बिहार विधानसभा चुनावों के राजनीतिक मुद्दे
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पर क्या ऐसा ही दावा उनके मंत्रियों और आकंठ भ्रष्टाचार में लिप्त अफसरों के बारे में किया जा सकता है? बिहार की राजनीति को करीब से समझने वाले से पूछा, तो इसका जवाब 'ना' में मिला। यही वह बड़ा मुद्दा है जो नीतीश कुमार कि सन् 2015 के पहले बनी सरकार सुशासन बाबू की छवि को तार-तार कर दे रही है।
वे तीन मुद्दे जिन पर कभी नीतीश कुमार लोगों के दिलों पर राज करते थे, यानी तीन 'सी' अपराध, भ्रष्टाचार और सांप्रदायिक राजनीति से परहेज। नीतीश कुमार के मौजूदा कार्यकाल में इन तीनों मुद्दों के साख पर अब बट्टा लगता दिख रहा है। कम से कम नीतीश कुमार इस बार के शासन काल में "जस की तस धर दिन्ही चदरिया" की गान करने की स्थिति में तो नहीं है।
सवाल यह भी है कि आम आदमी के रोजमर्रा के सरोकारों से जुड़े इन मुद्दों को महागठबंधन मुख्य चुनावी मुद्दा बनाने में कामयाब हुआ? शायद नहीं, वजह यह सरकार के सत्ता विरोधी रुझान को राजनीतिक चुनावी मुद्दे में तब्दील कर अभियान चलाने के बजाय महागठबंधन के घटक दल भी 'वोटर अधिकार यात्रा' पर निकल पड़े। बिहार की राजनीतिक जमीन पर उतरता मुद्दा अब दिखा ही नहीं है।
इस दौरान चाहे जितने प्रकार के 'बम फोड़े ' जाने का दावा किया जा रहा था, वह चुनाव आते-आते फुस्स हो गया। कोई खास असर छोड़ता नहीं दिखायी दे रहा है। इससे महागठबंधन का नुकसान यह हुआ कि राहुल गांधी की अगुआई में 3 जुलाई से 9 अगस्त, 15 दिनों तक चले 'वोटर अधिकार यात्रा ' में चुनावों के ऐन वक्त सरकार के विरुद्ध माहौल बनाने का कीमती समय हाथ से निकल गया। यही वह समय था जब नीतीश सरकार को घेरा जा सकता था।
बिहार की राजनीति की औसत समझ रखने वाला आदमी भी यह जानता है कि किसी भी चुनाव के ठीक दो-तीन महीने का समय खासकर विपक्षी दलों के लिए कितना महत्वपूर्ण होता है। इसके अलावा नामांकन दाखिल करने के अंतिम दिन तक तय नहीं हो पाया कि किसे कहां से चुनाव लड़ने मैदान में उतारा जाएगा। राजग गठबंधन में खींच-तान कम नहीं है।
जब कि नामांकन के दो -तीन ही दिन शेष बचे हैं। फिलहाल राजग और महागठबंधन दोनों अनिर्णय की दुर्दशा से ग्रस्त दिखायी दे रहे हैं। कहा यह जा रहा है महागठबंधन में ज्यादा पेंच कांग्रेस की वजह से फंसा है। कांग्रेस ज्यादा सीटों पर चुनाव मैदान में उतरने की इच्छुक है। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव से बेहतर भला कौन जानता है कि जितनी सीटों पर कांग्रेस चुनाव लड़ेगी, उतनी ही महागठबंधन की जीत की संभावनाएं कमजोर होती जायेंगी।
यह पिछले विधानसभा चुनावों में भी साबित हो चुका था और इस बार के चुनाव में भी कांग्रेस की सांगठनिक और राजनीतिक जमीन पर उतना मजबूत नहीं दिखायी दे रहा, जितना कांग्रेस दावा कर रही है। इस राजनीतिक हकीकत को तेजस्वी यादव से बेहतर लालू यादव समझते हैं।
