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ओबीसी जनगणना: एक बार फिर मंडल बनाम कमंडल? चुनावी मैदान में धर्म के अस्त्र के खिलाफ जातियों का ब्रह्मास्त्र

सार

कांग्रेस ने जिस प्रकार अन्य पिछड़ी जातियों का मुद्दा उठाया है, उसे देखते हुए तो लगता है कि 2024 के लिए मंडल बनाम कमंडल के बीच मुकाबला तय हो गया है। नब्बे के दशक में भी मण्डल बनाम कमंडल का मुद्दा राजनीति के केन्द्र में आ गया था। उसी राजनीति का नतीजा है कि भारतीय जनता पार्टी अपने बलबूते पर देश की सत्ता पर काबिज होने के साथ ही दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है।
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जातिगत जनगणना, जनगणना - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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ठीक लोकसभा चुनाव से पहले सत्तारूढ़ भाजपा अपना हिन्दू वोट बैंक को चुस्त-दुरुस्त कर ही रही थी लेकिन अचानक विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस ने जिस प्रकार अन्य पिछड़ी जातियों का मुद्दा उठाया है, उसे देखते हुए तो लगता है कि 2024 के लिए मंडल बनाम कमंडल के बीच मुकाबला तय हो गया है। नब्बे के दशक में भी मण्डल बनाम कमण्डल का मुद्दा राजनीति के केन्द्र में आ गया था। उसी राजनीति का नतीजा है कि भारतीय जनता पार्टी अपने बलबूते पर देश की सत्ता पर काबिज होने के साथ ही दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है।

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ज्यादातर राज्यों में भी या तो भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली या अन्य दलों के साथ साझा सरकारें हैं। इसलिए विपक्ष के पास भाजपा के हिन्दू वोट बैंक को तोड़ने के लिए पिछड़ी जातियों का ही सहारा है। ये पिछड़ी जातियां हिन्दू आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा मानी जाती है और अगर अल्पसंख्यकों को जोड़ दिया जाए तो यह देश की आबादी का 80 फीसदी हिस्सा बनता है।

विपक्ष का लक्ष्य हिन्दू वोट बैंक तोड़ना

अब तक सपा, बसपा, राजद और जनता दल जैसे कुछ क्षेत्रीय दल ही देश में जाति आधारित जनगणना की मांग कर रहे थे।

बिहार में नितीश के नेतृत्व वाली पार्टी की सरकार ने तो जातीय गणना शुरू कर भी दी थी। लेकिन अब विपक्ष के सबसे बड़े दल कांग्रेस के अध्यक्ष मलिकार्जुन खरगे ने बाकायदा प्रधानमंत्री मोदी का पत्र लिख कर 2011 की जातीय गणना के नतीजों को सार्वजनिक करने की मांग कर, अपने को जातीय गणना समर्थकों में शामिल कर दिया। जबकि अब तक यह पार्टी भाजपा और वाम दलों की तरह जातीय गणना के पक्ष में नहीं थी।

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यही नहीं कांग्रेस के अघोषित शीर्ष नेता राहुल गांधी ने भी अपने निर्वाचन क्षेत्र वायनाड में जातीय गणना का मुद्दा उठा कर साबित कर दिया कि अगर भाजपा हिन्दुओं के नाम पर 2024 में वोट मांगेगी तो विपक्ष उस वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए जातियों का फ्रंट अवश्य खोलेगा।

भारत में लगभग 2633 जातियां अन्य पिछड़े वर्ग में मानी जाती हैं। इनके अलावा 1241 अनुसूचित जातियां और 705 जनजातियां हैं। अगर अल्प संख्यकों को भी इसी वर्ग में जोड़ दिया गया तो शेष आबादी 20 प्रतिशत से कम रह जाएगी।

राम मंदिर आन्दोलन का भाजपा को लाभ

चुनाव के मैदान में धर्म के अस्त्र के खिलाफ जातियों के ब्रह्मास्त्र के असर का पता तो अब 2024 में ही चलेगा, मगर संभावना है कि देश की जटिल सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए पहचान-आधारित राजनीति भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहेगी।

दरअसल तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए समर्थन जुटाने के उद्देश्य से 25 सितंबर, 1990 को गुजरात के सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक की यात्रा शुरू की थी, तो भारत की राजनीति में एक उबाल सा आ गया था। यद्यपि बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने उस यात्रा को 23 अक्टूबर 1990 को बिहार के समस्तीपुर में रोक दिया था। 

रथ यात्रा की योजना राम जन्मभूमि आंदोलन के लिए शक्ति और समर्थन के प्रदर्शन के रूप में बनाई गई थी, और इसे बड़े पैमाने पर सार्वजनिक रैलियों और जुलूसों द्वारा प्रचारित किया गया था। हालांकि, यात्रा के भारी विरोध और हिंसा के बावजूद, रथ यात्रा ने विशेष रूप से हिंदू समुदाय के बीच भाजपा के समर्थन के आधार को मजबूत करने में मदद की।

1991 के लोकसभा चुनाव में पार्टी भाजपा ने 120 सीटों पर जीत हासिल की और संसद में कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, जबकि उससे पहले लोकसभा में उसके केवल 2 सदस्य थे। उस आन्दोलन के बाद भारतीय राजनीति में नया बदलाव आया और भाजपा हिन्दू वोट बैंक के आधार पर सफलता की सीढ़ियां चढ़ती गई। 

