डेवलपर ने इस आदेश को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि देरी राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) के उस आदेश के कारण हुई थी जिसमें ओखला पक्षी अभयारण्य के 10 किलोमीटर के दायरे में निर्माण और अधिभोग प्रमाण पत्र जारी करने पर रोक लगाई गई थी।
हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि डेवलपर का स्वयं का मामला यह था कि परियोजना 2014 में पूरी हो गई थी और उसी वर्ष अधिभोग प्रमाण पत्र के लिए आवेदन भी किया गया था। इसलिए, वह एक साथ यह दावा नहीं कर सकता कि परियोजना पूरी हो चुकी है और एनजीटी के प्रतिबंध के कारण इसका पूरा होना रुका हुआ है।
कोर्ट ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मान्यता प्राप्त "शून्य अवधि" का लाभ केवल उस अवधि तक ही सीमित हो सकता है जिसके दौरान परियोजना वास्तव में प्रतिबंध से प्रभावित हुई थी और एनजीटी के आदेश से पहले हुई देरी को समाप्त नहीं कर सकता है। तदनुसार, अदालत ने विलंब अवधि के लिए ब्याज का भुगतान करने के निर्देश को बरकरार रखा और डेवलपर की अपील खारिज कर दी।