जब बिमल रॉय के असिस्टेंट बने गुलजार
- फोटो : फाइल फोटो
कभी अमृतसर तो कभी दिल्ली, भटकती आत्मा की तरह आधी अधूरी पढ़ाई और उस न दिखने वाली खिंची हुई लकीर से बने न भरने वाले घाव। खुद की खोज से परेशां, फिर छोटे-छोटे शहरों से खाली बोर दुपहरों से ये तो झोला उठा के चले। कभी पेट्रोल पम्प तो कभी गराज का मकैनिक, ये सरदार बेचैन हो कर थिएटर वालों के साथ जुड़ गया। वहां मशहूर गीतकार शैलेंद्र की नज़र चढ़ गए और बिमल रॉय के असिस्टेंट की नौकरी पकड़ ली। फिर एक दिन एसडी बर्मन के घर भिजवाए गए। फ़िल्मकार बिमल रॉय और दादा बर्मन के कहने पर 5 दिन में एक गीत ठोक दिया। हां मगर इस पागल आदमी ने पहले तो गाना लिखने से मना ही कर दिया था, ये कह के कि मैं तो असिस्टंट डायरेक्टर हूं, भला मैं गाना क्यों लिखूं? सोचो, है न पागल?
गुलज़ार गाना नहीं लिखेगा, कोई सोच सकता है?
इनके इसी पागलपन के चंद नमूने आज प्रस्तुत करुंगा। इनके फ़िल्मी गीतों के लिरिक्स के माध्यम से। ये वो नमूने हैं जो गाने की मलमल को इमोशंस की अंगूठी में से निकाल लाते हैं। मगर हम जैसे लोग तो उनके सवाल पर अपना सवाल दागना चाहते ही हैं। ये लिखा कैसे? लिखा तो क्यों? इसका मतलब क्या है? किसको समझ आ रहा है? पर ये जो सरस्वती पुत्र है न, उन्हीं की तरह "या श्वेत वस्त्रावृता" रहते हुए, सफ़ेद सफ़हे पर काली स्याही (एक्चुअली नीली, मगर काली बड़ी रोमांटिक लगती है), से थोड़ा-थोड़ा पागलपन लिख रहा होता है, तो शुरू करें। आपको पसंद आए या याद आए तो फेहरिस्त बढ़ा सकते हैं, इनकी ताउम्र जवान रहने वाली कलम की तरह।
कजरारे कजरारे - बंटी और बबली
आंखें भी कमाल करती हैं, “पर्सनल” से सवाल करती हैं।एक बेहद श्रृंगारिक और मनचले गीत “कजरारे कजरारे” के बीच में ये “पर्सनल”से सवाल क्या हैं भाई? ये यूपी के पोलिसवाले कहां नाचने वाली का प्रोग्राम देखने लगे वो भी एक ठग के साथ। कमसिन काया वाली कमर को बल खिला के कहती है, "सुरमे से लिखे तेरे वादे, आंखों की ज़बानी आते हैं"। इसमें सुरमे से ही वादे क्यों कर लिखे, क्या दोनों आंखों में आंखें डालकर बैठे थे। क्या बात हुई ही नहीं, या आंखों-आंखों में बात होने को एक नए तरीके से प्रस्तुत किया है।
कल्लू मामा - सत्या
मुंबई के टपोरी गाते हैं- गोली मार भेजे में, के भेजा शोर करता है। भेजे की सुनेगा तो मरेगा कल्लू। ये गोरा चिट्टा, चश्मे वाला सिंगल पसली का आदमी, कब जा के मवालियों जैसा लिखने लगा। और उनकी फ़िलॉसॉफ़ी भी इतनी सिम्पल तरीक़े से? दिन में खोली, रात तीन बत्ती पे गुज़ार दी, थोड़ी चढ़ गई तो तीन पत्ती में उतार दी। पूरा दिन और रात दो लाइन के ऑब्जरवेशन में कैसे आया सफ़ेद मामा?
वैसे इसी फिल्म में एक मराठी गैंगस्टर भीखू म्हात्रे, कैसे पंजाबी ट्यून पर पंजाबी गाना जाता है - सपने में मिलती है, कुड़ी मेरी सपने में मिलती है। इस बात को कोई कैसे समझे?
मेरा कुछ सामान - इजाज़त
116 चांद की रातें एक तुम्हारे कांधे का तिल। अब इस आदमी को क्या समझाएं। ये कांधे का तिल जो है वो लड़की ने कैसे देख लिया। और हम क्या समझें कि ये डैशिंग सा नसीर और साथ सेक्सी अनुराधा के बीच नाज़ुक-नाज़ुक कुछ हो चुका है? और 116 चांद की रातें यानी 116 पूर्णिमाएं। यानी नौ साल और 8 महीने। सीधे सीधे इतने लंबे टाइम का हिसाब नहीं मांग पा रहे?
