केन्द्र मोदी सरकार द्वारा विपक्ष के दबाव के चलते इस साल देश में जाति गणना कराने के फैसले के साथ ही मंडल राजनीति 3.0 का आगाज भी हो गया है। इसको लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच श्रेय लेने की होड़ मच गई है, वहीं बड़ा सवाल यह है कि इस ऐतिहासिक निर्णय का अंतिम राजनीतिक लाभांश किसे मिलेगा?
भाजपानीत एनडीए को या फिर कांग्रेसनीत इंडिया गठबंधन को? अगर दोनो को मिलेगा तो ज्यादा किसे मिलेगा? लेकिन जातिवादी सियासत का असली धमाका तब होगा, जब जाति की संख्या के आधार पर राजनीतिक आरक्षण की मांग तेज होगी। सरकारी नौकरी, िशक्षा व राजनीति में जाति की संख्या के आधार पर आधिकाधिक आरक्षण की मांग को लेकर ओबीसी जातियों के भीतर अंतर्संघर्ष बढ़ेगा, क्योंकि संख्या की दृष्टि से सर्वाधिक जातियां इसी वर्ग में हैं। साथ ही देश में आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी से बढ़ाने का दबाव बनेगा।
ओबीसी जातियों की संख्या व आबादी के खुलासे के बाद ठंडे बस्ते में पड़ी जस्टिस रोहिणी आयोग की रिपोर्ट लागू करने का दबाव भी मोदी सरकार पर बढ़ेगा। इन सबसे बढ़कर इस प्रश्न का उत्तर भी तलाशा जाएगा कि जाति गणना कराने से भाजपा और संघ की हिंदू एकीकरण की मुहिम को गहरी चोट पहुंचेगी या फिर यह अभियान जातीय अस्मिता के आवरण में और मजबूत होगा?
इसमें दो राय नहीं कि देश में जातिगणना कराने का मुद्दा बीते तीन दशक से, जब से मंडल-कमंडल राजनीति हावी हुई है, तब से केन्द्र में रहा है। आजादी के बाद देश में हुई हर जनगणना में अजा/जजा वर्ग की गणना तो होती रही है, लेकिन ओबीसी सहित इन सभी जातियों की गणना से सरकारें बचती रही हैं। यहां तक कि डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्ववाली यूपीए 2 ने भी 2011 की जनगणना में जातियों की सामाजिक आर्थिक गणना कराई, लेकिन उसका डाटा आज तक जारी नहीं किया।
बताया जाता है कि इस जनगणना में ओबीसी जातियों का इतना बड़ा आंकड़ा सामने आया कि सरकार उसे दबा गई। मोदी सरकार ने भी ये आंकड़े उजागर न करने में ही भलाई समझी और जाति गणना की मांग जोरशोर से उठाने वाले कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी यह मांग कभी नहीं की कि उनकी सरकार के दौरान जातियों की आर्थिक-सामाजिक गणना के आंकड़े मोदी सरकार तो जारी करे।
बेशक पाकिस्तान के साथ भारी तनाव के बीच राहुल गांधी ने मोदी सरकार द्वारा जनगणना के साथ ही जातिगणना कराने के निर्णय का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि हमारे दबाव में ही सरकार यह फैसला लेने पर विवश हुई है, लेकिन सरकार आंकड़े जारी करने की टाइमलाइन भी स्पष्ट करे।
जहां तक इस मांग को लेकर हिंदू एकता की बात करने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक की बात है तो उसने पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजो के बाद केरल के पलक्कड में अायोजित बैठक में जातिगणना को हरी झंडी दे दी थी। दरअसल संघ ने अपने मंथन में यह बूझ लिया था कि 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को बहुमत से 32 कम मिलने के पीछे यूपी, बिहार, महाराष्ट्र आदि राज्यों में कांग्रेस, सपा, राजद आदि दलों द्वारा जातिगणना कराने की मांग को मोदी सरकार द्वारा टालते जाना भी प्रमुख कारण रहा है।
