16 मई 2023 की हनुमत् कथा के क्रम में बाबा बागेश्वर धीरेंद्र शास्त्री ने हिंदू राष्ट्र बनाने का अहिंसक रोडमैप रामभक्तों के सामने रखा। उन्होंने कहा-
यदि 13 करोड़ बिहारियों में से 5 करोड़ हिंदू भी घर पर महावीरी ध्वज फहराएं और प्रतिदिन माथे पर तिलक लगाकर निकलें, तो भारत हिंदू राष्ट्र की ओर अग्रसर होगा। और जब तक बिहार राममय नहीं होगा, तब तक मैं यहां आता रहूंगा। बिहार से ही हिंदू राष्ट्र अभियान का शुभारम्भ होगा।
बाबा के इस वक्तव्य को 2024 के संसदीय चुनाव से जोड़ कर देखने वाले सेक्युलर दल बड़ी चुनौती मान रहे हैं। इसीलिए उनका विरोध कड़े शब्दों में और पोस्टर पर 'चोर' लिखने जैसे निचले स्तर पर उतर कर किया गया। इन दलों को धीरेंद्र शास्त्री से संविधान को खतरा लगता है, लेकिन पीएफआई से नहीं।
बिहार में 9 अगस्त 2022 से उन सात सेक्युलर दलों के महागठबंधन की सरकार है, जिनमें सभी इस बात पर सहमत हैं कि इस देश में सनातन धर्म या इसके किसी पंथ में अपनी आस्था का प्रवर्तन करना 'साम्प्रदायिकता' है, लेकिन अन्य किसी पंथ , विशेष कर इस्लाम का प्रचार-प्रसार और उसके रीति-रिवाज का पालन करना 'सेक्युलरिजम' है।
ऐसे निपट विपरीत राजनीतिक परिवेश में हनुमानजी के भक्त और स्वामी रामभद्राचार्य के युवा शिष्य पंडित धीरेंद्र शास्री ने जब सेक्युलर सरकार की नाक के नीचे, यानी राजधानी पटना के निकट नौबतपुर के तरेलपाली मठ में 13 से 17 मई तक, पांच दिन हनुमत्-कथा सुनाने की घोषणा की, तब से ही उनका राजनीतिक विरोध होने लगा, बिहार में राजनीति गरमा गई। प्रवचनकर्ता तो देश में अनेक हैं और सैंकड़ों स्थानों पर हर साल धार्मिक प्रवचन होते रहते हैं, लेकिन बाबा बागेश्वर धीरेंद्र शास्री का ऐसा प्रबल विरोध क्यों?
विरोधियों के लिए टेढ़ी खीर बने बाबा
तो उत्तर यह है कि शास्त्री अपने प्रवचनों के मंच से केवल भक्ति की बात नहीं कर रहे, वे केवल पीड़ित-आर्त प्राणियों का निवेदन (अर्जी) अपने आराध्य तक नहीं पहुंचाते, बल्कि सनातनी भक्तों के विशाल समुदाय की राजनीतिक अभिलाषा को भी ऊंचे स्वर में वाणी देते रहे हैं। वे हिंदू राष्ट्र के लिए लोगों को 'उत्तिष्ठ जागृत' करने में लगे हैं, इसलिए वे सारे लोग उनके विरुद्ध हैं, जिनके लिए जमीनी सियासत में पंथनिरपेक्षता का अर्थ देश के सबसे बड़े अल्पसंखयक समुदाय को खुश करना, यहां तक कि उनके बीच पलते आपराधिक-आतंकी तत्वों ( तीक अहमद, शहाबुद्दीन, अफजल ) का भी मौन समर्थन करना और उनके एकजुट वोट से सत्ता पाना रहा है।
1980-90 के दशक में जब अयोध्या में रामजन्म भूमि पर मंदिर बनाने के लिए आंदोलन चरम पर था, तब भाजपा के वरिष्ठ नेता डाक्टर मुरली मनोहर जोशी से किसी पत्रकार ने पूछा था कि एक राजनीतिक दल के नाते आप मंदिर का समर्थन क्यों कर रहे हैं? इस पर डा.जोशी ने कहा था कि जब तक मंदिर का राजनीतिक विरोध होता रहेगा, तब तक हम मंदिर पुनर्निर्माण का राजनीतिक समर्थन करते रहेंगे।
पटना में धीरेंद्र शास्री की कथा के पूर्ण होने तक ऐसा ही वातावरण बना रहा। राजद, जदयू, कांग्रेस सहित पूरा सत्तारूढ़ प्रतिष्ठान बाबा के बिहार आने का विरोध करता रहा, जबकि अकेली भाजपा उनके समर्थन में डटी रही। जिस समागम में रोज लाखों लोग जुटे, उसके लिए प्रशासन ने पहले पटना में गांधी मैदान देने से इनकार किया, फिर बिजली-पानी, सफाई, सुरक्षा, परिवहन, आश्रय जैसी बुनियादी जिम्मेदारियों से भी हाथ खींच लिए।
भीषण गर्मी के कारण कथा स्थल पर कई श्रद्धालु बीमार पड़े। इतना ही नहीं, बाबा बागेश्वर के प्रति आदर प्रकट करने के लिए जब भाजपा सांसद मनोज तिवारी ने उनकी गाड़ी चलाई, तब उन पर यातायात नियमों का हवाला देकर कार्रवाई की चेतावनी दी गई।