समाज के लिए हमेशा आवाज उठाते रहे
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पूर्व प्रधान न्यायाधीश ने अपनी पुस्तक में सराहा
लाल बहादुर शास्त्री अकादमी से रिटायर होने के बाद उन्होंने रूरल लिटिगेशन एण्ड एण्टाइटिलमेंट केन्द्र (रुलक) की स्थापना कर वन गुजर जैसे समाज के उपेक्षित वर्ग को कानूनी सहायता देने की शुरुआत की।
अवधेश कौशल के बारे में भारत के प्रधान न्यायाधीश रहे जस्टिस पी.एन. भगवती ने अपनी पुस्तक ‘‘माइ ट्रीस्ट विद जस्टिस‘‘ में पूरा एक अध्याय कौशल द्वारा स्थापित रूरल लिटिगेशन एण्ड एण्टाइटिलमेंट केन्द्र को दिया है। जिसमें जस्टिस भगवती ने लिखा है-
रुलक के प्रयासों, लॉबीइंग तथा पैरवी की बदौलत, बंधुआ श्रम प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 भारत में अस्तित्व में आया। जस्टिस भगवती ने यह भी लिखा है कि रुलक द्वारा दायर केस के कारण पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 अस्तित्व में आया। रुलक ने सरकार से बहुत पहले कानूनी साक्षरता कार्यक्रम शुरू किया था जिसे भारत में भी बाद में सोचा गया।
अवधेश कौशल द्वारा मसूरी में चूना पत्थर खनन रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर फैसला देते हुए तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश न्यामूर्ति भगवती ने कहा था कि-
‘हमें रूरल लिटिगेशन एण्ड एण्टाइटिलमेंट केन्द्र द्वारा उठाए गए कदमों की सराहना करनी चाहिए। वनों का संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन को अप्रभावित रखना एक ऐसा कार्य है जिसे न केवल सरकारों को बल्कि प्रत्येक नागरिक को भी करना चाहिए। यह एक सामाजिक दायित्व है और आइए हम प्रत्येक भारतीय नागरिक को याद दिलाएं कि संविधान के अनुच्छेद 51 ए (जी) में निहित यह उसका मौलिक कर्तव्य है।’
जस्टिस भगवती रुलक और खास कर अवधेश कौशल के कार्यों से इतने प्रभावित थे कि बाद में वह कौशल के अभिन्न मित्र बन गए। जस्टिस भगवती को जूडिशियल एक्टिविज्म के पुरोधाओं में से एक माना जाता है जिन्होंने पोस्ट कार्ड पर सुप्रीम कोर्ट में जनहितकारी याचिका दायर करने की शुरुआत की थी।
एनजीओ चलाना बहुत ही नाजुक मसला है। कोई भी एनजीओ की छाती पर चढ़ने को बेताब रहता है। साथ ही पर्यावरण की ही तरह पद्म जैसे पुरस्कारों के लिए एनजीओ एक आसान सीढ़ी मानी जाती है। इसलिए एनजीओ चलाने वाले सरकार और सत्ताधारियों से बुराई मोल लेने की सोच भी नहीं सकते। लेकिन अवधेश कौशल का एनजीओ सबसे कमाऊ और खर्चीला होते हुए भी सरकारों और सत्ताधारियों से डरने के बजाय उनसे लड़ता रहा। उन्होंने अधिकांश मुख्यमंत्रियों, मुख्य सचिवों और प्रमुख वन संरक्षकों से टकराव मोल लिए। वन गुजरों के कारण वन विभाग के लिए अवधेश कौशल आंख की किरकिरी बने रहे।
गुज्जरों के हितों के लिए कौशल को जेल की हवा भी खानी पड़ी। उन्होंने वन गुजरों के हितों की लड़ाई लड़ने के साथ ही उन्हें वनों में ही साक्षर भी बनाया ताकि वे स्वयं अपनी लड़ाई लड़ सकें। बहुचर्चित जैनी सेक्स काण्ड में जब पीड़ित युवती सत्ताधारियों के दबाव में थी और उसे जान का तक खतरा था तो अवधेश कौशल उस पीड़िता के साथ भी अदालत में खड़े रहे।
उन्होंने देहरादून के बहुचर्चित रणवीर मुठभेड़ काण्ड का पर्दाफाश कराने में भी पूरा सहयोग दिया। उसी का नतीजा है कि 3 जुलाई 2009 के बाद उत्तराखण्ड में पुलिस दुबारा कोई मुठभेड़ ही नहीं कर सकी। उस मुठभेड़ काण्ड के आरोपी पुलिसकर्मी अभी तक जेल में हैं। वह मानवाधिकारों के बहुत बड़े पैरोकार थे।
उनकी संस्था ने शांति निकेतन के एफिलिएशन में मानवाधिकार पर डिप्लोमा पाठ्यक्रम भी शूरू किया जिसमें भारत के जानेमाने न्यायविद और मानवाधिकार कार्यकर्ता विजिटिंग फैकल्टी रहे।
पुरस्कारों के लिए जी-हुजूरी नहीं की
अपनी असाधारण सेवाओं के लिए उन्हें दर्जनभर से अधिक राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने कई पुरस्कारों से अलंकृत किया। उन्हें 1986 में पद्मश्री पुरस्कार मिला मगर उनके लिए पद्म पुरस्कारों की श्रृंखला कई अन्य की तरह आगे नहीं बढ़ सकी, क्योंकि वह सदैव धारा के विपरीत चले और सत्ता से भिड़ते रहे। जबकि पुरस्कारों के लिए कई एनजीओ संचालक सत्ताधारियों के आगे नतमस्तक रहते हैं।
उन्हें दर्जनों प्रतीष्ठित राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय गैर सरकारी अवार्ड मिले। वर्ष 2003 में ’’द वीक’’ मैग्जीन ने उन्हें मैन ऑफ द इयर घोषित किया।
पदमश्री अवधेश कौशल को 2004 में महाराणा मेवाड़ फाउंडेशन द्वारा पन्ना धाई पुरस्कार, भारत के उपराष्ट्रपति द्वारा ग्रामीण उत्थान के लिए जीडी बिड़ला अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार, स्कोच पुरस्कार - ग्रासरूट मैन ऑफ द ईयर, 2005, भारत में सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए इमान इंडिया सम्मान पुरस्कार -2012, सिविल लिबर्टीज, 2014 के संरक्षण के लिए नानी ए पालखिवाला पुरस्कार, मानवता को उत्कृष्ट सेवा प्रदान करने के लिए सतपॉल मित्तल राष्ट्रीय पुरस्कार 2016 अलंकृत किया गया।
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