जाति गणना आरक्षण की आकांक्षा से जुड़ गई है। ओबीसी वर्ग में यह बेचैनी लगातार बढ़ रही है कि उनकी जातियों की सही संख्या व जनसंख्या का प्रामाणिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं होने से उसे सामाजिक न्याय नहीं मिल पा रहा है। पहले भाजपा और संघ का मानना था कि जाति, हिंदू एकता के गुब्बारे के लिए सुई के समान है। क्योंकि जातियों में बंटते ही हिंदू गौरव, जातीय अस्मिता और दुराग्रह में तब्दील हो जाता है, जिससे सकल हिंदू एकता की ताकत बिखरने लगती है। बावजूद इसके कि जाति हिंदू समाज की एक अनिवार्य बुराई है, इसका सकारात्मक राजनीतिक दोहन कैसे किया जाए, इस दिशा में सोचा जाना चाहिए।
ऐसे में यह लगभग तय था कि कल तक जातिगणना से बचने वाली भाजपा इसके पक्ष में न सिर्फ फैसला लेगी बल्कि इसे आजादी के बाद देश में पहली बार कराने का श्रेय भी लेगी। कहा यह भी जा रहा है कि इस सम्बन्ध फैसला पहले ही हो चुका था, लेकिन चूंकि इस बार जनगणना डिजीटली होनी है, इसलिए जातिगणना की प्रक्रिया, पैमाने और तकनीकी प्रावधान करने में वक्त लगा।
खास बात यह है कि 90 के दशक में ओबीसी आरक्षण के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन छेड़ने वाली भाजपा ही आज हमे जातिगणना के फायदे गिना रही है। इन तीन दशकों में जहां जातिवादी राजनीति के उभार ने यूपी बिहार जैसे राज्यों में बरसों सत्ता में रही कांग्रेस के जनाधार को जातिवादी राजनीति करने वाले दलो की तरफ मोड़ दिया तो बाद में भाजपा और संघ ने ओबीसी को नए सिरे संगठित कर हिंदुत्व की पताका इसी वर्ग के हाथों में थमा दी। इसी का नतीजा है कि बीते एक दशक से देश की कमान नरेन्द्र मोदी के रूप में एक ओबीसी के नेता के हाथों में हैं।
गौरतलब है कि वर्तमान ओबीसी वर्ग को सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में आरक्षण 1931 की जाति जनगणना के आंकड़ो के आधार पर ही दिया जा रहा है, क्योंकि उसके बाद से जातिगणना हुई ही नहीं। उस जनगणना के हिसाब से देश में सामान्य ( अनारक्षित) वर्ग की 46 ( मुस्लिम, ईसाई, जैन, बौद्ध व पारसी के अलावा), ओबीसी की 2633, अजा वर्ग की 1270 व अजजा की 748 हैं। लेकिन मोदी सरकार द्वारा ओबीसी वर्ग में आरक्षण के न्यायसंगत वितरण के लिए गठित जस्टिस रोहिणी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि ओबीसी वर्ग में जहां 10 जातियों ने आरक्षण का सर्वाधिक लाभ उठाया, वहीं 983 जातियो को कोई फायदा नहीं मिला।
इसलिए आयोग ने लाभान्वितता के आधार पर ओबीसी जातियों को चार उप श्रेणियों में बांटकर उनके आरक्षण की सीमा तय करने की सिफारिश की थी। यह रिपोर्ट राष्ट्रपति के पास है। वैसे बिहार और कर्नाटक जैसे राज्यो में सरकारों ने जाति सर्वे कराया है। लेकिन उसकी वैसी प्रामाणिकता नहीं है, जो देशव्यापी और व्यवस्थित जातिगणना की होगी। इसके अलावा रोहिणी आयोग की रिपोर्ट को ओबीसी की राजनीतिक गोलबंदी की सियासी काट भी माना जाता है।