गीला (या फिर गिला) मन शायद, बिस्तर के पास पड़ा हो, वो भिजवा दो, मेरा वो सामान लौटा दो! क्या मांग रहे हैं जनाब। सोचिए तो? सावन के भीगे दिन रक्खे हैं और मेरे एक ख़त में लिपटी रात पड़ी है, वो रात बुझा दो, मेरा वो सामान लौटा दो।
पागल है क्या? ये कोई तरीक़ा है। मांगना है तो जो गिफ़्ट्स दिए थे वो मांगते! ये क्या भीगे दिन, रात बुझा दो। ऐसे कोई रात बुझती है भला!
इस मोड़ से जाते हैं - आंधी
अच्छा वो - इस मोड़ से जाते हैं कुछ सुस्त क़दम रस्ते, कुछ तेज़ क़दम राहें। पत्थर की हवेली को, तिनकों के नशेमन तक, इस मोड़ से जाते हैं। क्या समझा जाए। ये मोड़ जो है बड़ा कॉम्प्लिकेटेड है। मोड़ से कई चीज़ें जा रही हैं। कभी स्लो हो गए। कभी फ़ास्ट हो गए। और मोड़ के बाद पत्थर की हवेली है। बढ़िया है। तो फिर ये तिनकों का नशेमन, ये नशेमन क्या है, और ये तिनकों का क्यों है, पत्थर का क्यों नहीं है? दो अलग-अलग बिल्डिंग्स हैं क्या? चाचा लिखते समय इक लाइन के इतने मतलब निकालके लिखते हैं की हर सुनने वाले को एक नया मतलब समझ आता है।
आने वाला पल - गोलमाल
वो अमोल पालेकर वाला - एक बार वक़्त से लम्हा गिरा कहीं, वहां दास्तां मिली, लम्हा कहीं नहीं। थोड़ा सा हंसा के थोड़ा सा रुला के, पल ये भी जाने वाला है - ये बताओ वक़्त से लम्हा गिरता कैसे है? क्यों गिरता है? और लम्हा कोई ऑटमैटिक्ली दास्तां में कन्वर्ट हो गया क्या? कुछ भी लिखना है बस! वैसे अमोल पालेकर यानी लक्ष्मणप्रसाद दशरथ प्रसाद शर्मा उर्फ़ लकी, ज़िंदगी तो !!
सातों बार बोले बंसी - दिल पड़ोसी है
सातों बार बोले बन्सी, एक ही बार बोले ना। तन की लागी सारी बोले, मन की लागी खोले ना - 7 छेद वाली कृष्ण की बांसुरी में से भी 7 ही सुर निकलेंगे ना पागल आदमी, इसमें नया क्या है? और फूंक मारना पड़ेगी, होंठ छुआना पड़ेंगे तभी बजेगी। मन में क्या है वो बांसुरी नहीं बता सकती। और बांसुरी के मन में तो कुछ होता नहीं है।
बिना बात के कॉम्प्लिकेशन! और इस एल्बम का क्या कहूं, पंचम और आशा के साथ वाला अल्बम - दिल पड़ोसी है। वाह, क्या नाम है। पड़ोसी से आजकल कोई बात भी नहीं करता। पहले तो फिर भी शक्कर लेने या दही का जामन लेने कभी कभी चले जाते थे। पड़ोसी के पास घर की चाबी होती थी। और उस से पहले तो पड़ोसी से अच्छी ख़ासी बातचीत होती थी, घर जैसा ही माहौल था। तो क्या दिल अब भी पड़ोसी है?
जिया जले जान जले - दिल से
मलयालम में मारन वाला हिस्सा (जो हिंदी भाषी लिख लिखकर याद करते हैं) गुलज़ार ने नहीं लिखा था। मगर बाकी का गाना। तौबा तौबा! सुहागरात का ऐसा वर्णन!! मसले फूलों की महक में तितलियों की क्यारियां, रात भर बेचारी मेहंदी पिसती है पैरों तले। कोई सुनेगा तो क्या कहेगा। और ऊपर से लता मंगेशकर कैसे मान गईं, ये गाने के लिए! देखते हैं तन मेरा, मन में उठती है जलन। इतना फिज़िकल डिस्क्रिप्शन गुलज़ार ने इस से पहले किसी और गाने में शायद ही किया हो और लता जी ने शायद ही गाया हो।
ओये बॉय चार्ली - मटरु की बिजली का मंडोला
अश्लील भी हैं। तेरे कर्व बहुत हैं मोड़ बहुत, हर मोड़ पे दौड़ के देखता हूं। 60-70 साल के पंकज कपूर, अपनी ठरक का ऐसा परिचय देंगे? अब यही रह गया है? गुलज़ार ने बड़ी अदायगी से पंकज के रंगीले करैक्टर हरफूल सिंह मंडोला उर्फ़ हैरी को एक बार फिर हिंदी-इंग्लिश वाली पोएटिक जुबां दे कर, बात में मस्ती पैदा कर दी। अजब है ये तो। मगर गाने से किसी भी करैक्टर को एस्टब्लिश करने का ये प्रयोग, बड़ा ही मज़ाहिया रहा। ज़रूरी नहीं है कि वोडका की बोतल, पार्टी, लड़की, जैसे शब्द लिखकर ही गाना बनाया जाए, कभी-कभी बात का मतलब भी नाचने के लिए बहुत होता है।
