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पीढ़ियों का "हमारा बजाज": जज्बातों से जुड़ी वह रफ्तार जिसने हर सपनों की उड़ान के लिए नया आकाश दिया.!

सार

बजाज ऑटो के राहुल बजाज भले ही दुनिया को अलविदा कह गए हों लेकिन कॉरपोरेट्स से सोशल चेंज तक की जो एक इबारत वो लिख गए, वह इतिहास बन चुकी है। एक पूरी पीढ़ी हमारे इस बजाज की शुक्रगुजार है।

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वह पापा की पहली निजी गाड़ी थी यानी "हमारा बजाज"। - फोटो : Istock
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विस्तार
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80 के दशक का शायद ही कोई बच्चा होगा जो उस दुपहिया की स्टेपनी पकड़ कर पीठ सवार की ओर करके न बैठा होगा। बजाज ने स्कूटर और फिर बाद के दिनों में मोटरबाइक्स की दुनिया को पूरी तरह बदल डाला था। किफायत से हर महीने के बजट में घर का खर्च चलाने वाले मीडियम क्लास घरों के लिए बजाज का स्कूटर लग्जरी और कम्फर्ट दोनों का मामला था।

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बजाज ऑटो के राहुल बजाज भले ही दुनिया को अलविदा कह गए हों लेकिन कॉरपोरेट्स से सोशल चेंज तक की जो एक इबारत वो लिख गए, वह इतिहास बन चुकी है। एक पूरी पीढ़ी हमारे इस बजाज की शुक्रगुजार है।
 

90 का दशक लगने को था और तब तक पापा के ट्रांसफर के कारण छोटे-छोटे गांव-कस्बों में रहते हुए हमें कभी ये महसूस ही नहीं हुआ कि पैरों के नीचे पहियों के लगने का असर क्या होता है। पापा को बैंक से मिलती थी यजदी और हमारे पास गुमान करने के लिए अपने पैर थे ही। कभी और किसी वाहन की जरूरत महसूस ही नहीं हुई। लेकिन हर एक दशक में समाज में तेजी से परिवर्तन होते हैं और ये परिवर्तन ही आगे जाकर जरूरत लगने लगते हैं।

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नौवीं क्लास में आने पर मुझे गिफ्ट में मिली मेरी पहली, अपनी साइकिल जो मेरी कद-काठी के हिसाब से थी क्योंकि उसके पहले मैंने पापा की जेंट्स साइकल पर ही हाथ आजमाए थे। हमारे लिए वो साइकिल किसी बीएमडब्ल्यू से कम नहीं थी और उस पर हमें नाज था। फिर एक दिन अचानक शाम को वो नया मेहमान घर पधारा। ग्रे कलर की उसकी चमकती काया ने सबके चेहरे पर विस्मयादिबोधक चिन्ह प्रकट कर डाले। ये पापा की पहली निजी गाड़ी थी यानी "हमारा बजाज"।

मां ने उसकी सिल्वर रिंग से चमकती हेडलाइट पर कुमकुम से टीका काढ़ा और अक्षत छिड़के और सेवंती के पीले-कत्थई फूलों की एक माला उसके गले में डाल जता दिया कि वो हमारे लिए कितना सम्मानित अतिथि है। ये अतिथि जल्द ही घर का सदस्य बन गया। मेरे लिए ये नया कौतुक होने के साथ एक चैलेंज भी था।

जाहिर था कि नौवीं क्लास में लर्निंग लाइसेंस भी बनने से रहा लेकिन जितनी बार मैं हमारे बजाज सुपर के पास से गुजरती, ऐसा लगता वह मुझे देखकर मुस्कुराया। ये टीनएज क्रश था जो इसके पहले मुझे ह्यू ग्रांट और सनी देओल के लिए ही महसूस हुआ था। उसके हॉर्न की आवाज मेरे दिल की धड़कन बढ़ा डालती और जब वो चलता तो लगता अपने साथ उड़ने को आमंत्रित कर रहा है।