ऐसे में हो सकता है कि जातिगणना के बाद ओबीसी जातियों का माइक्रो विभाजन बहुत ज्यादा हो तथा ऐसी स्थिति में आरक्षण से लाभान्वित कुछ सम्पन्न और प्रगत ओबीसी जातियों को सामान्य में शिफ्ट करना पड़े। वैसे भी ओबीसी में क्रीमी लेयर का प्रावधान है ही और अब इसे एससी में भी कुछ राज्य लागू कर चुके हैं। इसका और विस्तार हो सकता है, जिससे नए जातीय टकराव देखने को मिल सकते हैं।
आरक्षण से वंचितों को लाभ मिलने या ऐसी मांग करने से जातियों का नए सिरे ध्रुवीकरण होगा, उसका सियासी लाभ वो पार्टियां ही प्रभावी ढंग से उठा सकती हैं, जिनके पास सक्षम संगठन और इस मुद्दे को वोटों में भुनाने का राजनीतिक तंत्र हो। ऐसा तंत्र फिलहाल भाजपा के पास ही है। जातिगणना के बाद राजनीतिक आरक्षण भी लागू होगा, जिसमें विधानमंडलों में सर्वाधिक सीटें ओबीसी के लिए ही आरक्षित करनी होंगी। यह काम ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ नारे के अनुकूल होगा।
साथ ही सभी जाति वर्गों में महिला आरक्षण की सीमा भी तय होगी। संख्या को ही आधार मानने पर योग्यता, गुणवत्ता और प्रतिभा के पैमाने हाशिए पर जा सकते हैं। हालांकि कुछ समाजशास्त्रियों का मानना है कि जातीय विभाजक रेखाएं बनती-सिकुड़ती रहेंगी, लेकिन काबिलियत का मानदंड कभी कुचला नहीं जा सकेगा। उसकी अहमियत और जरूरत कायम रहेगी।
बहरहाल मोदी सरकार का जातिगणना कराने का यह फैसला राजनीतिक डेमेज कंट्रोल के साथ-साथ भविष्य की जातिवादी राजनीति की नई रेखाएं खींचने का आगाज भी है। क्योंकि देश में ओबीसी जातियों की संख्या और जनसंख्या के आंकड़े उजागर होने के बाद आरक्षण की नई छीना झपटी भी शुरू होगी। इसमें कौन शेर साबित होगा, अभी कहना मुश्किल है।
क्या जाति गणना का मुद्दा लगातार उठाते रहने का ज्यादा फायदा कांग्रेस व अन्य विपक्षी पार्टियों को होगा या फिर इस मांग को अमली जामा पहनाने और उसे राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने वाली भाजपा को होगा, यह सस्पेंस बहुत दिलचस्प है। क्योंकि कांग्रेस व अन्य दल अगले कुछ दिनों तक इसका श्रेय लेने का पूरा प्रयास करेंगे, और वो जायज भी है, लेकिन इसका लंबे समय तक सियासी फायदा उठाने वाले प्रभावी मैकेनिज्म इन दलो के पास नहीं है।
इस मुद्दे की पहली अग्नि परीक्षा छ: माह बाद बिहार में होने वाले विधानसभा चुनावों में हो जाएगी। वैसे भी याचक और दाता में दाता बड़ा होता है। जातिगणना के साथ भाजपा ये आंकड़े एकत्र करने, विश्लेषण करने और उसे जारी करने का क्रेडिट हर कदम पर लेने की भरपूर कोशिश करेगी। फिलहाल मोदी सरकार विपक्ष की मांग के आगे झुकती भले नजर आए, लेकिन जातिगणना की मांग मानकर उसने विपक्ष के हाथों से इस मुद्दे का रिमोट कंट्रोल बड़ी चतुराई से छीन लिया है।
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