ने हमेशा ये माना कि विपक्ष हमेशा मजबूत होना चाहिए ताकि सत्ता बेलगाम न हो जाए।

2014 के बाद से जिस तरह देश की राजनीति बदली है, देश में कांग्रेस को खत्म कर देने या छोटे-छोटे दलों का वजूद खत्म कर देने की मुहिम चली है, उसे बीच-बीच में कुछ राज्यों के चुनावी नतीजे झटका देते रहे हैं। हालांकि जिस तरह महाराष्ट्र या अन्य प्रदेशों में भाजपा ने सरकारें बनाई हैं, उससे कई बार विपक्ष के छिन्न भिन्न होने और कांग्रेस के लगातार कमजोर होकर हताश होने का अहसास भी होता रहा है। ऐसे में बिहार में महागठबंधन की वापसी के बाद एक बार फिर गठबंधन की राजनीति की ताकत पर चर्चा तेज हो गई है। अब बात 2024 की फिर से होने लगी है। यह धारणा बना दी गई है कि 2024 में भी भाजपा को आने से कोई नहीं रोक सकता और खासकर जबतक मोदी हैं, उनकी स्वीकार्यता को चुनौती नहीं दी जा सकती।

बिहार के बदलाव के बाद जिस तरह विपक्षी एकता की कोशिशें फिर से तेज हुई हैं। ऐसे में उन नेताओं को संतोष भारतीय की यह किताब जरूर पढ़नी चाहिए, जिसमें गठबंधन की राजनीति करते हुए बड़ा दिल रखने और बेहद संजीदगी के साथ सबको साथ लेकर चलने के कई उदाहरण मौजूद हैं।

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