अभी कुछ ही दिन पहले की बात है। त्रिनेत्र जोशी ने बहुत झिझकते हुए फोन किया था और कहा था कि यार मैं पहले की तरह सक्रिय तो नहीं रह सकता, लेकिन लगातार लिखना चाहता हूं। बीच-बीच में अस्पताल जाना पड़ता है, इलाज बहुत महंगा है और तबियत अचानक कब बिगड़ जाती है, पता नहीं चलता। मैंने उनसे तब यूक्रेन और रूस के युद्ध पर कुछ लिखने का आग्रह किया था। व्हाट्सएप पर टुकड़े- टुकड़े में उन्होंने लिखकर भेजा, जो कुछ महीने पहले अमर उजाला के डिजिटल में ब्लॉग के तौर पर छपा भी था। खुश हुए थे और लगातार लिखने की इच्छा जताई थी। लेकिन फिर अचानक सन्नाटा हो गया। 22 सितंबर को देर रात खबर मिली कि त्रिनेत्र जी नहीं रहे। बेशक ये एक सदमे वाली खबर है। हिन्दी साहित्य और कविता में उनके लगातार योगदान को लोग जानते हैं, चीनी भाषा के वे बेहतरीन जानकार थे और चीनी से हिन्दी में उन्होंने तमाम महत्वपूर्ण पुस्तकों का अनुवाद भी किया। इसके साथ ही त्रिनेत्र जोशी बतौर पत्रकार लंबे समय तक सक्रिय रहे। बेहद बिंदास, संवेदनशील और बेबाक व्यक्तित्व के धनी त्रिनेत्र जोशी ने कभी कोई समझौता नहीं किया।
मौजूदा दौर के पत्रकार बेशक त्रिनेत्र जोशी को न जानते हों, साहित्य की दुनिया में भी उन्होंने अवार्ड और सम्मान पाने वाले साहित्यकारों की फेहरिस्त से खुद को दूर रखा, लेकिन उनकी कविताएं, उनके लेख, उनका रचनाकर्म बदस्तूर जारी रहा। उनकी कविताओं का आयाम बहुत व्यापक है। प्रकृति, पर्यावरण, रिश्तों की संवेदनशीलता, समाज और सियासत की बारीकियां, चीन में बिताए गए अपने वक्त के अनुभवों और चीन को अपने पहाड़ से जोड़ते हुए उन्होंने खूब रचनाएं लिखीं। उनकी कविताओं में आज के सामाजिक ताने-बाने के साथ साथ परिवार, रिश्तों की गहराई, दोस्ती के मायने और सियासत के विद्रूप चेहरे की झलक मिलती है। वहीं उन्होंने महाभारत के पात्रों को संदर्भ बनाते हुए एक लंबी कविता लिखी, जिसे आज की सियासी महाभारत के साथ जोड़कर पेश किया। कविता का शीर्षक है – अथ विश्वभारत:। ‘घूम गया कई मोड़’, गर्मियां, चिट्ठी, जाते हुए, झिलमिल, भीतर-बाहर, महानगर उनके प्रमुख कविता संग्रहों में हैं। प्रगतिशील वसुधा, साक्षात्कार, पहल, जलसा, शब्द के अलावा तमाम पत्र पत्रिकाओं में त्रिनेत्र जी लगातार लिखते रहे थे।
26 मई 1948 को रानीखेत में जन्मे त्रिनेत्र जोशी ने हिन्दी और चीनी भाषा में एमए किया, चीनी से हिन्दी और हिन्दी से चीनी में अनूदित उनकी पुस्तकों की एक लंबी फेहरिस्त है। चीनी से हिन्दी भाषा में उनकी कुछ महत्वपूर्ण अनूदित पुस्तकें हैं – आई छिंग समेत कई चीनी कवियों की कविताओं का अनुवाद, छाओ यूवी के चर्चित नाटक लेई यूवी के तूफान नाम से अनुवाद, डॉ. कोटनीस की पुस्तक का अनुवाद, चीन की लोक कथाओं के एक खंड का अनुवाद, उन्होंने प्रेमचंद की रंगभूमि, कृष्ण चंदर की एक लड़की, हजार दीवाने का चीनी भाषा में अनुवाद भी किया और इसका मंचन भी हुआ। बारिश में करुणानिधान, स्वतः स्फूर्त, यों ही और नववर्ष की पहरेदारी उनके द्वारा अनूदित महत्वपूर्ण कृतियां हैं।
करीब एक दशक तक चीन की राजधानी पेइचिंग में वे रहे जो अब बीजिंग है। वहां वे भाषा विशेषज्ञ के तौर पर काम करते रहे। चीनी रेडियो के साथ भी उनका लंबा रिश्ता रहा। कई पत्र पत्रिकाओं का संपादन उन्होंने किया, रेडियो, टीवी के साथ अखबारों की पत्रकारिता की लेकिन उनकी मूल पहचान एक कवि, लेखक औऱ अनुवादक की रही। दिल्ली विश्वविद्यालय और इसके कॉलेजों में लंबे समय तक त्रिनेत्र जी चीनी भाषा पढ़ाते भी रहे।
अतीत में जाएं, तो जेएनयू में चीनी भाषा में एमए करने से पहले त्रिनेत्र जी आईटीबीपी, देहरादून में काम करते थे, लेकिन जेएनयू आने के बाद नक्सलवादी विचारधारा से प्रभावित हुए, भूमिगत होकर कुछ साल काम भी किया और सिलसिला नाम का अखबार भी निकाला। बाद में हिरावल पत्रिका का संपादन किया। सत्तर और अस्सी का दशक ऐसा था, जब त्रिनेत्र जोशी के अलावा वीरेन डंगवाल, आनंद स्वरूप वर्मा, विष्णु खरे, पंकज सिंह, सुरेश सलिल, मंगलेश डबराल, नीलाभ जैसे बेबाक, बिंदास और जमीन से जुड़े कवियों-लेखकों-पत्रकारों की मंडली हर तरफ चर्चा का विषय रहती थी। इनमें से ज्यादातर अब हमारे बीच नहीं हैं और अब त्रिनेत्र जी ने भी अलविदा कहकर उस दौर के अपने साथियों के लिए एक गहरा शून्य पैदा कर दिया है। आनंद स्वरूप वर्मा से कुछ कहा नहीं जा रहा, सुरेश सलिल सन्न हैं तो विनोद भारद्वाज अपनी फेसबुक टिप्पणी में त्रिनेत्र जोशी को किसी किसी संदर्भ में याद करते हैं। साहित्य जगत का एक बड़ा वर्ग त्रिनेत्र जी के जाने से बहुत आहत है, नि:शब्द है।