एक और आधार जिसे किसी चुनाव में भाजपा आजकल खूब आजमा रही है और पहले कांग्रेस भी आजमाती रही है। वह है चुनाव के अन्तिम समय तय होने वाले 'डील' के जरिये तय होने वाले उम्मीदवार। ऐसे उम्मीदवार 'पैराशूट' से उतरने वाले उम्मीदवार होते हैं। पार्टी कोई और होती है चुनावी 'सिंबल' किसी और का होता है। इस 'डील' की कूट भाषा को वे लोग अच्छी तरह से समझते हैं, जिनके पास धन-संसाधनों की कमी नहीं होती है। ऐसे उम्मीदवारों की दलीय वफादारी हमेशा संदिग्ध रहती हैं।
बिहार विधानसभा चुनावों के राजनीतिक मुद्दे
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बिहार विधानसभा के चुनावों में इन मुद्दों के अलावा कुछ और महत्वपूर्ण मुद्दे होंगे, जो निर्णायक साबित होंगे। पहला यह कि महिलाओं का रुझान इस बार किस ओर होगा? क्या गैर यादव पिछड़ी जातियों में यह संदेश पहुंच चुका है कि नीतीश कुमार की शारीरिक और मानसिक स्थिति अब वैसी नहीं है कि वे सत्ता संचालन के सारे तंत्र की उचित निगरानी कर सकें और अपने सुशासन बाबू की छवि को बराकरार रख सके?
क्या नीतीश बाबू के समर्थकों को यह अंदेशा हो चुका है कि चुनाव के वक्त भले ही भाजपा उनको आगे कर चुनाव लड़ने की घोषणा करे, पर अंततः यह स्थिति लम्बे समय तक कायम रहने वाली नहीं? भाजपा की आज मजबूरी है कि गैर यादव पिछड़ी जातियों को लामबंद करने के लिए पूरे चुनाव के दौरान नीतीश कुमार के नाम को खूब जोरशोर और गाजे बाजे के साथ उछालने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगी।
पर चुनाव के बाद भी यह सिलसिला चलता रहेगा , इसको लेकर बिहार की राजनीति को ठीक से समझने वाले हर किसी को शक हैं।
महागठबंधन के बारे में एक महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या तेजस्वी यादव अपने स्वजातीय बंधुओं के अति सत्ता और उन्माद को नियंत्रण कर पाएंगे जो पिछले विधानसभा चुनावों में उनके हार का कारण बना था? आमतौर पर कई बार अंतिम समय में इस स्वजातीय उन्माद को ही अन्य पिछड़ी जातियां जंगलराज का पर्याय मानने को विवश हो जाती हैं।
कुछ और मुद्दे जो इस चुनाव में निर्णायक हो सकते हैं। प्रशांत किशोर की पार्टी के वोट काटने की क्षमता से तय होंगे। किस गठबंधन को प्रशांत किशोर कितना नुकसान करेंगे? इससे प्रशांत किशोर की बिहार में भविष्य की राजनीति तो तय होनी है। फिलहाल तो दोनों गठबंधन उनकी कार्यशैली मुद्दा आधारित बेबाक और निर्भीक राजनीति पूरी तरह से भयभीत नहीं तो कुछ सहमे-सहमे दिख ही रहे हैं।
प्रशांत किशोर भाजपा की बी टीम होने के आरोप को ध्वस्त कर ही चुके हैं। भाजपा केंद्रीय नेतृत्व को यह सोचने के मजबूर कर दिया कि स्व कैलाशपति मिश्र और स्व सुशील मोदी के दिवंगत होने के बाद अगर बिहार की मौजूदा नेतृत्व के भरोसे पर ही टिकी रही, तो संभावना फिलहाल यह दिखायी दे रहा कि प्रशांत किशोर बिहार में ऐसे ही मुद्दे आधारित राजनीतिक अभियान चलाते रहे, तो बिहार जो देश में बड़े राजनीतिक बदलाव के लिए हमेशा से मशहूर रहा है, इसकी प्रबल संभावना है कि इसकी शुरुआत इस विधानसभा चुनावों से होने जा रही है।
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