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चुनाव परिणाम और होली: इस बार हर प्रदेश में अलग होगी राजनीतिक रंगों की होली

सार

पंजाब में प्रचंड बहुमत से चुनाव जीती आम आदमी पार्टी (आप) के लिए तो यह क्रांतिकारी होली है। पंजाब में देश के बाकी उत्तर भारतीय राज्यों से हट कर होली को ‘होला मोहल्ला’ के रूप में मनाने की प्रथा है, जिसे सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह ने शुरू की थी।

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भाजपा के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में यूपी में भाजपा बंपर बहुमत से सत्ता में लौटी है, लिहाजा होली के केन्द्र मथुरा-वृंदावन में भगवा रंग बेहद गाढ़ा है। - फोटो : PTI
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विस्तार
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यूं तो चुनावी नतीजे पक्ष में आने के बाद राजनीतिक दलों के लिए अमूमन हर होली या दिवाली सियासी रंगों से सराबोर होती है। कार्यकर्ताओं का उत्साह दो गुना हो जाता है। नई उम्मीदें हिलोरें लेने लगती हैं। इस होली भी हाल में पांच राज्यों में सम्पन्न विधानसभा चुनाव के बाद फाल्गुन के माह में कुछ ऐसे ही हालात हैं। इन चुनावों में पंजाब को छोड़ बाकी चार राज्यों में सत्तारूढ़ भाजपा एक साथ चार राज्यों में सत्ता में लौटी है, इसलिए जोश का गुलाल कुछ ज्यादा ही उड़ रहा है।

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हालांकि उत्तराखंड में पार्टी की भीतरी खींचतान के चलते सीएम का नाम तय होने में दिक्कत पेश आ रही हैं। लेकिन चुनाव के पहले भाजपा में भारी अंतर्कलह और पांच साल में तीन मुख्यमंत्री बदले जाने के बाद भी मतदाताओं ने अगर भाजपा को ही भरपूर बहुमत दिया तो यह वोटरों के भगवा रंग में रंगे होने का ही प्रमाण है, जो दूसरे किसी रंग के प्रति आकर्षित ही नहीं हो रहा।

दिलचस्प बात यह है कि जहां भीतरी कलह के लिए मतदाता ने पंजाब में पूर्व में सत्तारूढ़ कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर काला रंग पोता तो इसी बीमारी से ग्रस्त भाजपा को उत्तराखंड में सत्ता से नवाज कर गुलाबी रंग में रंगा।
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उधर, गोवा में नए सीएम के रूप में प्रमोद सावंत का नाम फिर तय होने के बाद वहां होली के अवसर पर मनाए जाने वाले ‘शिमगोत्सव’ में नई जान आ गई है। यह त्यौहार गोवा में रंगपंचमी के मौके पर मनाया जाता है। प्रमोद सावंत ‘लो प्रोफाइल’ होने के बाद भी पार्टी को दूसरी सत्ता के दरवाजे तक ले जाने वाले नेता साबित हुए हैं।
 

दरअसल, सावंत मराठा हैं और उन्हें फिर से सीएम की कुर्सी देकर भाजपा ने न सिर्फ गोवा बल्कि पड़ोसी महाराष्ट्र को भी एक राजनीतिक संदेश दिया है। शिमगा गोवा का पारंपरिक त्यौहार है, जो मछुआरा समुदाय में भी काफी लोकप्रिय है।


उधर, मणिपुर में भी मुख्यमंत्री बीरेन सिंह का दोबारा सत्ता संभालना तय है। हालांकि मणिपुर में होली नहीं मनाई जाती, लेकिन होली जैसा रंगोत्सव ‘योशांग’ हर साल मार्च के अंत में मनाया जाता है, जो 6 दिनों तक चलता है। ये त्यौहार मणिपुरी माह लाम्डा की पूर्णिमा से शुरू होता है। राज्य के सबसे प्रभावशाली मैतेई समुदाय में यह त्यौहार बेहद लोकप्रिय है।
 

मुख्यमंत्री बीरेन सिंह मैतेई समुदाय से हैं और राजनीतिक रूप से यह समुदाय अब काफी हद तक भगवा रंग में रंग गया है।  


