खय्याम जिसने रेशम सरीखी वो धुनें बांधी थीं और एक ज़माना जीता था।
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मेरी पैदाइश के बहोत पहले उस फ़नकार ने रेशम सरीखी वो धुनें बांधी थीं और एक ज़माना जीता था। मेरी पैदाइश के पहले वो बहोत नौजवां था। जब मैं नौजवां हुआ तो उन्हीं धुनों से फिर अपने को जोड़ लिया। उनको सुनकर ही सोता, जागता, अपने हालात का तर्जुमा उनके मआनी में करता। इस तरह एक राब्ता बना। ये राब्ता उन धुनों से था या उस शख़्स से, जिस पर वो धुनें नाज़िल हुई थीं, ये तो मालूम नहीं। मेरी पैदाइश के पहले जो नौजवां था, वो आज मर गया, जबके अब तो मैं भी नौजवां नहीं, तो मैं सोग़ किसका मनाऊं? उसका या अपना?
बहुतेरी मौतें मर्गे नागहां नहीं होतीं। सालों साल धीरे-धीरे जलने के बाद एक ख़ुशगवार सुबह ज़िंदगी का फ़ानूस एक सपने की तरह बुझ जाता है। नींद खुलने पर टूटने वाले सपने की तरह नहीं, उस तरन्नुम की तरह जो नींद टूटने के बाद देर तलक हमारे ख़ून में बेख़ुदी की धड़कन की तरह गूंजता है।
लेकिन मरसिये का एक दस्तूर ज़रूर होता है। मरसिये का एक दिन मुअय्यन रहता है। एक दिन मन भरकर, मातम की मसर्रत को चुगने के बाद, अगले रोज़ हम उससे ऊब जाते हैं। ऐन मातम के रोज़ सोग़ ना मनाएं तो यार लोग ही आकर पूछ बैठें के क़िब्ला मोहतरम की रुख़सती पर यों ख़ामोशी क्यूं है। कुछ तो बोलिये! दो रोज़ बाद ये ही आके कहेंगे कि अब तो बिन मौसम का मल्हार है, अब बस भी कीजिये। ज़माना आगे बढ़ चला। कि मातमपुर्सी में इतनी खेंच मुनासिब नहीं।
जिस भरपूर ज़िंदगी का हासिल एक रोज़ की अनमनी मातमपुर्सी हो, उसका यों भी क्या मोल?
मुझे याद है एक दफ़ा गुज़िश्ता ज़माने के एक अदाकार की मौत की ख़बर आई। उस रात मैं देर तलक उसके गाने देखता रहा। उन गानों में वो इतना ज़िंदा मालूम होता था कि गला रूंध गया। यों लगा जैसे ये जवां मौत हो। कि जैसे वो अदाकार यों ही झूमते नाचते अचानक खेत रहा हो। कलेजा पकड़कर गिर पड़ा हो। मैं भूल ही गया था कि धूप-छांह के इस खेल के बाद वो और पचास साल जीया और ख़ूब बूढ़ा होकर मरा था!
लेकिन क्या वो एक दिन में बूढ़ा हो गया था, एक दिन में मर गया था? या वो मरा भी था या नहीं? एक दिन में भला कौन मरता है? और जो एक दिन में नहीं मरता, क्या वो कभी मर सकता है भला?
खय्यामः ज़ेहन अब ख़ाक हो गया पर धुनें रह गईं।
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मरसिये का दस्तूर ही सही, रिवाज़ ही ठीक, पर मुझको मालूम नहीं मैं कैसे मातम करूं। खय्याम मर गया, आप बतलाते हैं, मैं चुपचाप सुन लेता हूं। अब ये असूल है, क़ायदा है के ऐसे मौक़े पर आप उनके फ़न की, उनके ख़ुलूस की ख़ुसूसियत गिनाएं। यों ये अपने में एक बेकार क़वायद नहीं, पर मैं समझ नहीं पाता मैं ये आज क्यूं करूं? मेरी पैदाइश के पहले जो नौजवां था, मेरी नौजवानी के बाद जो मरा, उससे मेरा यों भी क्या राब्ता, सिवाय इस तआर्रुफ़ के कि ये था वो ज़ेहन, जिस पर वो जादुई धुनें तारी हुईं! वो ज़ेहन अब ख़ाक हो गया पर धुनें रह गईं, तो अब मैं किस पर रोऊं?
ऐ खय्याम , मेरे मेहबूब मौसिक़ार, मैंने तेरे बाबत् ख़ूब बातें करना हैं, पर आज ना करुंगा। आज भला क्यूं करूं? आज हुआ ही क्या है? याद है, मख़दूम की एक ग़ज़ल को तुमने धुन में बांधा था, और उसको फूलों की सिफ़त अता की थी। दो हज़ार पंद्रह की एक तमाम शाम में वो गाना गुनगुनाता रहा और थककर हार गया था। मैं अपने भीतर फिर उस शाम को तलाशूंगा, ये शामे ग़म की क़सम है मुझको। जिस दिन वो मेरे डौल में जागी, मैं उसको उसी दिन गाऊंगा। जीऊंगा। मरूंगा।
ऐ खय्याम , मेरे मेहबूब मौसिक़ार, मैंने तो नहीं पढ़ना आज तेरे नाम का फ़ातिहा!
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