केंद्र व राज्य की दर्जनों रोजगारपरक योजनाओं से कानपुर में एक साल में कितना रोजगार बढ़ा, ये आंकड़ा यहां के किसी विभाग के पास उपलब्ध नहीं है। इसी तरह से बीते एक साल में उद्योग बंदी की वजह से कितने लोगों का रोजगार छिन गया, यह जानकारी भी किसी के पास नहीं है।
कुल मिलाकर रोजगार बढ़ाने के प्रयासों को बिना किसी नीति के धकेला जा रहा है। जिला प्रशासन, उद्योग विभाग और रोजगार कार्यालय के अफसर ये बताने की स्थिति में नहीं हैं कि जिले में रोजगार घटा है या बढ़ा है।
जिले में एक साल में रोजगार घटने और बढ़ने की दो स्थितियां सामने आईं। एक तो केंद्र और राज्य सरकार की तमाम योजनाओं के जरिये अरबों रुपये के लोन बांटे गए। इसमें मुद्रा योजना से लेकर प्रधानमंत्री स्वरोजगार योजना शामिल है। 50 हजार से लेकर 50 करोड़ रुपये तक के ऋण दिए गए।
इन्वेस्टर्स समिट में हुए निवेश से भी कुछ इकाइयां अस्तित्व में आईं। इससे भी रोजगार बढ़ा। दूसरी स्थिति रोजगार खत्म होने को हैं। एक साल में टेनरियों की बंदी की वजह से करीब दो लाख लोग बेरोजगार हुए। पॉलिथीन पाबंदी की वजह से भी दर्जनों इकाइयां बंद हुईं। यहां से भी रोजगार खत्म हुआ।
इसी तरह अन्य कारणों से औद्योगिक इकाइयां बंद होती रहती हैं। इससे खत्म होने वाले रोजगार का आंकड़ा किसी के पास नहीं है। इन तथ्यों से समझा जा सकता है कि एक तरफ रोजगार बढ़ रहा है तो दूसरी ओर घट भी रहा है। अब रोजगार का संतुलन क्या है? इसकी जानकारी किसी विभाग के पास नहीं है।
एक लाख के ऋण पर एक रोजगार
सरकार की तय नीति के मुताबिक एक लाख रुपये के ऋण पर एक व्यक्ति को रोजगार दिया जाना माना जाता है। इस तरह से उद्योग विभाग वर्ष के अंत में कुल बांटे गए ऋण के आधार पर दिए गए रोजगार की संख्या निकाल लेता है। इसी तरह लीड बैंक मैनेजर के पास मुद्रा योजना, लोन 59 मिनट्स समेत कुछ और तरह के ऋण के जरिये रोजगार का आंकड़ा उपलब्ध रहता है। यानी विभिन्न विभागों से इन्हीं आंकड़ों को संकलित कर लिया जाए, तो बढ़ते रोजगार की स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
बेरोजगारी जानने के प्रयास ही नहीं
जिले में उद्योग बंदी से कितने लोग बेरोजगार हुए, यह जानने का प्रयास ही नहीं हुआ। जिला प्रशासन की ओर से इसकी जिम्मेदारी भी किसी विभाग को नहीं सौंपी गई। रोजगार कार्यालय में किसी बेरोजगार ने रजिस्ट्रेशन करा लिया तो वह रिकॉर्ड में दर्ज हो गया, वरना कोई आकलन नहीं होता।
जिम्मेदार बोले
जिस विभाग की योजना होती है, वह अपने आंकड़े रखता है, लेकिन संकलित आंकड़ों की व्यवस्था नहीं बन सकी है। यदि ऐसा हो तो बेरोजगारों के लिए योजनाएं बनाने में मदद मिल सकती है। - सर्वेश्वर शुक्ल, संयुक्त आयुक्त, उद्योग
रोजगार बढ़ने के आंकड़े संकलित भले न हों, लेकिन अलग-अलग विभागों के पास जरूर रहते हैं। हालांकि बेरोजगारी का आकलन करने की कोई व्यवस्था नहीं है। संभवत: जिला स्तर पर यह काम कोई विभाग नहीं करता। - एसपी द्विवेदी, संयुक्त निदेशक, सेवायोजन विभाग