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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: बोलिविया का सिने इतिहास, प्रतिरोध का सिनेमा

सार

साठ और सत्तर के दशक की फिल्में बोलिविया के सिने-इतिहास की माइलस्टोन हैं, क्योंकि इन्हें खूब अवार्ड मिले, सराहना मिली। यहां के सिनेमा ने नव लैटिन अमेरिका की राजनीति तथा उपनिवेशवादी विरोध में सक्रिय भूमिका निबाही।
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बोलिविया का सिनेमा और फिल्में - फोटो : Istock
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विस्तार
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जब सिनेमा अथवा सिने-इतिहास की बात होती है, अक्सर बड़े-बड़े देशों का नाम लिया जाता है। कई देशों के नाम भी लोगों को पता नहीं हैं और लोग यह भी नहीं जानते हैं कि इन देशों में भी सिनेमा बनता रहा है। न केवल बनता रहा है, वरन इन देशों की फिल्मों ने कई सिने-पुरस्कार भी जीते हैं। बोलिविया एक ऐसा ही देश है। कई बार सिने-विद्वान भी नहीं जानते हैं कि बोलिविया जैसे देश ने कई अंतरराष्ट्रीय सिने-पुरस्कार जीते हैं।

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बोलिविया में पहली फिल्म 1904 मे बनी। मूक फिल्मों के दौर की इस देश की एकमात्र फिल्म का निर्देशन जोस वेलास्को मैदाना किया। उन्होंने ‘वारा वारा’ नाम से फिल्म 1930 में बनाई थी। पहली सवाक फिल्म का नाम ‘इन्फर्नो वेर्डे’ था और इसे लुई बैजोबेरी ने बनाया था।

लेखक, एडिटर, निर्देशक जॉर्ज सैन्जीनेस ने ‘एंड सो इट इज’ (1966) बनाई, इन्हीं की ‘ब्लड ऑफ द कोंडोर’ (1969) भी ऐसी ही फिल्में हैं, जिसका निर्माण बोलिविया में हुआ। 70 मिनट की फिल्म ‘ब्लड ऑफ द कोंडोर’ आदिवासी समुदाय की प्रतिक्रिया उन विदेशियों के कामों के प्रति दिखाती है, जो विकास के नाम पर जबरदस्ती किसान स्त्रियों की नसबंदी कर रहे हैं। इस फिल्म के लिए निर्देशक को वेनिस इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल तथा वैलाडोलिड इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (सर्वोत्तम फिल्म) के पुरस्कार प्राप्त हुए।
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‘एंड सो इट इज’ (Ukamau) भी 75 मिनट की फिल्म है, इसमें एक किसान स्त्री का पति बाजार गया है और तभी उसका बलात्कार और हत्या होती है। पति बहुत सावधानी से बदले की योजना बनाता है। ‘द सीक्रेट नेशन’, ‘द नाइट ऑफ सैन जुआन’, ‘रिवोलूश’ इनकी अन्य फिल्में हैं, इन्हें अब तक 5 महत्वपूर्ण पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। 


चालीस के दशक की डॉक्यूमेंट्री

पिछली सदी के पहले दशक में जे. गोय्टिसोलो, लुई कैस्टिलो जैसे डॉक्यूमेंट्री निर्देशक यहां थे। 1926 की फिल्म ‘ल ग्लोरिया डे ल रजा’ देश में टिवानाको की संस्कृति की उपेक्षा तथा पतन को चित्रित करती है। ‘वारा वारा’ बोलिविया के रीति-रिवाजों तथा लोकगीतों को आगे लाती है। चालीस के दशक में यहां डॉक्यूमेंट्री का महत्व स्थापित हो चुका था। पचास के दशक में नेशनल रिवोल्युशन के पश्चात बोलिविया में सिनेमा संस्थान की स्थापना हुई, जिसने वहां के सिनेमा के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा दिया।

सैकड़ों डॉक्यूमेंट्री तथा न्यूजरील बनीं। साथ ही उन लोगों ने भी डॉक्युमेंट्री बनाईं जो विदेश में पढ़कर आए थे, जैसे एंटोनिओ इगुनो। 1973 के मिलिट्री द्वारा तख्तापलट के बावजूद राजनैतिक प्रकृति की फिल्म ‘ब्लड ऑफ द कोंडोर’ जैसी फिल्में नई पीढ़ी को फिल्म बनाने केलिए प्रेरित करती रहीं।

सत्तर के दशक की फिल्में

साठ और सत्तर के दशक की फिल्में बोलिविया के सिने-इतिहास की माइलस्टोन हैं, क्योंकि इन्हें खूब अवार्ड मिले, सराहना मिली। यहां के सिनेमा ने नव लैटिन अमेरिका की राजनीति तथा उपनिवेशवादी विरोध में सक्रिय भूमिका निबाही। सत्तर और अस्सी के दशक में प्रतिरोध सिनेमा के जनक जॉर्ज गुरैरा विलाल्बा (El embrujo de mi tierra), मिग्युएल एंजेल इलानेस (Los VIII juegos deportivos bolivarianos 1978 तथा El lago sagrado 1981), डेनियल कैलेट, एंटोनिओ इगुनो (Amargo mar 1987) तथा कोयलार उरिजार भाइयों ने कई महत्वपूर्ण फिल्में बनाईं। इन लोगों ने मूलवासियों के विभिन्न समुदायों के तौर-तरीकों को अपनी फिल्मों में उकेरा।