इधर, भाजपा की सबसे ज्यादा धूम मचाने वाली होली उस उत्तर प्रदेश में मन रही है, जो होली के धार्मिक नायक-नायिका राधा कृष्ण की लीला स्थली भी है।

भाजपा के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में यूपी में भाजपा बंपर बहुमत से सत्ता में लौटी है, लिहाजा होली के केन्द्र मथुरा-वृंदावन में भगवा रंग बेहद गाढ़ा है। उस पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का न उतरने वाला देसी रंग अलग से चढ़ा हुआ है। जबकि बीते विधानसभा चुनाव में विपक्षी दलों के लिए यह ‘लठमार’ होली साबित हुई है। उस खेमे में निराशा है, साथ ही ‘जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझ कर’ होली खेलने का संतुष्टि भाव भी है।

वैसे भी उत्तर प्रदेश की होली में बहुत गहरे और दूर तक मार करने वाले सियासी रंग घुले हुए हैं। बहुत लोगों का मानना है कि इन चुनावों में उड़ा जीत का गुलाल अगले लोकसभा चुनावों में भी अपना असर दिखाएगा। भाजपा ने यूपी में जली उल्लास की होली से बची राख को अभी से गुजरात और कर्नाटक में फैलाना शुरू कर दिया है। आश्चर्य नहीं होगा अगर वहां लोग होली न सही, पर वक्त से पहले दिवाली मनाते दिखे।

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पंजाब में देश के बाकी उत्तर भारतीय राज्यों से हटकर होली को ‘होला मोहल्ला’ के रूप में मनाने की प्रथा है, जिसे सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह ने शुरू की थी। - फोटो : अमर उजाला

पंजाब में होली का क्रांतिकारी रंग

पंजाब में प्रचंड बहुमत से चुनाव जीती आम आदमी पार्टी (आप) के लिए तो यह क्रांतिकारी होली है। लोगों को उम्मीद तो थी कि आप वहां सरकार बना सकती है, लेकिन इतने भारी बहुमत से बनाएगी, यह तो शायद अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान ने भी नहीं सोचा होगा। यही कारण है कि मान ने सीएम के रूप में अपनी शपथ ग्रहण के लिए शहीदे आजम भगत सिंह की जन्म स्थली खटकड़कलां को चुना।
 
पंजाब की होली में गुलाल के साथ-साथ एक बसंती रंग हमेशा इठलाता आया है।

दरअसल, पंजाब में देश के बाकी उत्तर भारतीय राज्यों से हटकर होली को ‘होला मोहल्ला’ के रूप में मनाने की प्रथा है, जिसे सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह ने शुरू की थी। होली के दौरान निहंग सिख पूरे लाव लश्कर के साथ अपनी पारंपरिक युद्ध कला का प्रदर्शन करते हैं। जिसमें शौर्य और त्याग का मिलाजुला रंग होता है।

पंजाब में अब सत्ता की कमान उन भगवंत मान के हाथ में है, जिन्होंने नेता के बजाए जनता ही बने रहने की कसम खाई है। मान पूर्व कमेडियन रहे हैं। सीएम बनने के बाद वो एक ‘विदूषक और प्रशासक’ का कौन सा ब्लेंड पेश करते हैं, देखने की बात है।  

इस दफा होली के जोशीले होने की पीछे एक बड़ा कारण दो साल बाद मन रही कोरोना तनाव मुक्त होली भी है। यूं तो देश में कोरोना के इक्का-दुक्का मामले अभी भी आ रहे हैं, लेकिन बीते दो सालों में फाल्गुन पर मस्ती के बजाए कोरोना की दहशत का जो रंग चढ़ा हुआ था, वो इस दफा हाशिए पर है। लोग सुकून में हैं।

बाजार रंगों, पिचकारियों और मिठाइयों से भरे पड़े हैं। बच्चे भी खुलकर एक दूसरे को रंग लगा सकेंगे। लोग एक दूसरे से गले मिल सकेंगे। फर्क इतना है कि राजनीतिक होली में दिल स्वार्थों के हिसाब से मिलते हैं और रंग सियासी आग्रहों के हिसाब से उड़ते हैं।


चुनावी नतीजे इन्हे और सुर्ख बनाते या फिर फीका करते हैं। लेकिन यह रंग, रंग भले बदले लेकिन रहता कायम है। वही हो भी रहा है।
 
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