 

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कांग्रेस ने अन्य पिछड़ी जातियों के गणना का मुद्दा उठाया है। - फोटो : Twitter

बीपी सिंह के हाथ लगा मंडल कमीशन का शस्त्र

यद्यपि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अगस्त 1990 में जब केंद्र सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत ओबीसी कोटा लागू करने का ऐतिहासिक ऐलान कर मंडल आयोग की सिफारिशों की ओर कदम बढ़ाया था तो उनके सामने तात्कालिक चुनौती राजनीति का हिन्दुत्वकरण न होकर ताकतवर जाट नेता देवीलाल के व्रिदोह की थी। लेकिन बाद में सामाजिक न्याय समर्थक राजनीतिक शक्तियों के हाथ भाजपा के हिन्दुत्व के ऐजेंडे के खिलाफ मंडल आयोग की रिपोर्ट लग गए। इसलिए नब्बे के दशक की राजनीति में मंडल बनाम कमंडल का नरेटिव छाता गया।

दरअसल मण्डल आयोग का गठन तत्कालीन मोरारजी देसाई सरकार ने 1979 में भारत में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान करने और उनकी स्थिति में सुधार के उपायों की सिफारिश करने के लिए बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री बी.पी.मंडल की अध्यक्षता में किया था। मंडल आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें इसने कुल 3,743 जातियों और समुदायों को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के रूप में पहचाना, जिन्हें तब अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के रूप में वर्गीकृत किया गया था। आयोग ने सिफारिश की कि सरकारी नौकरियों और शैक्षिक सीटों का एक निश्चित प्रतिशत ओबीसी के लिए आरक्षित किया जाए, ताकि उनका प्रतिनिधित्व बेहतर हो सके और ऐतिहासिक नुकसान और भेदभाव को दूर किया जा सके।

मंडल आयोग की सिफारिशों का कार्यान्वयन भारतीय राजनीति में एक विवादास्पद मुद्दा बन गया, कुछ समूहों ने योग्यता के लिए खतरे के रूप में इस कदम का विरोध किया और सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए एक आवश्यक उपाय के रूप में इसका समर्थन किया।

मंडल आयोग की सिफारिशों का देशभर में उच्च वर्गों द्वारा भारी विरोध किया गया। मंडल विरोधी आन्दोलन से ही उत्तराखण्ड आन्दोलन भी उभरा जिसके परिणाम स्वरूप उत्तराखण्ड राज्य तो बना साथ ही झारखण्ड और छत्तीसगढ़ राज्य भी बने। यही नहीं, बाद में तेलंगाना राज्य के गठन का मार्ग भी प्रशस्त हुआ।

अंग्रेजों ने शुरू की थी 1872 में जाति आधारित गणना

दरअसल जातीय गणना कराने वाला मंडल आयोग अकेला नहीं था। भारत में सबसे पहले ब्रिटिशकाल में (1872 में) आयोजित जाति-आधारित जनगणना में, लगभग 1,800 जातियों की पहचान की गई और उन्हें चार व्यापक श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया, अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। उसके बाद सन् 1931 में आयोजित दूसरी जाति-आधारित जनगणना में, 2,000 से अधिक जातियों की पहचान की गई और उन्हें व्यवसाय, भाषा और क्षेत्र जैसे विभिन्न मानदंडों के आधार पर कई उप-जातियों और समूहों में वर्गीकृत किया गया।

2011 में आयोजित नवीनतम जाति-आधारित जनगणना, अन्य जनसांख्यिकीय जानकारी के साथ जनसंख्या की जाति दर्ज की गई, लेकिन डेटा अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है। 


भारत में 6 हजार से अधिक ओबीसी और अ.सू.जातियां

भारत में, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का वर्गीकरण राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) द्वारा निर्धारित किया जाता है, जिसे राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग अधिनियम, 1993 के तहत स्थापित किया गया था। एनसीबीसी ने सितंबर 2021 तक कुल 5,013 जातियों और समुदायों को ओबीसी के रूप में वर्गीकृत किया है। यह वर्गीकरण सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक पिछड़ेपन जैसे विभिन्न मानदंडों पर आधारित है, और एनसीबीसी द्वारा समय-समय पर समीक्षा और संशोधन के अधीन है।

भारत में, अनुसूचित जाति (एससी) का वर्गीकरण संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 द्वारा निर्धारित किया जाता है, जो उन जातियों और समुदायों को सूचीबद्ध करता है। 

सितंबर 2021 तक, 1,241 जातियां और समुदाय हैं जिन्हें भारत में अनुसूचित जातियों के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इन समुदायों को सामाजिक और शैक्षिक रूप से वंचित माना गया है। इसी तरह सितंबर 2021 तक, 705 जनजातियां या आदिवासी समुदाय हैं जिन्हें भारत में अनुसूचित जनजातियों के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

इन समुदायों को सामाजिक और शैक्षिक रूप से वंचित माना जाता है और वे शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में आरक्षण जैसे विभिन्न संवैधानिक सुरक्षा उपायों और लाभों के हकदार हैं।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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