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माेदी के 10 दांव जिसने बुंदेलखंड के सूखे में भी कमल खिला दिया कमल

Sat, 11 Mar 2017 11:25 PM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
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यूपी चुनाव में भाजपा की बड़ी जीत
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फकीरी अंदाज़ में देश की सत्ता संभालने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शायद यही सबसे बड़ी ताकत है, जिसने पूरे देश में मोदी नाम का जादू ठीक उसी तरह बरकरार रखा है जैसा 2014 के लोकसभा चुनाव में दिखा था। उस वक्त नमो मैजिक ने देश की सत्ता में 30 साल बाद प्रचंड बहुमत वाली सरकार बनाई तो आज नमो-नमो का ये जाप उन चुनावी राज्यों में भी दिख रहा है, जिसने कल तक एक्जिट पाेल में भाजपा काे अागे रखा था अाैर अाज वह रूझान परिणाम में बदल रहे हैं। पढ़िए क्या हैं वाे दस कारण जिन्हाेंने माेदी की लहर काे बुंदेलखंड में सुनामी बना दिया...
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 रैली के जरिए अाम लाेगाें से जु़ुड़ने की काेशिश की
- बीजेपी की तरफ से कोई सीएम कैंडिडेट नहीं था। वह मोदी के चेहरे पर ही चुनाव लड़ रही थी। मोदी ने यूपी में 20 से ज्यादा रैलियां कीं। प्रचार पूरी तरह से मोदी पर फोकस्ड रहा। पार्टी ने उनकी विकास की इमेज का पूरा फायदा उठाया। उनके भाषणों ने जनता को बीजेपी के प्रति आकर्षित करने का काम किया। उन्हाेंने अपने हर एक रैली में अाम लाेगाें काे जाेड़ने की काेशिश की

नोटबंदी फेवर में रही
नोटबंदी का भी बीजेपी को फायदा मिलता दिख रहा है। सपा-बसपा-कांग्रेस ने इस मुद्दे को भुनाने की कोशिश की लेकिन नोटबंदी का मुद्दा बीजेपी के फेवर में गया। जानकारों का ये भी मानना है कि विधानसभा चुनाव में पहली बार पार्टी ने युवाओं पर सबसे ज्यादा दांव लगाया, जिसका फायदा उसे मिला। चित्रकूट, बांदा, हमीरपुर, महाेबा, जालाैन जैसे बुंदेलखंड के जनपदाें में माेदी ने यह साबित करने में कामयाबी हासिल की कि नाेटबंदी गरीबाें के हक में है अाैर इससे उन्हें फायदा मिलेगा।
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कास्ट फैक्टर
 बीजेपी ने मुस्ल‍िमों को लुभाने के लिए सपा-कांग्रेस अलायंस या बसपा जैसी स्ट्रैटजी नहीं अपनाई। उसने शहरी अाैर ग्रामीण इलाकाें के युवाअाें पर फाेकस किया अाैर यह बताने में कामयाबी हासिल की कि अब प्रदेश में राजनीति से उठकर विकास व राेजगार के मुद्दाें पर लड़ाई लड़ी जाए। 

सपा-कांग्रेस क्यों हो रही पीछे?

टिकटों का बंटवारा
 
सपा-कांग्रेस के पीछे होने का कारण अखिलेश यादव का अपने हिसाब से किया गया टिकटों का बंटवारा है। इसके अलावा, कांग्रेस के साथ अलायंस से भी सपा को नुकसान हो रहा है।

सरकार के बाद के सालों में अखिलेश ने की गड़बड़ी

अखिलेश की कैबिनेट में पहले संतुलन स्थापित करते हुए सभी वर्ग के नेताओं को तवज्जो दी गई, लेकिन चुनावी साल आते-आते यादव के अलावा अन्य पिछड़ी जातियों के नेताओं को अखिलेश ने कैबिनेट से कहीं बाहर कर दिया तो कहीं किसी और वजह से नाराजगी मोल ली। इनमें बेनी प्रसाद वर्मा, अम्बिका चौधरी, नारद राय और कई बड़े नेता शामिल रहे।

सपा में विवाद का असर: 50 से ज्यादा सीटों पर नुकसान

- 6 महीने चला मुलायम कुनबे का झगड़ा चुनाव से पहले जाकर शांत हुआ। इससे अखिलेश की पर्सनल इमेज जरूर मजबूत हुई, लेकिन इस दौरान कई दुश्मन भी बने।

- 50 से ज्यादा सीटों पर भितरघात हुआ। ये उन्होंने किया, जिन्हें बिना किसी वजह से पार्टी में किनारे कर दिया गया था। और ये तब हुआ, जब अखिलेश को साइकिल निशान मिला। जिलों में कार्यकारिणी बदली गई। इसका असर नतीजों पर साफ पड़ता द‍िख रहा है।

बसपा क्यों हो रही पीछे?
- मायावती ने दलित-मुस्लिम गठजोड़ पर भरोसा जताया। यूपी में करीब 40 फीसदी दलित वोटर हैं, लेकिन 2014 से बीजेपी ने बसपा के इस वोट बैंक में सेंधमारी की।

- इसके अलावा मायावती ने 97 मुस्लिम कैंडिडेट्स को टिकट दिया, जिससे अन्य दलित और सवर्ण वोट छिटक गया। मायावती मुस्लिम कैंडिडेट्स पर इस तरह मेहरबान रही कि उन्होंने मुख्तार अंसारी को पार्टी में लिया, लेकिन बेनी प्रसाद वर्मा को नहीं लिया।
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यूपी का जातिगत आंकड़ा
दलित- 21.1%
ओबीसी- 41%
मुस्लिम- 19.3% 
सवर्ण- 23%

यहां कितने वोटर्स हैं?
- कुल आबादी करीब 20 करोड़ है। यह देश की आबादी की करीब 19 % है।
- 2017 में करीब 14.16 करोड़ वोटर्स वोट डालेंगे।
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