अप्रैल महीना शुरू होते ही आगजनी की घटनाएं भी शुरू हो चुकी है। मार्च केे अंतिम दिनों में और अप्रैल के शुरूआत में ही अब तक दो घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इनमें सबसे बड़ी बात यह है कि दोनों ही घटनाएं शहर से कुछ दूरी पर ही घटित हुई हैं। लेकिन अगर यही घटनाएं शहर के बाहर या फिर किसी पहाड़ी इलाके में होती तो फायर एंड इमरजेंसी विभाग के लिए मुसीबतों का पहाड़ खड़ा हो जाता।
विभागीय आंकड़ों की बात करें तो हर साल जिले में सौ से अधिक आगजनी की घटनाएं होती ही हैं। इनमें हर वर्ष लाखों का नुकसान भी होता है, लेकिन अब तक जिला में इन आगजनी की घटनाओं को रोकने के लिए विभाग के पास ठोस और कारगर सुविधा मौजूद नहीं है।
स्टाफ की कमी के साथ-साथ वाहनों की संख्या और पहाड़ी इलाकों में कोई भी फायर स्टेशन न होने के कारण विभाग के लिए हर साल गर्मी का मौसम नागवार ही गुजरता है। पहाड़ी इलाकों में आगजनी की घटनाओं को रोकने के लिए व्यवस्था राम भरोसे ही है।
जिला की बात करें तो कठुआ और हीरानगर सब डिवीजन में ही फायर स्टेशन हैं, लेकिन यहां भी स्टाफ और वाहनों की कमी होने के कारण हाल बेहाल ही है। बात कठुआ सब डिवीजन की करें तो जिला मुख्यालय पर ही स्टाफ की कमी विभाग के लिए परेशानी का सबब है।
तीन फायर टेंडर के साथ साथ एक छोटा वाहन और एक पंप सेट तो विभाग के पास हैं, लेकिन स्टाफ संख्या केवल सोलह है। ऐसे में हर फायर टेंडर के साथ छह लोगों की टीम भी पूरी नहीं हो पाती। एक साथ अगर कहीं दो फायर टेंडर आग बुझाने के लिए चले गए तो पीछे केवल तीन कर्मचारी ही बच जाएंगे। जिनके सिर पर एक फायर टेंडर और एक छोटे वाहन के साथ-साथ पंप सेट को चलाना होगा।
वहीं अगर हीरानगर की बात करें तो यहां पर स्टाफ तो पूरा है, लेकिन फायर टेंडर केवल एक ही है। पूरे हीरानगर सब डिवीजन की बात करें तो अंतराष्ट्रीय सीमा से लेकर डिंगा अंब जो बिलावर के साथ लगता है, तक का क्षेत्र है एक फायर टेंडर के सहारे है।