पुलिस के रिएक्शन पर भी प्रश्नचिन्ह
पुलिस ने तत्काल रिएक्ट क्यों नहीं किया, इस संदर्भ में दलील यह आई है कि चूंकि गोली सामने से भी चली थी, ऐसे में अगर पुलिस जवाबी कार्रवाई करती तो गोली सामने मौजूद पत्रकारों को भी लग सकती थी। दुर्भाग्य से ऐसा होता तो पुलिस के लिए और भी मुश्किल हो जाती। उस पर माफिया के साथ साथ पत्रकारों के एनकाउंटर का आरोप भी लगाया जाता।
लेकिन अभी यह सवाल काल्पनिक है। पत्रकार जान को जोखिम में डालकर अपना काम करते हैं, लोगों तक सूचनाएं पहुंचाते हैं। आत्मरक्षा के लिए उनके पास नैतिक साहस और पेशेवर जुनून के अलावा कुछ नहीं होता। प्रयागराज की घटना कवर करने वाले पत्रकार भी घटना कवर कर चुकने के बाद रातभर सो नहीं पाए होंगे। क्योंकि पटाखों की तरह पिस्तौल से चलती गोलियां और सामने टपकती लाशों का ऐसा भयंकर और दिल दहला देने वाला लाइव कवरेज तो युद्ध में भी कभी कभार देखने को मिलता है।
लेकिन लगता है कि यह पेशेवर निष्ठा और पत्रकारों की रही सही साख भी अब जोखिम के दायरे में है। इसलिए, क्योंकि अब पत्रकारों को एक दूसरे पर पूरा भरोसा करने के पहले सोचना होगा कि जो बगल में चैनल का माइक अथवा कैमरा लेकर खड़ा है, वह सचमुच पत्रकार है भी या नहीं? यह आत्म संशय की अनचाही और अवांछित स्थिति है।
मीडिया पर कैसे होगा भरोसा?
दूसरी तरफ पुलिस व सुरक्षाकर्मी भी पत्रकारों की टीम पर पूरी तरह भरोसा शायद ही करें।
यूं तो कई पत्रकारो के गले में आईकार्ड डले होते हैं, लेकिन किसी के मन में क्या चल रहा है, इसका कोई आइडेंटिटी कार्ड नहीं होता। यानी दूसरे तो ठीक खुद पत्रकार ही दूसरे पत्रकार पर कितना भरोसा करें, उसे कितना अपनी बिरादरी का माने, माने या नहीं, अब यह सवाल पैदा हो गया है। साथ ही पत्रकार और सुरक्षाकर्मी कितने ही तेज क्यों न हों, ‘माइंड रीडर’ यकीनन नहीं होते।
अतीक और अशरफ को मारने वाले तीनो युवकों ने पत्रकारों के प्रति समाज और तंत्र के विश्वास को भी गोली मार दी है, यह अपने आप में बहुत बड़ा नुकसान है। क्योंकि पत्रकार ‘हत्यारे’ भी हो सकते हैं, इसे तो कोई नहीं मानता था। यही माना जाता रहा है कि वो ज्यादा से ज्यादा खबरों की गोलियां दाग सकते हैं। कुछेक पत्रकारों पर व्यक्तियों की ‘चरित्र हत्या’ के आरोप जरूर लगे हैं, लेकिन पत्रकार बनकर वास्तव में ‘मानव हत्या’ की दुष्ट कोशिश अभी तक शायद ही किसी ने की हो।
बहुतों का मानना है कि तीनो युवकों ने दुर्दांत माफिया को खत्म कर एक तरह से समाज पर एहसान ही किया है, उसका क्या रंज मनाना। हो सकता है, यह सोच सही भी हो। लेकिन गोली किस नीयत और भाव से चलाई गई है, यह भी उतना ही मायने रखती है। वो तीनो युवक हत्यारों की तरह प्रकट होकर हत्या कर के चले जाते तो इसे कानून व्यवस्था का प्रश्न और सरकार की मंशा का सवाल ही माना जाता, लेकिन उन्होंने पत्रकार बनकर यह कृत्य किया, यह समूची पत्रकारिता को आहत करने वाली बात है।
फिलहाल मानकर चलें कि पत्रकारिता और समाज के रिश्तों यह हत्याकांड दरार नहीं बनेगा।
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