2010 के बाद आई फिल्मों में पर्दे पर मुंबई दर्शन दुर्लभ हो चले थे। मुम्बईया सिनेमा का दायरा विस्तृत हो चला था।
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ये बदलाव कोई रातों-रात नहीं हुए। नब्बे के दशक के मध्य में ही यशराज की कालजयी फिल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे को याद कीजिए। फिल्म पंजाब से निकल कर आपको यूरोप के सैर पर ले जाती है और वापस पंजाब पर आकर ही खत्म हो जाती है। ऐसा नहीं है कि दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे के बाद मुंबई रूपहले पर्दे से अचानक गायब हो गया लेकिन हां बॉलीवुड की पृष्ठभूमि अब सिर्फ मुंबई तक ही सीमित नहीं रह गई। 1998 में आई रामगोपाल वर्मा की सत्या ने एक अलग ही मुंबई के दर्शन कराए जिसकी गलियां रूमानियत नहीं बल्कि हिंसा से भरी हुई थीं।
नई सदी का आगमन नई सोच से भरे हुए युवा निर्देशकों का भी आगमन था। 2001 में आई नवोदित निर्देशक फरहान अख्तर की फिल्म दिल चाहता है ने दर्शकों को एक नई मुंबई से रूबरू कराया। जिसमें रहने वाले इंग्लिश गाने सुनते हैं, छुट्टी मनाने मर्सिडीज से गोवा रोड ट्रिप पर जाते हैं। अब पृष्ठभूमि के तौर पर मुंबई अनिवार्य नहीं थी। हालांकि बीच-बीच में कंपनी, टैक्सी नंबर 9211, वेक अप सिड जैसी फिल्में भी आईं जिनमे मुंबई सिर्फ एक पृष्ठभूमि भर नही बल्कि कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी थी।
2010 के बाद आई फिल्मों में पर्दे पर मुंबई दर्शन दुर्लभ हो चले थे। मुम्बईया सिनेमा का दायरा विस्तृत हो चला था। सिनेमा का रंग-रूप बदल रहा था। अब ऑफ बीट और मसाला फिल्मों के बीच फासला कम हो रहा था। फिल्मकारों में कुछ अलग और प्रायोगिक सिनेमा बनाने की हिम्मत आ चुकी थी और नई और प्रायोगिक कहानियों में पृष्ठभूमि कहानी के हिसाब से ही होती हैं।
महाराष्ट्र के अलावा भी कई राज्य सरकारें अपने-अपने राज्यों मे फिल्म मेकिंग को प्रोत्साहित कर रही हैं।
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दौर बदला, कहानियां और उनके कहने के तरीके बदले तो हर कहानी की पृष्ठभूमि भला मुंबई कैसे रह पाती? जब छोटे शहर की पृष्ठभूमि पर बनीं फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर पैसे छापने लगीं तो तो इस नए-नए ट्रेंड ने और जोर पकड़ा। फिल्म निर्माता मुंबई के इतर भी कहानियों की संभावनाएं तलाशने लगे।
नए दौर के फिल्म मेकर्स नई कहानियों की तलाश में पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की ओर मुड़े तो मुंबई मानो पीछे ही छूट गई। कुछ फिल्में तो ऐसी भी आईं जिनकी शुरुआत तो मुंबई से हुई लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती गई मुंबई पीछे छूट गई। बीते सालों में ब्लैकमेल, अंधाधुन जैसी कुछेक फिल्में ही आईं जो शुरू से अंत तक मुंबई के ही इर्द-गिर्द घूमती रहीं। और ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ कहानियों मे आए बदलाव की वजह से ऐसा हुआ। कहानियों में बदलाव के अलावा कई और बाहरी कारक भी हैं जिसने रूपहले पर्दे पर मुंबई की उपस्थिति को कम करने में भूमिका निभाई।
महाराष्ट्र के अलावा भी कई राज्य सरकारें अपने-अपने राज्यों मे फिल्म मेकिंग को प्रोत्साहित कर रही हैं। फिल्मकारों को अब महाराष्ट्र के बाहर भी अब वैनिटी वैन, जूनियर आर्टिस्ट और शूटिंग से जुड़ीं अन्य सुविधाएं उपलब्ध हैं तो अब फिल्मकार भी सिर्फ मुंबई में शूटिंग करने को बाध्य नहीं रह गए। ये भी एक कारण है फिल्मकारों का मुंबई से मोहभंग होने का।
अब जब पर्दे पर मुंबई नहीं दिखती तो कुछ खालीपन सा महसूस होता है। हिन्दी फिल्मों में मुंबई को हम सबने इतना देखा की कतरा-कतरा मुंबई हम सब सिनेप्रेमियो के दिल में उतर गई। और अब बॉलीवुड फिल्मों में मुंबई का ना होना या कम होते जाना कुछ अखरता है।
अब दिन जुहू बीच पर नहीं ढलते. ना ही किरदार गेटवे ऑफ इंडिया के सामने कबूतरों को दाना खिलाते समय आखों ही आंखों में एक दूसरे से जज्बात साझा करते हैं। पर्दे पर काली-पीली टैक्सियों की जगह इम्पोर्टेड गाड़ियों ने ले ली है। फिल्में अभी भी बन रही हैं। कहानियां अब भी गढ़ी जाती हैं, लेकिन फिर भी कुछ तो कमी महसूस होती है. एक शहर की कमी जो बस एक शहर नहीं बल्कि एक मुकम्मल किरदार हुआ करती थी।
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