फ्रांसीसी निर्देशक ज्याँ ल्युक गोदार्द
- फोटो : Twitter
लेखक, प्रोड्यूसर तथा फ़िल्म निर्देशक ल्युक बेसन ने ‘द बिग ब्लू’, ‘द फ़िफ़्थ एलिमेंट’, ‘लूसी’, ‘निकिता’, ‘द लेडी’ जैसी फ़िल्में बनाई। ‘जून एंड जॉन, तथा ‘डॉगमैन’ उनकी आने वाली (2023 में) फ़िल्में हैं।
फ्रांसीसी अभिनेता, स्क्रीनप्ले राइटर, निर्देशक ज्याँ रेनुआं से हिन्दी सिने-दर्शक भली-भाँति परिचित हैं। वही रेनुआं जिनकी फ़िल्म ‘टोनी’ से सत्यजित राय के अलावा कई फ़िल्म निर्देशक प्रेरित हुए। वे भारत आए और भारत पर ‘द रिवर’ नामक फ़िल्म बनाई। इसके अलावा ‘द गोल्डेन कोच’, ‘द रूल्स ऑफ़ द गेम’, ‘ग्रैंड इल्युशन’ उनकी अन्य फ़िल्में हैं।
फ्रांस के ही हैं रॉबर्ट ब्रेसन। ब्रेसन ने भी फ़िल्म लेखन तथा निर्देशन दोनों किया। 17 फ़िल्मों का लेखन करने वाले ब्रेसन ने ‘फ़ोर नाइट्स ऑफ़ ए ड्रीमर’, ‘ए जेंटल वूमन’, ‘मुस्टैच’, ‘द ट्रायल ऑफ़ जॉन ऑफ़ आर्क’, ‘पिकपॉकेट’, ‘ए मैन स्केप्ड’ जैसी तमाम फ़िल्में बनाई। इनकी निर्देशित फ़िल्म ‘डायरी ऑफ़ ए कंट्री प्रीस्ट’ खूब सराही गई। जॉर्ज बेर्नानोस के उपन्यास पर आधारित यह फ़िल्म पेट की रहस्यमयी बीमारी से ग्रसित एक युवा पादरी को अपनी ड्युटी निभाने का प्रयास करते हुई दिखाती है। समीक्षकों के द्वारा इसे खूब सराहा गया, इसे कई पुरस्कार प्राप्त हुए।
मशहूर निर्देशक लुइस माल
34 फ़िल्मों के निर्देशक लुइस माल ने सदा जिंदगी का अर्थ जानने और जिंदगी की खोज करने केलिए फ़िल्में बनाईं। फ्रांस के नोर्ड में जन्में माल का परिवार नहीं चाहता था कि वे फ़िल्म बनाएं, लेकिन बाद में उन्हें इसकी पढ़ाई की अनुमति दे दी। उन्होंने सिनेमाटोग्राफ़ी की शिक्षा ली। प्रारंभ में उन्होंने कैमरामैन का काम किया लेकिन शीघ्र को-डॉयरेक्टर और फ़िर डॉयरेक्टर बन गए। उन दिनों परदे पर प्रेमासक्ति दिखाना वर्जित था मगर माल ने ‘द लवर्स’ बना कर इस निषेध को समाप्त किया।
‘एटलांटिक सिटी’, ‘क्राकर्स, एलेवेटर टू द गेलोस’, ‘माई डिनर विथ एंड्रे’, ‘द थीफ़ ऑफ़ पेरिस’ जैसी फ़िल्म बनाने वाले लुइस माल छ: महीने भारत में रहे और उन्होंने 1969 में ‘कलकत्ता’ नाम से फ़िल्म बनाई। इसके साथ ही उन्होंने सात भाग में ‘फ़ैंथम इंडिया’ नाम से एक टीवी शृंखला बनाई, जिसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली। ‘द फ़ायर विदइन’ आत्महत्या को चित्रित करती है, तो ‘मर्मर इन द हार्ट’ माँ-बेटे के वर्जित संबंध पर आधारित है।
फ़्रेंच सिनेमा और हॉलीवुड दोनों में काम करने वाले माल की फ़िल्मों का एक अन्य कथानक सामाजिक अलगाव की भावना तथा वीरानापन रहा है। उन्होंने लेखकों, नाटककारों के संग मिल कर एवं उनके काम पर फ़िल्में बनाईं। लुइस माल ने अपने बचपन की एक स्मृति के आधार पर एक फ़िल्म फ़्रेंच भाषा में बनाई ‘अउ रिवोइर लेस एनफ़ैंट्स’ जिसका इंग्लिश में तर्जुमा होगा ‘गुडबाई, चिल्ड्रेन’। उन्होंने स्कूली दिनों में स्वयं नाजी सैनिकों का अत्याचार देखा था।
फ़िल्म की घटना उनकी आखों के सामने स्कूल में घटी थी। इस फ़िल्म में एक पल में चार जिंदगियां बदल जाती हैं। स्व-अनुभूति आधारित इस फ़िल्म को उन्होंने खुद लिखा था और इस फ़िल्म का प्रीमियर देखते हुए वे रो रहे थे। इस अति सुंदर फ़िल्म में 12 साल का जूलियन लुइस माल का प्रतिरूप है।
फ्रांस में कई अन्य फ़िल्म निर्देशक हुए हैं पर सिने-प्रेमी जॉर्ज मिलिएस को भला कैसे भुला सकते हैं। 1861 में जन्मे सिनेमा के पीछे पागल इस व्यक्ति ने सिनेमा के शुरुआती दौर में कई तकनीकि और कथानक विकास किए। इसने स्पेशल इफ़ैक्ट्स, मल्टिपल एक्सपोजर, टाइम-लैप्स फ़ोटोग्राफ़ी, डिजॉल्व, हैंड पेंटेड कलर आदि तमाम चीजों का सिनेमा में विकास किया। लेकिन आज भी इसे 1902 में ‘ए ट्रिप टू द मून’ तथा ‘द वोयज एक्रॉस द इम्पोसिबल’ (1904) केलिए याद किया जाता है। दोनों फ़िल्में अनोखी अतियथार्थवादी यात्रा तथा प्रारंभिक साइंस फ़िक्शन फ़िल्म्स के लिए जानी जाती हैं। मार्टिन स्कॉरसेसि ने 2011 में ‘ह्यूगो’ फ़िल्म बना कर जॉर्ज मिलिएस को श्रद्धांजलि दी है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।