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दूसरा पहलू: वह कला, जिसे समय भी भुला नहीं सकता; दीवारों से निकलकर वस्त्रों तक पहुंच रही लोककला

Mon, 12 Oct 2026 09:53 AM IST
ज्योति भास्कर अमरनाथ प्रसाद

सार

नवरात्र में बुंदेलखंड की चितेरी कला लोकआस्था व परंपराओं के रंगों से जीवंत हो उठती है। अब यह लोककला दीवारों से निकलकर वस्त्रों तक पहुंच रही है। झांसी के पुराने शहर में चितेरों के मुहल्ले को कभी चितरयाना कहा जाता था, जो अब चतुरयाना के नाम से जाना जाता है। 
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बुंदेलखंड की लोककला बेहद खास - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
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नवरात्र के दिनों में बुंदेलखंड में घर-घर देवी आराधना, व्रत और पूजन की परंपराएं जीवंत हो उठती हैं। इस अवसर पर चितेरी कला लोकजीवन और आस्था के रंगों को समझने का विशिष्ट माध्यम बनती है। चितेरी कला महज रंगों और रेखाओं का संयोजन नहीं, बल्कि बुंदेली जनजीवन की दृश्य अभिव्यक्ति है।

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पारंपरिक रूप से विवाह और दूसरे मांगलिक अवसरों पर घरों की दीवारों को सजाने में इसका इस्तेमाल होता रहा है। देहरी और आंगन भी लोकपरंपराओं में शुभ प्रतीकों और मांगलिक अलंकरण के महत्वपूर्ण स्थल रहे हैं। नवरात्र में देवी आराधना और शक्ति के प्रति आस्था को चित्रों के माध्यम से व्यक्त करने का विशेष महत्व है।

देवी के स्वरूप, शुभ प्रतीकों और फूल-पत्तियों जैसी आकृतियों के जरिये लोकविश्वास को दृश्य रूप मिलता है। इस तरह चितेरी कला धार्मिक अनुष्ठानों और सामाजिक जीवन के बीच सांस्कृतिक सेतु का काम करती है। चितेरी कला में बूंदी और किशनगढ़ जैसी चित्रशैलियों की झलक भी देखने को मिलती है। पहले नवरात्र के अवसर पर चितेरी कला के माध्यम से चित्रांकन की परंपरा थी। समय के साथ इसका स्वरूप बदला है।
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अब कुछ संस्थाएं इसे व्यावसायिक रूप देने और नए माध्यमों से जोड़ने का प्रयास कर रही हैं। वस्त्रों पर उकेरे गए चित्रों के माध्यम से यह लोककला घरों की दीवारों से निकलकर रोजमर्रा के जीवन और बाजार तक पहुंच रही है। झांसी के पुराने शहर में चितेरों के मुहल्ले को कभी चितरयाना कहा जाता था, जो अब चतुरयाना के नाम से जाना जाता है। नाम भले ही बदल गया हो, लेकिन चितेरी कला से जुड़ी परंपरा आज भी कायम है। विवाह जैसे मांगलिक अवसरों पर घरों की दीवारों पर चित्रकारी कराने के लिए चितेरों को विशेष रूप से बुलाया जाता है। हालांकि समय के साथ पक्के मकानों के बढ़ते चलन और घरों को सजाने के तौर-तरीकों में परिवर्तन से पारंपरिक भित्ति चित्रकारी के लिए पहले जैसी परिस्थितियां नहीं रह गई हैं।

ऐसे में चितेरी कला को नए माध्यमों से जोड़ना उसके संरक्षण और विस्तार का एक रास्ता बन सकता है। प्रदर्शनियों, कार्यशालाओं और कलाकारों से संवाद के जरिये इसकी विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जा सकता है। दीवारों से साड़ियों तक पहुंचने की इसकी यात्रा बताती है कि यह लोककला बदलते समय के साथ नए माध्यम अपना सकती है। जरूरत इस बात की है कि चितेरी के रंगों का विस्तार हो, लेकिन उनके पीछे छिपी लोकस्मृति, आस्था और कलाकारों की विशिष्ट पहचान भी सुरक्षित रहे।

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