1991 में बोलिविया में 15 साल तक चले सिनेमैटिक कानून का निर्माण हुआ। इसके फलस्वरूप बोलिविया के सिनेमा को फंडिंग तथा सुरक्षा एवं तकनीकि सुविधाएं प्राप्त हुईं। लेकिन कानून उस तरह प्रभावी न हुआ जैसा कि प्रारंभ में इसके विषय में सोचा गया था। इसी काल में ‘द डे सिलेंस डाइड’ (1998) बनी। 108 मिनट की इस कॉमेडी, ड्रामा, रोमांस फिल्म में निर्देशक पाउलो एगाजी दिखाते हैं कि खूबसूरत एबेलार्डो रिओस बिना हलचल वाले छोटे-से शहर विलासेरेना में व्यापार करने पहुंचता है। वह योजना बनाता और लोगों की अपनी बात ‘रेडियो नोब्लेजा’ से प्रसारित करने लगता है।

वहां के लोग पहले यह नहीं कर सकते थे, लेकिन अब वे एक छोटी-सी रकम के एवज में खुद को सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त करने का अवसर पा सकते थे। इसका मतलब है, वे तमाम बातें सार्वजनिक होना जो अब तक दबी-ढकी थीं। क्या-क्या सामने आता है, आप स्वयं देखें। जल्द ही एबेलार्डो को खूबसूरत सेलेस्ट मिलती थी, जो तकरीबन अब तक अपने पिता की कैद में थी। और दोनों का रोमांस प्रारंभ होता है।

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बोलिविया की सिने-कम्युनिटी - फोटो : istock

नब्बे का दशक और फिल्में

नब्बे के दशक और सदी के पहले दशक में बोलिविया में जुआन कार्लोस वैल्डिविआ, रोडरिगो बेलोट जैसे खास सिने-निर्देशक बोलिविया में हुए। पांच उच्च कोटि के सिने-पुरस्कार जीतने वाले जुआन कार्लोस वैल्डिविआ ने कई अन्य फिल्मों के अलावा अपने निजी अनुभवों के आधार पर तीन फिल्में- ‘जोन सुर’, ‘लैंड विदआउट इविल’ तथा ‘सोरेन’ (Soren) बनाई।

‘जोन सुर’ को तीन, ‘लैंड विदआउट इविल’ को 2 पुरस्कार मिले। ‘लैंड विदआउट इविल’ में उन्होंने खुद मुख्य भूमिका की है। रोडरिगो बेलोटने ‘सैक्सुअल डिपेंडेन्सी’, ‘हू किल्ड द व्हाइट लामा?’ बनाई उन्होंने ‘परफिडिआ’ नाम से एक प्रयोगात्मक फिल्म इंग्लिश भाषा में बनाई, जिसमें मात्र दो मिनट के संवाद हैं।

फिल्म ‘हू किल्ड द व्हाइट लामा?

‘हू किल्ड द व्हाइट लामा?’ वैसे तो कॉमेडी है लेकिन इसके निहितार्थ गहन हैं। गरीबी के सामने कुछ भी पवित्र नहीं होता है, न ही अपराध, राजनैतिक संबंध। फिल्म बोलिविया में चल रहे राजनैतिक, आपरधिक, तथा ड्रग व्यापार का पर्दाफाश करती है। संयोगवश एक व्हाइट लामा शावक मारा जाता है और तब शुरू होती है मीडिया की कहानी। इसमें एरिका एंडिआ, मिग्युल वैल्वेर्डे ने मुख्य भूमिकाएं की हैं।

जुआन कार्लोस वैल्डिविआ की 2005 की फिल्म ‘अमेरिकन वीसा’ में एक बोलिवियन प्रोफेसर को जब अमेरिका का वीसा नहीं मिलता है तो वह आपराधिक गतिविधियों के जाल में उलझ जाता है। वह अमेरिकन कोन्सुलेट को घेरता है और बोलिविया की एक खूबसूरत वेश्या के प्रेम में पड़ जाता है। फिल्म को तीन पुरस्कार प्राप्त हुए।

‘ब्लैकथोर्न’ (2011), ‘ब्लूबीयर्ड’ (2012), ‘चाको’ (2020), ‘ब्लड-रेड बॉक्स’ (2021), ‘उतमा’ (2022) बोलिविया से आने वाली इस सदी की कुछ महत्वपूर्ण फिल्में हैं। एमी हेस्केथ की फिल्म ‘ब्लूबीयर्ड’ क्लासिक परिकथा पर आधारित है। इसी फ्रांसिसी लेखक तथा फेयरीटेल के जनक चार्ल्स पेरॉल्ट ने ‘सिंड्रेला’ भी लिखा। ‘ब्लूबीयर्ड’ एक धनी और डरावने नीली दाढ़ी वाले आदमी की कहानी है, जो अपनी पत्नियों की हत्या करता है। इसमें जैक एविला, वेरोनिका आदि ने अभिनय किया है।

चारों ओर जमीन से घिरे देश बोलिविया की सिने-कम्युनिटी बहुत छोटी-सी लेकिन आपस में जुड़ी हुई हैं। लैटिन अमेरिकी अन्य देशों की भांति बोलिविया में भी उथल-पुथल रही है, इसके बावजूद यहां कई अच्छी और अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि की पुरस्कृत फिल्में बनी हैं।



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