अफगानिस्तान में तालिबानी: भविष्य में अधिक शक्तिमान होने पर यह उनकी भी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को निगल जाएंगे।
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तालिबानी सोच और व्यवस्था
नदी के प्रवाह की भांति मनुष्य का जीवन भी गतिशील है, परिवर्तनशील है। समाज के पटल पर समय-समय पर प्रतिभाशाली विचारक जन्म लेते रहते हैं और अपने चिंतन से सामाजिक जीवन में देश-काल और परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन का शंखनाद करते हैं। यह सामाजिक जीवन के विकास की सहज प्रक्रिया है, किंतु जब कोई समूह देश में वर्तमान युगजीवन की आवश्यकता और अपेक्षाओं की अनदेखी करके धर्म के नाम पर लगभग चौदह सौ वर्ष पुरानी मान्यताओं को समाज पर बलपूर्वक थोपने पर अड़ जाए और उस जैसी विचारधारा वाले अन्य देशों का समर्थन भी उसे मिलने लगे तो यह स्थिति न केवल उस देश के निवासियों के लिए अपितु अन्य देशों के लिए भी खतरनाक हो जाती है।
जिहाद के नाम पर आतंक फैलाते हुए अन्य धर्मों के लोगों को इस्लाम के झंडे के नीचे लाने को व्याकुल इन समूहों की बढ़ती ताकत विश्वशांति के लिए बढ़ता हुआ खतरा है। अन्य देशों में भी ऐसे समूह सक्रिय हैं और अपनी ताकत बढ़ाते जा रहे हैं।
भविष्य में अधिक शक्तिमान होने पर यह उनकी भी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को निगल जाएंगे। इसलिए समय रहते सावधान होना और ऐसी शक्तियों पर कठोर नियंत्रण किया जाना आवश्यक है।
तथाकथित धार्मिक समूहों, पंथों, संप्रदायों में बंटे सामाजिक समूहों में अनेक ऐसी कुरीतियां प्रचलित रही हैं, जो समय के साथ आती रहीं और समाप्त होती गईं। हिंदू समाज में सतीप्रथा, देवदासी प्रथा, छुआछूत आदि कितनी ही अमानवीय बुराइयां रहीं।
प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में इनकी स्वीकृति भी मिलती है, किंतु आज इनका निर्वाह करने का कोई दुराग्रह कहीं दिखाई नहीं देता। समाज अपने पुराने केंचुल को त्याग कर समरसता की दिशा में अग्रसर है।
आज यदि हिंदुओं में से कोई समूह कहे कि उसे हिंदू धर्म में सतीप्रथा, छुआछूत जैसी पुरानी रूढ़ियों को फिर से स्थापित करना है तो उसके इस दुराग्रह का कौन समर्थन करेगा? जो बुराई जब थी तब थी। यह विचार का विषय नहीं, इतिहास का दुखद स्वप्न है, जिसे विस्मृत करने में ही समाज की भलाई है। आज क्या होना चाहिए यह विचारणीय है।
इसी दृष्टि से भारत एवं अन्य देशों में नई-नई लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं मान्य हुई हैं, किंतु आश्चर्य का विषय है कि कट्टर इस्लामिक विचारक आज भी अपने प्रभाव क्षेत्र में नई व्यवस्थाओं का स्वागत करने और जीर्ण-शीर्ण रूढ़ियों को तोड़ने के लिए प्रस्तुत नहीं हैं। सहअस्तित्व और बंधुत्व के उदार विचारों से समृद्ध इस्लामिक विचारकों को समर्थन देकर कट्टरता और हिंसक उन्माद का पोषण करने वाली आतंकवाद की पैर पसारती मानसिकता को रोकना ही होगा, अन्यथा तालिबानी ताकतें न केवल अफगानिस्तान में अपितु समस्त विश्व में यूं ही रक्तपात करती रहेंगी।
तालिबान अफगानिस्तान को अशांत कर रहा है और विश्व के अन्य देशों को अशांत करने के लिए आतुर है।
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विचारणीय यह भी है कि जब अन्य धर्मों के लोग अपनी रूढ़ियों और कुरीतियों को छोड़कर आगे बढ़ रहे हैं तो इस्लाम के कट्टरपंथी तथाकथित बुद्धिजीवी अपने समाज को रूढ़ि मुक्त वातावरण देने के विरुद्ध क्यों अड़े हैं और समाज उनका खुलकर विरोध क्यों नहीं करता? वह उनका मौन समर्थन क्यों करता है? जब तक मुस्लिम समाज के अंदर से रूढ़ि-विरोधी स्वर मुखर नहीं होंगे, तब तक तालिबानी जिहादी मानसिकता का समाप्त होना कठिन है।
धर्म ईश्वरीय अस्तित्व की स्वीकृति है और मानवीय-मूल्यों की आधार भूमि है। विभिन्न धर्मो की पूजा-पद्धतियां भिन्न हैं, साधना-पथ भिन्न हैं किंतु लक्ष्य एक है- ईश्वर की कृपा प्राप्ति। हिंदू भक्त ईश्वर का अनुग्रह चाहता है, मुसलमान अल्लाह का करम पाने के लिए पांच बार नमाज अता करता है, ईसाई प्रेयर और सिख अरदास करता है। सब उस अदृश्य की कृपा पाने को प्रयत्नशील हैं, फिर विरोध क्यों?
जब सारी सृष्टि उस एक शक्ति की ही रचना है, फिर संघर्ष क्यों? वस्तुतः संघर्ष धर्म का नहीं, सत्ता का है सुविधा का है। सत्ता और सुविधा के लिए समूह के विस्तार का है। इसीलिए अफगानिस्तान में तालिबानी मुसलमान दूसरे मुसलमान का खून बहा रहा है।
अफगानिस्तान को अशांत कर रहा है और विश्व के अन्य देशों को अशांत करने के लिए आतुर है। इसीलिए विश्व समुदाय तालिबानियों की जीत पर चिंतित है। उदारता पर कट्टरता की जीत मनुष्य के लिए घातक है। पीड़ित अफगानियों के लिए विश्व की शक्ति का आगे आना अत्यंत आवश्यक है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला
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