पापा से पहले तो इसरार किया कि मुझे स्कूटर सिखा दें लेकिन पापा शायद इस इश्क के मेरे दुस्साहस को परखना चाहते थे। सो उन्होंने शर्त रख दी कि जिस दिन मैं स्कूटर को अकेले रैम्प पर चढ़ाकर घर में रख दूंगी, उस दिन वो मुझे सिखा देंगे। ये बड़ी चुनौती थी क्योंकि उस स्कूटर को पापा और मैं दोनों मिलकर 5-6 सीढ़ियों जितने ऊंचे रैम्प से चढ़ाकर रोज घर में रखते थे। पर, आखिर इश्क कब ऊंचाइयों और मुश्किलों से डरता है। एक दिन मैंने वो भी कर डाला।

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बजाज बॉक्सर के रूप में इकोनॉमिक रेंज में शानदार माइलेज और कम से कम मेंटेनेंस के साथ बाइक के क्षेत्र में क्रांति की थी बजाज ऑटो ने। - फोटो : Istock
पापा अब भी सिखाने में टालमटोल कर रहे थे और एक दिन मेरे सब्र का बांध टूट गया। मैंने पापा से चाबी मांगी और कहा- आज मैं खुद ही चला लूंगी, आप रहने दीजिए। पापा को लगा मैं मजाक कर रही हूं लेकिन उनके साथ स्कूटर पर आते-जाते मैं इतना तो सीख गई थी कि इसे चलाना कैसे है। बस चाबी लगाई, किक मारी और पहली बार वही हुआ जो अमूमन सबके साथ होता है। स्कूटर का पहला गियर डालते ही झटके से क्लच छोड़ा और स्कूटर घोड़े की तरह उछलकर बंद हो गया। पास से गुजरते एक अंकल ने समझाइश दी, बेटा क्लच धीरे-धीरे छोड़ो।

तीसरी बार में मैं पहले गियर में स्कूटर को चलाकर एक छोटा चक्कर लगा लाई और फिर पापा को मुझे स्कूटर सिखाने पर मजबूर होना पड़ा। इश्क की ये जीत मेरे खाते में दर्ज हो गई। हालांकि इसके पहले पापा की शर्तें भी थीं कि पहले स्टेपनी चेंज करना और प्लग साफ करना सीखना होगा, तब स्कूटर सिखाया जाएगा और मैं खुशी-खुशी इसके लिए तैयार हो गई।

स्टार्ट न होने पर स्कूटर को एक बार झुकाकर स्टार्ट करने की वो टैक्नीक ठीक वैसी ही थी जैसे आज कम्प्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल के लिए एक अल्टीमेट तरीका स्विच ऑफ करके स्विच ऑन करने की है। 90 प्रतिशत मामलों में ये काम करती ही है।
 
बजाज सुपर की वह उड़ान सालों साल मेरे साथ रही। उस टू सीटर पर मैंने तीन लोगों को बैठाया। उस जमाने में जब लड़कियों के लिए छोटे स्कूटर्स ही वाजिब माने जाते थे मुझे बजाज स्कूटर चलाने वाली लड़की के रूप में पहचान मिली रही सालों और फिर एक दिन पापा ने इस ख्याति को और बढ़ाते हुए मुझे गिफ्ट की "बजाज बॉक्सर सीटी 100" बाइक। ये कई मामलों में एक क्रांतिकारी कदम था। उस जमाने मे कॉलेज बाइक से जाने वाली मैं अकेली लड़की थी और आज भी वो बजाज बॉक्सर मेरी सच्ची साथी है।

बजाज बॉक्सर के रूप में इकोनॉमिक रेंज में शानदार माइलेज और कम से कम मेंटेनेंस के साथ बाइक के क्षेत्र में क्रांति की थी बजाज ऑटो ने। उस समय लगभग हर मिडिल क्लास घर मे बजाज की बाइक्स आम थीं। यहां तक कि मेरी देखा देखी मेरे कई फ्रेंड्स ने वो बाइक खरीदी। आज 18 सालों से बिना सेल्फ स्टार्ट, बिना किसी फेयरिंग या अन्य सजावट के मेरी बजाज बॉक्सर मुझे बिना पंखों के आसमान पर उड़ने जैसी फीलिंग देती है।

राहुल बजाज के रूप में उस एक पीढ़ी को पंख देने वाले युग का भी अंत हुआ है। आने वाले दिनों में ऑटोमोबाइल क्षेत्र में कई इनोवेशन होते रहेंगे। बजाज भी और गाड़ियां बनाएगा लेकिन उस स्कूटर से जुड़ी वो यादें और इमोशंस हमेशा के लिए एक-दूसरे के पूरक बने रहेंगे।
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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