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‘दस साल…’– एक किताब के बहाने जेपी की याद और कुछ अहम सवाल

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JP - फोटो : Amar Ujala
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चौहत्तर आंदोलन के वक्त मैं आठवीं क्लास में पढ़ता था। पटना की सड़कों पर अक्सर तत्कालीन मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर के खिलाफ खूब जुलूस निकलते थे। छात्रों का आंदोलन गुजरात से होकर धीरे धीरे बिहार के छात्रों और युवाओं में आक्रोश भर चुका था। हर स्कूल-कॉलेज में आंदोलन को लेकर खासा जोश था और लगता था कि इसमें शामिल न हुए तो जिंदगी बेकार है। बड़े भाई अंचल सिन्हा शुरू से ही जेपी आंदोलन के अहम कार्यकर्ताओं में रहे थे। घर में बैठकें होती थीं। बिहार छात्र संघर्ष समिति से लेकर छात्र युवा संघर्ष वाहिनी तक का बनना और उसके विस्तार की कई कहानियां हमारे घर से जुड़ी रहीं।

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वरिष्ठ लेखक और पत्रकार सुदीप ठाकुर की ताजा किताब – ‘दस साल, जिनसे देश की सियासत बदल गई’ पढ़ते हुए अचानक वह सारे दृश्य जीवंत हो उठे। 5 जून 1974 की गांधी मैदान की जेपी की ऐतिहासिक और विशाल जनसभा, संपूर्ण क्रांति का नारा, 4 नवंबर 1974 को छात्रों पर लाठीचार्ज, रैली के दौरान पुलिस की बर्बरता के बीच जेपी का सड़क पर गिरना और उन्हें पुलिस की लाठियों से बचाने के लिए युवाओं का उन्हें घेर लेना, उस दौर के मशहूर फोटोग्राफर कृष्ण मुरारी किशन की अद्भुत और जीवंत फोटोग्राफी, फणीश्वरनाथ रेणु का भाषण, आनंद बादार पत्रिका के हिन्दी साप्ताहिक रविवार के पहले अंक के कवर पर रेणु और जेपी की तस्वीर, गांधी मैदान की सभा में रेणु द्वारा दिनकर की पंक्तियों का जोशीला पाठ, कदमकुआं के कांग्रेस मैदान में रेणु का भाषण, पटना के साहित्य सम्मेलन में जनकवि नागार्जुन की चर्चित कविता (इंदु जी इंदु जी क्या हुआ आपको, सत्ता की मस्ती में भूल गईं बाप को) सुनना, जेपी के बेहद करीबी और उनके सचिव सच्चिदानंद सिन्हा के घर आना जाना, महिला चरखा समिति में डायलिसिस के दौरान जेपी से दो बार मिलना, आशीर्वाद लेना, अंचल जी (जिन्होंने आंदोलन के दौरान अपना नाम कमल चंदर रख लिया था) की गिरफ्तारी, करीब नौ महीने फुलवारी शरीफ जेल में रहना और उस दौरान मेरा जेल में अक्सर आना जाना, सबकुछ एक फ्लैशबैक की तरह फिर से सामने आ गया।

सुदीप ठाकुर ने अपनी किताब के सबसे अहम अध्याय आपातकाल में इन घटनाओं का जिस तरह चित्रण किया है, वह आपको उस दौर में ले जाता है जहां से वाकई देश की राजनीति ने एक नई करवट ली। किताब तमाम शोध और उस दौर के अहम किरदारों से बातचीत के आधार पर तैयार की गई है। राजकमल प्रकाशन ने सार्थक शृंखला के तहत इसे छापा है। सही अर्थों में कहें तो इसे पढ़ना वाकई आपको आज के संदर्भ में सार्थक लगेगा क्योंकि आज जो लोग देश की सत्ता के शीर्ष पर बैठे हैं या फिर तमाम गैर कांग्रेसी राजनीतिक पार्टियों के मुखिया या नेता हैं, वो खुद को जेपी का भक्त या उस आंदोलन की उपज होने का दावा करते हैं। भले ही वे ये भूल चुके हों कि जेपी आंदोलन इंदिरा की उसी तानाशाह, निरंकुश और जनविरोधी नीतियों के खिलाफ था जिसकी झलक आज भी अपने आधुनिकतम रूप में देखने को मिलती है।
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जेपी के जन्मदिन या पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए बहुत सारे सरकारी और सियासी कार्यक्रम होना कोई खास बात नहीं है। लेकिन कमोबेश आज भी वही सवाल सतह पर हैं, यह आरोप भी लगते हैं कि अघोषित आपातकाल है, जनता सरकार की नीतियों से त्राहिमाम कर रही है, महंगाई-बेरोजगारी चरम पर है। इस किताब में यह सवाल मजबूती के साथ उठाने की कोशिश की गई है कि जिस जेपी ने 1974 आंदोलन की शुरुआत करते हुए सभी को अपनी अपनी राजनीतिक पार्टियों को छोड़कर आने को कहा था, एक संपूर्ण क्रांति का नारा दिया था, सभी विचारधारा के लोगों और पार्टियों को अपने साथ जोड़ा था और आरएसएस को भी अपने ‘हिन्दुत्व’ को त्यागकर देश और सर्वसमाज के हित की बात करने को कहा था, क्या जेपी का वह सपना ‘कुछ हद तक भी’ पूरा हो पाया है?

