अक्सर लोग कहते मिल जाएंगे कि मेरे पास समय नहीं है, दिन छोटा पड़ जाता है, हफ्ता देखते ही देखते बीत जाता है और साल कैसे गुजर गया, पता ही नहीं चला। लगता है कि यदि हमारे पास कुछ और घंटे होते, तो हम वह काम भी कर लेते, जो अभी तक नहीं कर पाए थे। लेकिन, मुझे लगता है कि हमारी समस्या समय की कमी नहीं है। समस्या यह है कि हमारा ध्यान बहुत-सी जगहों पर बंटा है। समय तो हर मनुष्य को रोजाना एक समान ही मिलता है। बस फर्क इस बात में है कि हम उस समय के साथ क्या करते हैं। यही धीरे-धीरे हमारे जीवन को आकार देता है।
आधुनिक जीवन ने हमें जीवन को जीने के बजाय उसका हिसाब रखना सिखा दिया है। अब हम उपलब्धियां गिनते हैं। कितनी पढ़ाई की, कितना कमाया, कितनी संपत्ति बनाई, कितनों को पीछे छोड़ा, और कितनी यात्राएं कीं आदि। लगता है, जैसे जीवन कोई ऐसी सूची हो, जिसमें जितने अधिक खाने टिक कर दिए जाएं, जीवन उतना ही सफल माना जाए। लेकिन, जीवन कोई सूची नहीं है। वह तो एक आकार है।
जब एक मूर्तिकार पत्थर पर काम करता है, तो वह हर क्षण उसमें कुछ जोड़ता नहीं रहता। वह केवल अनावश्यक पत्थर हटाता है और फिर धीरे-धीरे उसे एक आकृति दिखाई देने लगती है, जो पहले से उस पत्थर के भीतर संभावित रूप में मौजूद थी। जीवन भी कुछ ऐसा ही है।
हम सोचते हैं कि जीवन को अच्छा बनाने के लिए हमें लगातार कुछ न कुछ हासिल करना होगा, जबकि जीवन का एक जरूरी हिस्सा यह सीखना है कि क्या नहीं करना है। कभी-कभी जीवन को बेहतर बनाने का सबसे अच्छा तरीका उसमें कुछ नया जोड़ना नहीं, बल्कि कुछ अनावश्यक चीजें निकाल देना होता है। जैसे-हर अवसर पकड़ना या हर इच्छा पूरी करना जरूरी नहीं और हर उपलब्धि के पीछे भागना भी आवश्यक नहीं।
हमारे पास समय इसलिए कम नहीं है कि घड़ी तेजी से चल रही है, बल्कि इसलिए कम महसूस होता है, क्योंकि हमारा ध्यान लगातार एक चीज से दूसरी चीज की ओर खिंचता रहता है। शरीर कहीं होता है, मन कहीं और। इस दौड़ में मनुष्य अपने वर्तमान को भविष्य की किसी उपलब्धि के बदले गिरवी रख देता है। इसलिए, समस्या उपलब्धि में नहीं है। समस्या तब शुरू होती है, जब उपलब्धि जीवन का एकमात्र पैमाना बन जाती है।
इसलिए कभी-कभी हमें अपने जीवन की सूची को देखना बंद करके यह देखना चाहिए कि क्या मेरा समय उन चीजों को मिल रहा है, जिन्हें मैं वास्तव में जरूरी मानता हूं? यहीं से जीवन में एक अलग प्रकार की ईमानदारी शुरू होती है। जीवन का सच्चा आत्म-मूल्यांकन उपलब्धियों की सूची नहीं, बल्कि समय के उपयोग को देखकर किया जा सकता है। शायद यही जीवन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
सिर्फ जोड़ें नहीं, छोड़ें भी...
जीवन उपलब्धियों को गिनने वाली सूची नहीं, बल्कि एक सुंदर मूर्ति की तरह है। मूर्तिकार पत्थर में कुछ जोड़ता नहीं, केवल व्यर्थ के पत्थरों को छांटकर भीतर छिपे स्वरूप को उजागर करता है। ठीक वैसे ही, जीवन की सुंदरता अधिक पाने में नहीं, बल्कि सही चीजों के लिए जगह बनाने में है। कभी-कभी आगे बढ़ने के लिए कुछ चीजों को पीछे छोड़ना पड़ता है।