17वीं लोक सभा के पहले सत्र में शून्यकाल का जितना उपयोग किया गया शायद ही कभी किया गया हो!
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हालांकि, विपक्ष ने इस दौरान सरकार पर बहुमत के घमंड पर जल्दबाजी में विधेयक पारित कराने का आरोप भी लगाया। विपक्ष का कहना था कि संसदीय समितियों का गठन हो और विधेयक सदन में पेश होने के बाद संसदीय समिति के पास भेजे जाएं ताकि विधेयकों पर सही तरह से समीक्षा हो सके। गौरतलब है कि संसदीय समितियों में लगभग सभी दलों के सांसद सदस्य होते हैं।
17वीं लोक सभा के पहले ही सत्र में भाजपा के एजेंडे में सबसे ऊपर रहे जम्मू कश्मीर में धारा 370 को हटाने और तीन तलाक कानून पर संसद की मोहर लग गई। धारा 370 हटाना मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है क्योंकि जनसंघ से भाजपा तक के सफर में यह उनके कार्यकर्ताओं की बीच सबसे बड़ा भावनात्मक मुद्दा था।
17वीं लोक सभा के पहले सत्र में शून्यकाल का जितना उपयोग किया गया शायद ही कभी किया गया हो। 37 दिनों के कामकाज में 1066 मुद्दों को सांसदों ने शून्यकाल के दौरान उठाए जो एक रिकॉर्ड है। 18 जुलाई को तो शून्यकाल 4 घंटे 48 मिनट तक चला और इस दौरान रिकॉर्ड 161 सांसदों को बोलने का मौका मिला।
17वीं लोक सभा के शीतकालीन सत्र में मोदी सरकार ने नागरिकता संशोधन विधेयक को संसद के दोनों सदनों से पारित करवा कर अपना लोहा मनवाया। हालांकि विपक्षी दलों का कहना था कि यह विधेयक मुसलमानों के खिलाफ है और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता है।
नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध यह कहकर किया जा रहा था कि एक धर्मनिरपेक्ष देश किसी के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव कैसे कर सकता है? मोदी सरकार का कहना था कि साल 1947 में भारत पाकिस्तान बंटवारा धार्मिक आधार पर हुआ था। पाकिस्तान,अफगानिस्तान और बांग्लादेश में कई धर्म के लोग रह रहे हैं और उन धार्मिक अल्पसंख्यकों को इन देशों में प्रताड़ित किया जाता रहा है इस वजह से इन तीन देशों के धार्मिक अल्पसंख्यक भारत में शरण लेते रहे हैं इसलिए मानवता के आधार पर भारत को पड़ोसी देशों के इन शरणार्थी धार्मिक अल्पसंख्यकों की मदद करने की जरुरत है।
17वीं लोक सभा का पहला साल संसदीय व्यवस्था के इतिहास में अपने विधायी कामकाज के लिए सुनहरे अक्षरों में याद किया जाएगा!
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प्रश्नकाल संसद की कार्यवाही का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। प्रश्नकाल में सांसद प्रशासन और सरकार के कार्यकलापों के प्रत्येक पहलू पर प्रश्न पूछ सकता है। शीतकालीन सत्र में 27 नवंबर 2019 को लोक सभा में सभी 20 तारांकित प्रश्न पूछे गए जिनका जवाब संबंधित मंत्रियों ने दिया। संसदीय व्यवस्था में इसे एक सकारात्मक पक्ष कहा जा सकता है क्योंकि सरकार संसद को लेकर जवाबदेह होती है और प्रश्नकाल ही वह समय होता है जब सांसद दलगत राजनीति से उठकर सरकार से सीधे सवाल पूछकर उसे संसद को लेकर जवाबदेह बनाते है।
17वीं लोक सभा के तीसरे सत्र या कहें बजट सत्र की शुरूआत तो अच्छी हुई, सत्र के पहले हिस्से में राष्ट्रपति अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव और बजट पर देर रात तक सदन में चर्चाएं हुई। लेकिन बजट सत्र के दूसरे हिस्से का बड़ा भाग दिल्ली में हुए दंगो के मुद्दे पर बाधित रहा। सात विपक्षी सांसदों को सदन में अनुचित व्यवहार के लिए पूरे सत्र से निलंबित भी किया गया।
हालांकि, सातों विपक्षी सांसदों का निलंबन कुछ दिन बाद वापिस ले लिया गया। दिल्ली में हिंसा पर चर्चा की विपक्ष की मांग को मानते हुए नियम 193 के तहत इस पर लोक सभा में तकरीबन 5 घंटे तक चर्चा हुई। बहस के दौरान कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने केन्द्र सरकार पर जमकर हमला बोला और कहा कि जब बालाकोट में स्ट्राइक कर सकते हैं तो दिल्ली की हिसां को क्या नहीं रोक सकते थे। इस चर्चा का जवाब गृहमंत्री अमित शाह ने दिया।
हम कह सकते हैं कि 17वीं लोक सभा का पहला साल संसदीय व्यवस्था के इतिहास में अपने विधायी कामकाज के लिए सुनहरे अक्षरों में याद किया जाएगा, बीते एक साल में लोकसभा से 64 विधेयक पारित हुए। तीसरे सत्र के व्यवधान की कुछ घटनाओं को अगर छोड़ दें तो बीते एक साल संसद सत्र की उत्पादकता ऐतिहासिक रही है। अब उम्मीद यह भी है कि संसद की यह सुहानी तस्वीर आगे भी दिखे। हर कोई समझे कि संसद में जवाबदेही चर्चा से तय होती है, हंगामे से नहीं।
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