नमक इश्क़ का - ओंकारा
पागल गुलज़ार ऐसा कुछ लिख देते हैं कि मन में बिपाशा बासु को लेकर कई प्रकार के ख्याल आने लगते हैं। भीतर-भीतर आग लगे, बात करुं तो सेक लगे! ये गरम सांसें आई कहां से गुलज़ार साहब? क्या हो गया है यहां? फिर आगे लिखते हैं - सभी छेड़े हैं मुझको सिपाही, बांके, छमिए; उधारी देने लगे हैं गली के बनिए।
लड़की की अदाकारी पर ऐसा मनचला गीत लिखना बड़ी हिम्मत का काम है। अजी थोड़ी थोड़ी शहद चटा दे। तेज़ था झोंका क्या करुं, सीसी करती मैं मरुं! अब ये सुन के किस से रुका जाएगा, कि केसू फिरंगी तो क्या, पूरा शहर बिल्लो का पीछे पड़ जाएगा। मैंने कहा था न कि गुलज़ार पागल है। कुछ भी लिख सकता है।
हर गीत के पीछे गुलज़ार की एक मंशा है।
- फोटो : फाइल फोटो
मैं एक-एक गीत निकाल के उसके पीछे की गुलज़ार की मंशा समझा सकता हूं जो मुझे लगती है। औनी-बोनी यारियां तेरी, छई छप छई, वीआयपी अंडरवियर बनियान, गीला-गीला पानी, खामोश सा अफसाना पानी से लिखा होता, बीड़ी जलाई ले जिगर से पिया, उम्र कब की बरस के सुफैद हो गई, तेरे बिना बेसुवादी रतिया। जाने कितने गाने हैं जिनमें हर लफ्ज़ चुन-चुन के, सर्राफे का कोई पुराना कारीगर नन्हे हीरे जड़े जा रहा हो और रानी का आलीशान हार या कमरबंद बना रहा हो जैसे! गुलज़ार को कोई कहता नहीं है कि चाचा, इतना डिफिकल्ट मत लिखिए, क्योंकि और कोई इस लेवल पर नहीं आ पाएगा। मगर ये तो वो पीर है जो दोनों हाथ आसमान में उठाकर गोल चक्कर लगाता है और गाने का सूफियाना कलाम जैसे अब्र की तरह उतर आता है। फिर शब्द बरसते हैं और इस बहाव में भावनाएं निकल आती हैं।
गुलज़ार को सुना तो कैसे भी जा सकता है, हां मगर समझ लीजिए कि हमने देखी है उन बातों (फिल्म में आंखों है) की महकती खुशबू और इस इत्र की खुशबू आने वाली कुछ पीढ़ियों तक तो नहीं जाएगी।
मैंने पहले भी कहा है, इनकी लेखनी से इनकी उम्र का पता ही नहीं चलता। अगर ध्यान से न सुनें तो बात का मजमून समझना और भी मुश्किल है। इनके फेवरेट म्यूजिक डायरेक्टर्स जैसे पंचम/ रहमान और आजकल विशाल भारद्वाज जो इनके दत्तक पुत्र जैसे हैं। सब के सब की एक ही खासियत है।
ये भांग हैं। ये शराब नहीं है। ये म्यूजिक डायरेक्टर्स का काम यानी भांग का नशा है, जो धीरे-धीरे चढ़ता है, फिर आपके दिमाग पर काबिज़ हो जाता है और आने वाले कई दिनों तक जाता भी नहीं है।
गुलज़ार के लिखे हुए गाने भी ऐसे ही हैं। पहली बार में तो लगेगा कि क्या वीयर्ड लिरिक्स हैं। फिर दूसरी-तीसरी और आने वाली हर बार सुन के इस प्याज की परतें खुलती ही रहती हैं, आंखों में आंसू आते रहते हैं मगर ये परतें ख़तम नहीं होती।
गुलज़ार अपने आप में एक क़िस्सा है, कहानी है, पहेली है, ज़िंदगी की मुंहबोली सहेली है। एक खड़ी बोली के
गीत “मोरा गोरा अंग लई लेसे शुरु कर
इस आदमी ने बाबा की वो पोटली खोल दी जिसमें क़िस्सों का कहानियों का गीतों का छाबा है। मिलना तो मुझे भी है मगर देखिए ये सफ़ेद कौवा कब कहेगा - हमरी अटरिया पे आजा रे विप्लववा। गुलज़ार ने खुद ने जितना लिखा है, उस से ज़्यादा उन पर, उनके काम पर लिखा जा सकता है। मगर जो आदमी बच्चों की पिक्चर में एक रेलवे इंजन ड्राइवर से गाना गवाने की हिमाकत कर सकता हो वो भी मनचला - धन्नो की आंखों में रात का सुरमा और चांद का चुम्मा। तो ऐसे आदमी को मैं तो कहता हूं "सम्पूरण" रूपेण पागल।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।