जेपी ने इंदिरा गांधी की जनविरोधी नीतियों और तानाशाही के विरोध में इतना बड़ा आंदोलन खड़ा किया, जिसे कुचलने के लिए इंदिरा गांधी को 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक यानी कुल 21 महीनों के लिए इमरजेंसी लगानी पड़ी, तमाम नेताओं को जेल में डालना पड़ा, इमरजेंसी के दौरान ही आखिरकार 1977 में आम चुनाव करवाने पड़े और आखिरकार चुनाव में कांग्रेस को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। जेपी के नेतृत्व में तमाम पार्टियों ने मिलकर जनता पार्टी के नाम से चुनाव लड़ा और 295 सीटें हासिल कर जबरदस्त जीत दर्ज की और कांग्रेस गठबंधन को महज 154 सीटों पर समेट दिया।

सुदीप ठाकुर की किताब में 70 के दशक की जिन अहम घटनाओं का ज़िक्र है उनमें सबसे महत्वपूर्ण यही हिस्सा है जहां से भारतीय सियासत का चेहरा बदल गया। इसके पीछे की वजहें भी सुदीप ने अपनी किताब में तलाशने की कोशिश की हैं। किताब को जिन पांच हिस्सों में बांटा गया है उनमें इंदिरा गांधी के गरीबी हटाओ के नारे की पड़ताल के साथ साथ राजशाही के खात्मे और लोकतंत्र की जाजिम यानी प्रिवी पर्स, कोयले का राष्ट्रीयकरण और खदानों से उठे आंदोलनों के साथ साथ जनसंख्या नियंत्रण या परिवार नियोजन कार्यक्रम और इंदिरा शासन में सबसे असरदार उनके छोटे बेटे संजय गांधी के ‘जबरन’ नसबंदी कार्यक्रमों से उठे असंतोष और विवाद की बात बहुत विस्तार से की गई है। किताब में मोरारजी देसाई से लेकर जॉर्ज फर्नाडीज और उस दौर के तमाम समाजवादी, वामपंथी, लोहियावादी, दलित व पिछड़े नेताओं के अलावा किसान आंदोलनों, मजदूर यूनियनों के आंदोलनों, पीएसी विद्रोह से लेकर तमाम ऐसी घटनाओं का जिक्र है जिसने सत्तर के दशक को राजनीतिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण बना दिया।

किताब लिखते वक्त सुदीप ठाकुर रिसर्च और विश्वसनीय तथ्यों को समेटने में खास ध्यान देते हैं। उनकी पिछली किताब ‘लाल श्याम शाह – एक आदिवासी की कहानी’ खासी चर्चित हुई थी, उसका मराठी में अनुवाद भी हुआ और यह शोधपरक किताब एक दस्तावेज़ बन गई। ‘दस साल...’ में भी सुदीप ठाकुर ने शोध खूब किया, आपको हर पांचों अध्याय में सैंकड़ों ऐसे संदर्भ मिल जाएंगे। दरअसल जब आप ज्यादा शोध कर लेते हैं तो आपके लिए किसी किताब में सबको समेटना एक दुरूह काम होता है और यह बिखराव इस किताब में आपको मिल सकता है। कई बार आपको पढ़ते वक्त तारतम्यता टूटती हुई नज़र आ सकती है, लेकिन सुदीप ठाकुर की भाषा और उसका प्रवाह आपको इस कमी को महसूस करने से उबार लेता है।

जाहिर है किताब पढ़ते हुए मुझे 1979 के वो दिन भी याद आए जब जनता पार्टी टूटना शुरू हो चुकी थी, मोरारजी देसाई की जगह चरण सिंह प्रधानमंत्री बन चुके थे, जेपी अपने ही लोगों से हताश हो चुके थे, शारीरिक तौर पर दिन ब दिन उनकी हालत खराब हो रही थी। डायलिसिस पर ही लगातार रहते थे और महिला चरखा समिति में वाहिनी के कुछ बेहद करीबी लोग उनकी देखरेख करते थे। इशारों से अपनी बात कहते थे। आखिरकार आठ अक्तूबर 1979 की सुबह ये खबर मिलते ही हमें झटका लगा कि जेपी अब नहीं रहे। पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में उनका पार्थिव शरीर रखा गया। इंदिरा गांधी से लेकर संजय गांधी तक उन्हें श्रद्धांजलि देने आए और नौ तारीख को जब उनकी अंतिम यात्रा निकली तो पटना की सड़कों पर जनसैलाब उमड़ पड़ा। तब मैं इंटरमीडियट (आईएससी) का छात्र था। पटना के कॉमर्स कॉलेज में पढ़ता था। सेना के नियंत्रण में जेपी की शवयात्रा पटना की सड़कों से गुजर रही थी। कुछ देर ये जनसैलाब दूर से देखकर हम वापस लौट आए थे और रेडियो पर लगातार जेपी की अंतिम यात्रा का आंखों देखा हाल सुन रहे थे।

उस दौर को याद करते हुए अगर हम वैचारिक और व्यावहारिक धरातल पर देखें तो आज भी कई अहम सवाल पहले से भी विकराल और जटिल रूप में सबके सामने हैं। जनसंख्या विस्फोट तो है ही, किसान-मजदूरों के आंदोलनों का लगातार कमजोर पड़ते जाना, एक विभाजनकारी संस्कृति और सोच का खतरनाक तौर पर विस्तार पाना, रोजमर्रा की मुश्किलों का एक आम आदमी के लिए निरंतर जटिल होते जाना, एक निराशावाद और यथास्थितिवाद का समाज में फैलते जाना और सोशल मीडिया के इस दौर में एक बेहद विध्वंसकारी सोच का प्रचार प्रसार। सुदीप ठाकुर की किताब बेशक सत्तर के दशक के तमाम पहलुओं को सामने लाती है, साथ ही आज के दौर के साथ उन संदर्भों को जोड़कर एक मजबूत तानाबाना भी बुनती है। जाहिर है सुदीप ठाकुर ने आज के दौर की पत्रकारिता के झंझावातों के बीच इस गंभीर काम को सामने लाने का एक महत्वपूर्ण काम किया है। 

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