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अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार: पहली बार हिंदी भाषा से अनुवादित उपन्यास को पुरस्कार, 'टॉम्ब ऑफ़ सैंड' ने रचा इतिहास

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टॉम्ब ऑफ़ सैंड को पुरस्कार - फोटो : Twitter
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हिंदी भले ही दुनिया में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा नहीं है लेकिन बीती रात से इसकी चर्चा दुनियाभर में हो रही है। लोग हिंदी के उस उपन्यास के बारे में जानने के लिए इंटरनेट, समाचारों की ख़ाक छानने में जुट गए हैं जिसे इस वर्ष का 'अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार' मिला है।

हिंदी की ख्यातिप्राप्त लेखिका गीतांजलि श्री को उनके उपन्यास 'टॉम्ब ऑफ़ सैंड' के लिए गुरुवार की रात लंदन में 2022 के अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार से नवाज़ा गया। यह उनके हिंदी उपन्यास रेत समाधि का अंग्रेज़ी अनुवाद है। इसका अनुवाद डेज़ी रॉकवेल ने किया है। यह बुकर पुरस्कार के इतिहास में सम्मानित पहला हिंदी भाषा से अनुवादित उपन्यास है। 

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इस प्रतिष्ठित पुरस्कार का मिलना भारत के लिए विशेष गौरव की बात है। यह भी कहा जा सकता है कि बुकर पुरस्कार मिलने से लेखिका गीतांजलि श्री के साथ सभी भारतवासी व ख़ासतौर पर हिंदी भाषियों को साहित्य के क्षेत्र में गौरवान्वित होने का मौका मिला है, क्योंकि टॉम्ब ऑफ़ सैंड पहली हिंदी से अनुवादित, पहली भारतीय और पहली दक्षिण एशियाई  उपन्यास है जिसे यह प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुआ है।

बुकर पुरस्कार सालाना उस किताब को मिलता है जिसका अंग्रेज़ी में प्रकाशन यूके या आयरलैंड में हुआ हो। इस पुरस्कार में 50 हज़ार पाउंड का नक़द पुरस्कार दिया जाता है। यह राशि लेखक और अनुवादक के बीच बराबर भाग में विभाजित होती है। 
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Hindi author Geetanjali Shree’s novel #रेत_समाधि, ’Tomb of Sand’ wins International #BookerPrize , becoming 1st novel translated from Hindi to do so. #GeetanjaliShree is not only the award’s first Hindi winner, but also it is for 1st time a book originally written in any Indian language has won the booker prize. The novel translated by Daisy Rockwell has won 50,000 Pounds prize - which will be split between author and translator equally. Pic: @TheBookerPrizes

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- All India Radio News (@airnewsalerts) 27 May 2022

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बुकर पुरस्कार की घोषणा - फोटो : Twitter
भारत के लिए गौरव का विषय

बीती रात लंदन में बुकर पुरस्कार की घोषणा होते ही सोशल मीडिया पर गीताजंलि श्री और भारतवासियों के लिए बधाइयों का तांता लग गया। इस वर्ष पहली दफ़ा किसी हिंदी उपन्यास के बुकर पुरस्कार की रेस में शामिल होने की वजह से अंतर्राष्ट्रीय हिंदी लेखकों और भाषा प्रेमियों के लिए ख़ास तौर पर कौतूहल बना हुआ था।

इस मौक़े पर गीतांजलि श्री ने कहा-
यह पुरस्कार सिर्फ़ मेरे लिए व्यक्तिगत तौर पर नहीं है। बल्कि मैं एक भाषा और संस्कृति का प्रतिनिधित्व भी करती हूं। इस पुरस्कार ने हिंदी साहित्य और भारतीय साहित्य को समग्र व्यापक दायरे में ला दिया है। इससे यह भी पता चलता है कि साहित्य की एक ऐसी विशाल दुनिया है जिसे अभी भी खोजा जाना बाक़ी है।

उन्होंने इस मौक़े पर अपनी 95 वर्षीय माँ के साथ परिजनों  का धन्यवाद करने के साथ उपन्यास के हिंदी प्रकाशक अशोक माहेश्वरी (राजकमल प्रकाशन) का भी विशेष रूप से आभार किया। 

“टॉम्ब ऑफ़ सैंड” के साथ दुनिया के पाँच अन्य पुस्तक भी बुकर पुरस्कार की प्रतिस्पर्धा में शामिल थे। इनमें बोरा चुंग लिखित कोरियाई भाषा की 'कर्सिड बनी” ( अनुवादक-एंटोनियो हूर), जॉन फॉसे लिखित 'ए न्यू नेम: सेप्टोलॉजी VI-VII (नॉर्वेजियन से डेमियन सियर्स द्वारा अनुवादित), मीको कावाकामी लिखित 'हेवेन' (जापानी से सैमुअल बेट और डेविड बॉयड द्वारा अनुवादित), क्लाउडिया पिनेरो लिखित 'एलेना नोज़'(स्पैनिश से फ्रांसिस रिडल द्वारा अनुवादित) और ओल्गा टोकार्ज़ुक लिखित 'द बुक्स ऑफ जैकब'(पोलिश से जेनिफर क्रॉफ्ट द्वारा अनुवादित) शामिल थे। 

विभाजन से जुड़े किस्से

इस उपन्यास को भारत और विभाजन से जुड़ी बेहतरीन किताब कहा गया है। इस उपन्यास में एक 80 वर्षीय उस महिला की कहानी है जो अपने पति के मरने के बाद गहरे अवसाद में चली जाती है और कुछ समय बाद फिर से अपने जीवन में जान फूंकने की कोशिश करती है। इस क्रम में उसे तमाम उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ता है।

इस दौरान वह पुनर्मूल्यांकन करती है कि एक माँ, बेटी, महिला और नारीवादी होने का क्या मतलब होता है? गीतांजलि श्री ने एक गंभीर विषय को चुनने के बावजूद इस उपन्यास को बेहद रोचक और दिलचस्प तरीक़े से लिखा है। जो पाठक को हमेशा ही उपन्यास से बांधे रखती है।

इस उपन्यास को हिंदी में साल 2018 में प्रकाशित किया गया था। इस किताब को सबसे पहले एक फ़्रेंच अनुवादक ने दुनिया के सामने लाने का फ़ैसला लिया और इसके बाद ही इसका अंग्रेज़ी रूपांतरण किया गया। दरअसल लंबे समय से अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त भारतीय लेखक अंग्रेज़ी में अपनी किताबें लिख रहे हैं।

शायद यही वजह है कि अबतक अन्य भारतीय भाषाओं की किताबों के अनुवाद को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई देती थी। लेकिन हिंदी उपन्यास को इतिहास रचने का मौक़ा मिला है तो निश्चित रूप से इसका फ़ायदा दूसरे भारतीय भाषाओं समेत अन्य दक्षिण एशियाई भाषाओं के लेखकों को भी मिलेगा।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw।co।in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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