पहलगाम आतंकी हमले में मारे गए कानपुर के शुभम द्विवेदी के परिजन
- फोटो : Amar Ujala
परिजन बताते हैं- हर 10 मिनट में उसकी रुलाई फूट पड़ती है और सिसकने लगती है। हादसे के बाद शुभम का चेहरा उसकी आंखों में आखिरी बार दर्ज हुआ था, उसके बाद शुभम का चेहरा उसने कभी नहीं देखा, उसने ही नहीं बल्कि ना पिता ने ना मां ने क्योंकि सिर में सीधी गोली लगने से ना आंखें बची, ना नाक ना मुंह ना ऊपर का हिस्सा।
दरअसल, किसी ने शुभम का चेहरा आखिरी बार नहीं देखा। अंतिम संस्कार के समय भी चेहरे से पट्टियां हटाई नहीं गई थीं। वैसे कोई देखता भी क्योंकि शुभम का चेहरा था ही कहां और जो था वह एशन्या की स्मृतियों में दर्ज था जिसे खून से सने कपड़ों लिए एशन्या आज भी घूम रही है।
मैं एशन्या से ज्यादा देर बात नहीं कर पाया और ना ही शुभम की मम्मी से। एशन्या उस हादसे को भूलने और याद करने के बीच कहीं अटकी हुई है और बात करते-करते गुम हो जाती है और जब वहां से लौटती है तो रोती है, फूटफूटकर रोती है जबकि उसके कांपते हुए हाथों को थामना होता है-
-एशन्या ने कुछ तस्वीरें और वीडियोज बताए
-कुछ बातें और वह समय जो घटनास्थल पर पहुंचने और हादसे हो जाने के बीच का अंतराल था। उसकी बातें सुनकर सिंहर गया और वह बताते-बताते अस्थिर और असहज होकर रोने लगी।
मां अंदर के कमरे में पलंग पर लेटी हुई थी। बदहवास सी। ना देह स्थिर है ना मन को समेट पा रही है। मां और पिता उन 10 लोगों में से एक थे जिन्होंने बेटे शुभम को आखिरी बार वहां जाते हुए देखा था उसके बाद वह अपने बउआ को उसके बचपन को और साथ बिताए आखिरी दिनों में याद करती हैं-
कैसे हो गया ये
भगवान ने ये क्या कर दिया
वह दूर एक शून्य में देखने लगती हैं और पास की महिलाएं उन्हें जगाती हैं
वह बचपन के शुभम को याद करती हैं और रुलाई फूट पड़ती है-
बहन आरती से लंबी बातें हुईं। वह उन चश्मदीदों में शामिल है जिसकी नियति उसके भाग्य से हार गई। वह घटनास्थल पर जाने से कुछ देर पहले ही असहज थी और घोड़े पर बैठने का डर उसे नीचे ले आया और उसके साथ-साथ परिवार के सारे सदस्यों को। आरती को लगता ही नहीं है कि भैया अब नहीं रहा ऐसा लगता है कि बस वह आने वाला है अभी या फिर उसका कॉल आएगा..!
कल दिनभर शुभम के घर रहते हुए एक शब्द भीतर से नहीं निकला। लगा मानों मौन ने दिलो दिमाग पर कब्जा कर लिया है। केवल मिलने और सांत्वना देने वाले लोगों को देखता और सुनता रहा और उन्हें सुनते हुए शुभम की कहानी के समानांतर उन 26 घरों की कहानियों के भीतर प्रवेश कर गया। बीते सात दिनों में हादसे से जुड़े अनगिनत हिस्से जहन में रहे।
पहलगाम हादसा जघन्य, अमानवीय और बर्बर था। अपनी पहली श्रद्धांजलि पोस्ट में मैंने इस हमले की मंशा को भांप लिया था कि यह पहले से ही बिखरे हुए सामाजिक ताने-बाने के सामने नई आंधी की तरह होगा।
मैं आज भी कई तस्वीरें, फोटो और वीडियों में पीड़ितों और अपनों के चले जाने से बदहवास हुए परिजनों को देख रहा हूं।
हर जगह दारुण दुख में डूबे हुए चेहरे हैं।
विलाप करते लोग हैं और समय के एक हिस्से में पलटकर उस दुर्योग से हटकर एक सुखद संजोग के बारे में सोचते हैं जहां जीवन बच जाता।
वे काल के पार जाकर उस काश के साथ खुदको जोड़ने के लिए छटपटाते दिखते हैं जहां वे अकाल और अपघाती मौत से बचकर निकल आते।
वे उस अनहोनी के चक्र में प्रवेश से पहले ही लौट आते या कि वे नियति के उस सबसे कोमल हिस्से को स्पर्श कर उसे टालने में सफल होते और भाग्य को पूजते.!
अफसोस कि ऐसा नहीं हुआ.
दुखद की वे आतंक के सबसे क्रूरतम चेहरे का शिकार हुए
त्रासद कि वे उस नरसंहार का हिस्सा बन गए जिसमें धार्मिक पहचान के आधार पर लोगों को मारा गया
और सबसे दुर्भाग्य की इस राष्ट्र के सामाजिक ताने-बाने में यह आतंकी हमला वैमनस्य का ऐसा कड़वा बीज बो गया जिसकी परिणिती घातक होगी और इसकी गूंज दशकों तक गूंजती रहेगी…!
मैं शुभम के घर में होते हुए भी वहां नहीं रहा बल्कि हरियाणा, कर्नाटक, महाराष्ट्र सहित उन तमाम परिजनों के बीच प्रवेश कर गया जहां शुभम के घर की तरह ही दारुण दुख बह रहा है। हवा में पीड़ा का मौन घुला हुआ है। विलाप और सिसकियां गूंजती है। रह-रहकर चीखें और डर फैलता है और हादसे की स्मृतियां देर रात को और ज्यादा काली सुर्ख हो जाती है और इस राष्ट्र की सबसे काली स्याह स्मृति का चेहरा बन जाती है..!
शाम का धुंघलका गहरा रहा है। शुभम की फोटो के सामने फूल, धूपबत्ती महक रही है जिसका धुआं अनंत में विलीन हो रहा है। जैसे आकाश से आकाश में। शुभम और वे तमाम लोग सदा के लिए ऐसे ही विलीन हो गए।
फोटो के पास एक दीपक जल रहा है। गरुण पुराण का पाठ चल रहा है जहां मृत्यु और उसके शोक का वर्णन है और उसे सुनाया जा रहा है। लेकिन इस मृत्यु के बीच चुप्पी है तो बस निर्दोष, अकाल और अपघाती मौतों पर, जिसके बारे में सोचते हुए देर रात लौट आता हूं..!
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