विश्व की भीषणतम औद्योगिक त्रासदी भोपाल गैस कांड के शिकार भोपाल के गैस पीड़ितों को ज्यादा मुआवजा मिलने की उम्मीदों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने घड़ो पानी डाल दिया है। वो एक बार फिर खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। केन्द्र सरकार द्वारा बदले हालात में भोपाल गैस कांड के पीड़ितों को ज्यादा मुआवजा दिलवाने के सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट में 15 साल पहले दायर याचिका को सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने यह कहकर खारिज कर दिया कि गैस पीड़ितों को पहले ही 6 गुना ज्यादा मुआवजा दिया जा चुका है।
केन्द्र ने अपनी याचिका में कहा था कि कोर्ट बहुराष्ट्रीय कंपनी (पूर्व की यूनियन कार्बाइड और अब की डाऊ केमिकल्स) को गैस पीड़ितों को 7844 करोड़ रुपए का अतिरिक्त मुआवजा चुकाने का आदेश दे। हालांकि, इस फैसले के बाद भी गैस पीड़ितों के लिए काम करने वाले संगठनों ने हार नहीं मानी है, लेकिन आगे राहत मिलने की संभावना कम है।
ऐसा लगता है कि भले ही केन्द्र की मोदी सरकार ने भी याचिका में की गई मांग को जायज माना, लेकिन इसको लेकर सर्वोच्च अदालत में गैस पीड़ितों का पक्ष शायद बहुत मजबूती से नहीं रखा गया, जिसकी कि गैस पीड़ितों को अपेक्षा थी। जहां तक इस मुद्दे के राजनीतिक हानि-लाभ का प्रश्न है तो इसका कोई खास असर पड़ने वाला नहीं है, क्योंकि मंडल-कमंडल की राजनीति के बाद गैस पीड़ितों के पुनर्वास का मुद्दा लगभग हाशिए पर चला गया था।
दूसरे, विधानसभा सीटों के परिसीमन के बाद भोपाल के गैस पीड़ित तीन अलग-अलग विस सीटों में बंट चुके हैं। शहर का जनसांख्यिकीय चरित्र भी बीते 39 सालों में काफी बदल गया है। बावजूद इन सबके गैस पीड़ितों का मुद्दा गंभीर मानवीय संवेदना से जुड़ा है, वो ये कि क्या औद्योगिक त्रासदियां मनुष्य की कीमत पर होने दी जाएंगी? क्या इसकी कोई मुआफिक सजा नहीं है? ऐसे में सर्वोच्च अदालत के फैसले में मानवीय संवेदना से ज्यादा कानूनी और व्यावहारिक पक्ष ज्यादा हावी दिखता है।
हजारों लोगों की मौत
गौरतलब, है कि भोपाल गैस कांड 2 और 3 दिसंबर 1984 की दर्मियानी रात को तत्कालीन यूनियन कार्बाइड कंपनी के कीटनाशक प्लांट से मिथाइल आइसोसाइनेट गैस के रिसाव के रूप में हुआ था। लोग समझ ही नहीं पा रहे थे कि यह हो क्या रहा है। यह गैस हवा के साथ तेजी से फैलती गई और इसके फेंफड़ो में जाने से हजारों लोगों की मौत हुई। सैंकड़ो लोग उसके आफ्टर इफेक्ट के कारण मरे। अभी भी कई लोग जहरीली गैस के दुष्प्रभावों से जूझ रहे हैं। हालांकि, गैस कांड में मरने वालों का आधिकारिक आंकड़ा 3500 लोगों का है। लेकिन हकीकत में मरने वालों की संख्या इसके चार गुना ज्यादा बताई जाती है।
इस हादसे के बाद कई जनसंगठनों ने इसको लेकर बहुराष्ट्रीय कंपनी को जिम्मेदार ठहराने, दोषियों को सजा देने तथा पीड़ितों के समुचित इलाज और पुनर्वास के लिए मोर्चा खोल दिया। यह मामला अदालत में गया और जिला अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में यूनियक कार्बाइड को 47 करो़ड़ डॉलर (भारतीय रूपए में तत्कालीन दर से 715 करोड़ रू.) का मुआवाजा भारत सरकार को देने को कहा, जिसे गैस पीड़ितों को वितरित किया जाना था।
इस हिसाब से कोर्ट में मामला जारी रहते गैस पीड़ितों को 2 सौ रू. प्रतिमाह की अंतरिम राहत भी मुआवजे के दावों का अंतिम फैसला होने तक दी गई। इस बीच मुआवजे की दरें तय की गईं, वो अपेक्षित मुआवजे की तुलना में कम ही थीं। उल्टे इसमें कई फर्जी लोगों द्वारा मुआवजा लेने के कई मामले भी सामने आए। जो भी हो, गैस दावा अदालतों द्वारा तयशुदा दरों पर मुआवजे के अवॉर्ड पारित किए गए।