बुकर पुरस्कार की घोषणा
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भारत के लिए गौरव का विषय
बीती रात लंदन में बुकर पुरस्कार की घोषणा होते ही सोशल मीडिया पर गीताजंलि श्री और भारतवासियों के लिए बधाइयों का तांता लग गया। इस वर्ष पहली दफ़ा किसी हिंदी उपन्यास के बुकर पुरस्कार की रेस में शामिल होने की वजह से अंतर्राष्ट्रीय हिंदी लेखकों और भाषा प्रेमियों के लिए ख़ास तौर पर कौतूहल बना हुआ था।
इस मौक़े पर गीतांजलि श्री ने कहा-
यह पुरस्कार सिर्फ़ मेरे लिए व्यक्तिगत तौर पर नहीं है। बल्कि मैं एक भाषा और संस्कृति का प्रतिनिधित्व भी करती हूं। इस पुरस्कार ने हिंदी साहित्य और भारतीय साहित्य को समग्र व्यापक दायरे में ला दिया है। इससे यह भी पता चलता है कि साहित्य की एक ऐसी विशाल दुनिया है जिसे अभी भी खोजा जाना बाक़ी है।
उन्होंने इस मौक़े पर अपनी 95 वर्षीय माँ के साथ परिजनों का धन्यवाद करने के साथ उपन्यास के हिंदी प्रकाशक अशोक माहेश्वरी (राजकमल प्रकाशन) का भी विशेष रूप से आभार किया।
“टॉम्ब ऑफ़ सैंड” के साथ दुनिया के पाँच अन्य पुस्तक भी बुकर पुरस्कार की प्रतिस्पर्धा में शामिल थे। इनमें बोरा चुंग लिखित कोरियाई भाषा की 'कर्सिड बनी” ( अनुवादक-एंटोनियो हूर), जॉन फॉसे लिखित 'ए न्यू नेम: सेप्टोलॉजी VI-VII (नॉर्वेजियन से डेमियन सियर्स द्वारा अनुवादित), मीको कावाकामी लिखित 'हेवेन' (जापानी से सैमुअल बेट और डेविड बॉयड द्वारा अनुवादित), क्लाउडिया पिनेरो लिखित 'एलेना नोज़'(स्पैनिश से फ्रांसिस रिडल द्वारा अनुवादित) और ओल्गा टोकार्ज़ुक लिखित 'द बुक्स ऑफ जैकब'(पोलिश से जेनिफर क्रॉफ्ट द्वारा अनुवादित) शामिल थे।
विभाजन से जुड़े किस्से
इस उपन्यास को भारत और विभाजन से जुड़ी बेहतरीन किताब कहा गया है। इस उपन्यास में एक 80 वर्षीय उस महिला की कहानी है जो अपने पति के मरने के बाद गहरे अवसाद में चली जाती है और कुछ समय बाद फिर से अपने जीवन में जान फूंकने की कोशिश करती है। इस क्रम में उसे तमाम उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ता है।
इस दौरान वह पुनर्मूल्यांकन करती है कि एक माँ, बेटी, महिला और नारीवादी होने का क्या मतलब होता है? गीतांजलि श्री ने एक गंभीर विषय को चुनने के बावजूद इस उपन्यास को बेहद रोचक और दिलचस्प तरीक़े से लिखा है। जो पाठक को हमेशा ही उपन्यास से बांधे रखती है।
इस उपन्यास को हिंदी में साल 2018 में प्रकाशित किया गया था। इस किताब को सबसे पहले एक फ़्रेंच अनुवादक ने दुनिया के सामने लाने का फ़ैसला लिया और इसके बाद ही इसका अंग्रेज़ी रूपांतरण किया गया। दरअसल लंबे समय से अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त भारतीय लेखक अंग्रेज़ी में अपनी किताबें लिख रहे हैं।
शायद यही वजह है कि अबतक अन्य भारतीय भाषाओं की किताबों के अनुवाद को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई देती थी। लेकिन हिंदी उपन्यास को इतिहास रचने का मौक़ा मिला है तो निश्चित रूप से इसका फ़ायदा दूसरे भारतीय भाषाओं समेत अन्य दक्षिण एशियाई भाषाओं के लेखकों को भी मिलेगा।
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