मोदी का अगला कार्यकाल
मोदी चौथी बार पीएम बनेंगे या नहीं, यह अमित शाह के अलावा दावे के साथ कोई भी नहीं कह सकता। लेकिन सवाल उनके तीसरा कार्यकाल पूर्ण करने पर भी हैं। भविष्य का घटनाक्रम केवल नियति जानती है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी बार- बार यह कहकर मनोवैज्ञानिक दबाव बना रहे हैं कि यह अल्पमत सरकार है, कभी भी गिर जाएगी। यह उनकी खाम खयाली भी हो सकती है, लेकिन असली सवाल मोदी सरकार की राजनीतिक दिशा और दशा का है। अपने दस साल के कार्यकाल में मोदी ने कई साहसिक फैसलों के साथ-साथ एकांगी कार्यशैली का जो नया लोकतांत्रिक व्याकरण गढ़ने की कोशिश की है, उस पर गहरे प्रश्नचिन्ह लगने लगे हैं।
2024 के चुनावों ने संकेत दे दिया है कि मतदाता अतिवादी ध्रुवीकरण के मोड से वापस जमीनी मुददों की तरफ लौट रहा है। धार्मिक ध्रुवीकरण पर जातिवादी ध्रुवीकरण फिर हावी होता दिख रहा है। बेशक जनता को विकास और एक मजबूत राष्ट्र चाहिए, लेकिन किस कीमत पर, यह बड़ा सवाल है।
एकांगी राजनीति, रेवडि़यां, बड़ी-बड़ी बातें और हर बात पर केवल गर्व करते रहना चुनाव में आपकी ज्यादा मदद नहीं कर सकता। आपको जनता की मुश्किलें आसान करने पर पहले ध्यान देना होगा, बाकी सब बातें बाद की हैं। आर्थिकी अगर बढ़ रही है तो वह आम आदमी की जिंदगी में भी परिलक्षित होनी चाहिए।
मंदिर-मस्जिद राजनीति का परिपाक हमने राम मंदिर निर्माण के रूप में देख लिया है। इस मुद्दे में अब केवल आस्था का सत्व ही बचा है, उसका राजनीतिक दोहन जितना किया जा सकता था, वह हो चुका। काशी, मथुरा, धार भोजशाला जैसे मुद्दे स्थानीय स्तर पर थोड़ी बहुत मदद कर सकते हैं। उसे राष्ट्रीय मुद्दे में तब्दील करना असंभव है।
इसी तरह भाजपा को ‘सबका साथ’ के मूल भाव पर लौटना होगा। वरना जिन जातियों, समुदायों में उसने गहरे पैठ बना ली है, उन्हे भी खिसकने में ज्यादा देर नहीं लगेगी। मोदी अपने दस वर्षों की कार्यशैली से हटकर नई चुनौतियों के हिसाब खुद को कितना एडजस्ट कर पाते हैं, इसी पर आगे का सारा दारोमदार है। वरना इस देश की जनता ने अभी तक तो किसी पीएम को लगातार चौथी बार राजदंड नहीं सौंपा है। तो क्या मोदी नया इतिहास बनाएंगे या फिर खुद इतिहास बनेंगे, यह वक्त बताएगा।
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