हालांकि सुषमा स्वराज, अनंत कुमार आदि आडवाणी खेमे में खुलकर देखे गए। पर अरुण जेटली ने संतुलित होकर आडवाणी से लेकर मोदी दोनों से अच्छे संबंध बना कर रखे। यह जेटली की खासियत थी कि अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में महत्वपूर्ण हैसियत रखे हुए थे। उनके मंत्रिमंडल में रहे। बढ़िया मंत्रालयों का कार्यभार उनके पास रहा। वाजपेयी मंत्रिमंडल में पहले वे सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री बने। बाद में उन्हें कानून मंत्री बनाया गया। वहीं जेटली की कार्यक्षमता को नरेंद्र मोदी ने भी पहचाना था। नरेंद्र मोदी ने उन्हें वित्त मंत्री से लेकर रक्षा मंत्री तक बना कर रखा।
नरेद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल में भी मोदी जरूर उन्हे अहम पद देते, लेकिन जेटली का स्वास्थ्य आड़े आ गया। अगर मोदी के पहले कार्यकाल में सुष्मा स्वराज औऱ अरुण जेटली की शक्ति का तुलनात्मक अध्धयन किया जाएगा तो यही निष्कर्ष होगा कि विदेश मंत्रालय में सुषमा स्वराज के हाथ काफी हद बंधे हुए थे। लेकिन अरुण जेटली रक्षा से लेकर वित्त मंत्रालय तक में स्वतंत्र रूप से काम करते रहे।
पहली बार लोकसभा अमृतसर से लड़े और हारे
जेटली भाजपा के संगठन में काफी महत्वपूर्ण थे। लेकिन लोकसभा की राजनीति से हमेशा उनकी दूरी बनी रही। जेतली भाजपा संगठन में खासे महत्वपूर्ण थे। वे राज्यसभा के रास्ते संसद में पहुंचते रहे। राज्य सभा उन्होंने भाजपा की कमान बखूबी संभाली। जेटली हमेशा भाजपा संगठन में महत्वपूर्ण रहे। बिहार, गुजरात, पंजाब जैसे राज्यों को जेतली ने संभाला। उनकी खासियत यह थी कि सहयोगी दलों के नेताओं से विपरित परिस्थितियों मे भी वे सहमति बना लेते थे। वहीं सहयोगी दलों के नेता हमेशा उनके कहने पर उनकी बातों को मान भी लेते थे। अकाली दल, जनता दल यूनाइटेड जैसे दलों से जेटली के हमेशा मधुर संबंध रहे।
बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार से उनके संबध खासे अच्छे थे। एक जमाने में कहा जाता था कि नितिश कुमार का भाजपा में सबसे बड़े हितैषी अरुण जेटली है। भाजपा और जद यू के बीच संबंध खराब हुए, लेकिन जेटली और नितिश कुमार के संबंध अंतिम समय तक ठीक रहे। यही नहीं नितीश कुमार ने जेटली के खास लोगों को भी बिहार में एडजस्ट भी किया। हालांकि जेटली ने लोकसभा के चुनावों से खुद दूरी बनायी रखी लेकिन 2014 में काफी दबाव के बाद जेतली अमृतसर से चुनाव लड़ने को तैयार हो गए। अमृतसर से चुनाव मैदान मे जेटली तब उतरे थे जब उनकी जीत तय मानी गई थी।
अकाली दल ने भाजपा नेताओं से विशेष सिफारिश लगा जेटली को अमृतसर से उम्मीदवार बनाया था। जेटली जबतक अमृतसर से उम्मीदवार नहीं बने कांग्रेस ने अपने पत्ते नहीं खोले थे। जेटली की उम्मीदवारी तय होने के बाद कांग्रेस ने पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को अमृतसर से उम्मीदवार बना दिया। जेटली चुनाव में बुरी तरह से फंस गए। पूरे चुनाव के दौरान जेटली को अमृतसर में कैप करना पड़ा। देश के तमाम हिस्सों से जेतली समर्थक अमृतसर चुनाव प्रचार करने आए। अकाली दल के तमाम बड़े नेता जेटली के कैंपेन में अमृतसर में अड्डा जमा लिया था। क्योंकि जेटली की जीत उनकी प्रतिष्ठा से जुड़ी हुई थी। इसके बावजूद जेटली अमरिंदर सिंह से 1 लाख से ज्यादा मतों से हार गए थे।
अरुण जेटली (फाइल फोटो)
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जीएसटी और नोटबंदी को आलोचना हुई
अरुण जेटली के वित्त मंत्री रहते केंद्र सरकार ने आर्थिक जगत में दो बड़े फैसले लिए। केंद्र सरकार ने नोटबंदी का फैसला लिया। उसके बाद पूरे देश में जीएसटी लागू कर दिया। नोटबंदी की आलोचना देश भर में हुई। हालांकि नोटबंदी से जब देश उबरने की कोशिश कर रहा था, उसी समय देश भर में जीएसटी लागू कर दिया गया। जीएसटी को लेकर भी जेतली ने आलोचना झेली। हालांकि जेतली देश में टैक्स सिस्टम को ठीक करने की कवायद कर रहे थे। जीएसटी को लेकर जेटली समझौतावादी नहीं बने। हालांकि जीएसटी एक अच्छी व्यवस्था है, लेकिन जिस तरह से उसे लागू किया गया, उसको लेकर जेटली विरोधियों के निशाने पर रहे। पार्टी के अंदर भी उन्हें एक तबके ने जीएसटी को लेकर निशाना पर लिया। लेकिन जीएसटी जेतली के प्रयासों से देश में लागू हुआ। हालांकि इसे लागू करने के समय को लेकर अक्सर विवाद रहा। क्योंकि नोटबंदी की मार से देश निकला भी नहीं था और देश भर में जीएसटी लागू कर दिया गया। इससे व्यापारियों पर दोहरी मार पड़ने के आऱोप लगे। इससे देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचने की बात भी की गई। लेकिन जेटली अपने फैसले पर अटल रहे।
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