वजह अमर सिंह (45) और उनकी बेटी नित्या (5) का शव गठरी में बांधना पड़ा, क्योंकि उनकी आंत से लेकर पेट तक बाहर आ गए थे। इसे सिला तक नहीं जा सका। उनके शव को लेकर अमर के छोटे भाई राणा प्रताप सिंह एबुलेंस से रवाना हुए।
कुछ ऐसी ही हालत श्यामसुंदर (45) के शव की भी थी, जिनका एक हाथ अलग हो गया था और सिर फट गया था। उनके बेटे के बंगलूरू में होने के कारण प्रिंस चौरसिया अपनी मां सुधा चौरसिया (52) के शव को लेकर एंबुलेंस से घर के लिए निकले। वहीं, सुरेंद्र गुप्ता (54), पुष्पा (40) और भगवानी देवी के शव को लेकर शिवम यादव एंबुलेंस से चले।
सुब्बाबाजार निवासी इसरावती देवी (45) के शवों के साथ एबुंलेंस से जितेंद्र सिंह लेकर निकले। जबिक ग्राम प्रधान बृजेश सिंह बैजू और शैलेंद्र सिंह छह अन्य गाड़ियों से परिजनों को लेकर हरदीचक के लिए निकले, जो रात में 3:30 बजे के करीब 150 किमी की दूरी तय कर पहुंचे तो गांव में कोहराम मच गया।
एएसपी सिटी ज्ञानेंद्र नाथ सिंह, सीओ सदर सुधाकर पांडेय, प्रभारी निरीक्षक दीन दयाल पांडेय पोस्टमार्टम कराने में लगे रहे। शवों को उठाने में समाजसेवी कुंवर वीरेंद्र सिंह भी मदद करते रहे।
पोस्टमार्टम के बाद रात में करीब डेढ़ बजे सभी अपने घर पहुंचे ही थे कि मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती सुभावती (40) पत्नी शिव निवासी हरदी चक थाना बांसगांव के भी मौत की खबर मिल गई, जिसके बाद पहुंचे अधिकारियों ने लिखापढ़ी के बाद शव को मॉर्च्यूरी में रखवाया और शवों को लेकर रवाना हुए लोगों को भी सूचना दी।
कोई पिता तो कोई पति का आखिरी बार नहीं कर पाया दीदार
अमर सिंह तीन भाइयों में सबसे बड़े थे। वह अपनी पत्नी वंदना सिंह (53) और बड़ी बेटी अंशिका सिंह (14) और नित्या (5) के साथ महाकुंभ स्नान करने गए थे। घर पर परिवार की देखभाल के लिए दूसरे नंबर की बेटी को छोड़ दिए थे। हालांकि हादसे में अमर और उनकी छोटी बेटी की मौत हो गई। जबकि पत्नी और अंशिका गंभीर रूप से घायल हो गईं। वहीं, अमर के पिता शंभू सिंह, चाचा ऋषि कुमार भी पोस्टमार्टम हाउस पर गुमशुम इधर से उधर घूमते नजर आए।