बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार।
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ये कैसा अड़ियल रवैया
'नाकाम होती नीति पर अड़े रहना' इस व्यवस्था को दुरुस्त करने के बजाय ये कहना कि 'पियोगे तो मरोगे है ही', लेकिन ये नहीं बताओगे कि आप क्या करोगे? ये जिद और अड़ियल रवैया ही ज्यादा दिखाता है।
गांधी के रास्ते पर चलकर शराबबंदी को लागू करने में नीतीश बाबू की नीयत भले ही अच्छी रही हो, सुशासन बाबू को महिलाओं में लोकप्रिय बनाती हो और उनके वोट भी दिलाती हो, लेकिन एक असफल शराबबंदी की नीति, क्या नीतीश बाबू को देशभर में लोकप्रिय बना पाSगी??
सब जानते हैं कि नीतीश बाबू ने मन बना ही लिया है कि वो 2024 में दिल्ली के समर में हिस्सा लेंगे और मोदी को दिल्ली के सिंहासन के लिए टक्कर देना चाहते हैं। तभी तो सुशासन बाबू ने कहा कि 2025 का विधानसभा चुनाव तेजस्वी यादव की अगुवाई में लड़ा जाएगा।
बीते सालों में नीतीश बाबू शराबबंदी के अपने फार्मूले के साथ पड़ोसी राज्यों झारखंड और यूपी का दौरा कर भी चुके हैं और आने वाले डेढ़ साल में हो सकता है कि वो और राज्यों में जाएं और अपने आप को स्थापित करें कि शराबबंदी पर बापू के बाद सबसे बड़ी लड़ाई वो ही लड़ रहे हैं। और उनके विरोधी अगर उनकी असफल शराबबंदी नीति पर उन पर सवाल उठाएं तो हो सकता है कि वो भी वही विक्टिम कार्ड खेलें कि देखो मैं तो शराब माफियाओं से लड़ रहा हूं और ये ताकतवर शराब लाबी मुझे बदनाम कर रही है।
दरअसल, सुशासन बाबू समझते हैं कि शराबबंदी एक ऐसा नीतिगत फैसला है जिसकी मुखालफत करना किसी भी पार्टी के लिए आसान नहीं है। जो शराबबंदी का विरोध करेगा वो सीधे शराब मिलने के समर्थन में खड़ा दिखेगा। नीतीश के सामने इस वक्त जो विपक्ष के नेता खड़े हैं जैसे राहुल, ममता, केजरीवाल, के.चन्द्रशेखर राव, स्टालिन, अखिलेश, शरद पवार, मायावती या ठाकरे ये सभी शराबबंदी के विषय में तो नीतीश कुमार का मुकाबला किसी भी मंच पर नहीं कर सकते। ये सभी या तो सरकार में रहे हैं या अभी सरकार चला रहे हैं, लेकिन किसी ने भी अपने सूबे में शराबबंदी जैसा बड़ा कदम नहीं उठाया है।
गुजरात में शराबबंदी
शराबबंदी मोदी के गुजरात में भी है और नीतीश के बिहार में भी। पीएम मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल में भी गुजरात में फर्जी और अवैध शराब मिलती रही थी और अभी तो हाल ही में गुजरात में फर्जी शराब की वजह से करीब 40-50 लोगों की जान भी गई थी। ऐसी घटनाओं को नीतीश लोकसभा चुनावों की 2024 की जंग में अपने पक्ष में इस्तेमाल करने से गुरेज नहीं करेंगे।
देश में शराबबंदी का फलसफा देने वाले गांधी थे तो गुजराती, लेकिन उन्होंने शराबबंदी के बारे में बिहार के चंपारण से ही आंदोलन खड़ा किया था। नीतीश को पीएम मोदी के सामने खड़े करने वाले तर्क समय पर काम आ सकते हैं।
शराब पर प्रतिबंध का ये खेल नीतीश बाबू को एक राष्ट्रव्यापी मुद्दा लगता है। हम सब ये भी देख रहे हैं कि देश भर में महिलाओं के वोट प्रतिशत में चुनाव दर चुनाव इजाफा हो रहा है और महिला वोटर भी पुरुष वोटरों के लगभग बराबरी पर हैं। पारिवारिक और सामाजिक तौर पर देखें तो शराब की वजह से होने वाला प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष खामियाजा सबसे ज़्यादा महिलाओं को ही उठाना पड़ता है। ऐसे में नीतीश बाबू को ये पकी-पकाई कान्सटीट्यून्सी दिखाई दे रही है। जो उनको दिल्ली के ताज के पास तक ले जा सकती है।
गांधी को कभी भी सत्ता से मोह नहीं था, वो अगर शराबबंदी की बात करते थे तो वो समाज, देश और मानवता के हित में की गई बात होती थी, लेकिन क्या नीतीश कुमार यही बात अपने बारे में कह सकते हैं?
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