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रेत के ढेर पर सपनों का आशियाना, डरा रही नियमों की अनदेखी, आगे क्या होगा पता नहीं

Thu, 19 Jul 2018 09:17 AM IST
एसएस अवस्थी, अमर उजाला, नोएडा
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- फोटो : अमर उजाला
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बुजुर्ग कहते थे कि ऐसा मकान बनना चाहिए कि जिससे नाती-पोते भी आराम से रह सकें लेकिन अब ऐसा नहीं है। रेत के ढेर पर सपनों का आशियाना खड़ा किया जा रहा है। जब नींव ही कमजोर होगी तो इमारतें कैसे मजबूत होंगी। यही कारण है कि शाहबेरी जैसे हादसों की शुरूआत हो चुकी है। वैसे भी आए दिन इस तरह की सुर्खियां बनती रहती हैं कि किसी बिल्डर सोसायटी की छत की सीलिंग गिर गई। बच्चा बाल-बाल बचा। कहीं सरकारी मकान का छज्जा गिर जाता है तो कभी आंधी तूफान आने पर फ्लैटों के दरवाजे और खिड़कियां उखड़ जाते हैं।

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दरअसल, नोएडा और ग्रेटर नोएडा शहर बसे तो यहां पर फ्लैट कल्चर बड़ी तेजी से बढ़ा है। इसके पीछे कारण रहा है कि जमीन कम होती गई और रहने वालों की संख्या बढ़ती गई। विशेषकर नोएडा शहर के आसपास जिसमें नोएडा एक्सटेंशन भी शामिल है, तेजी से फ्लैट बनते चले गए। पूरे जिले की बात करें तो करीब 10 लाख फ्लैट(बने और अधबने) हैं। गांवों में लोगों ने मकान तोड़कर कम जगह पर फ्लैट बना दिए और किराए का साधन हो गया।

हिंडन और यमुना का रेतीला क्षेत्र है
हिंडन नदी और यमुना नदी के आसपास वाला क्षेत्र रेतीला है। यहां पर भले ही नींव गहरी बनाई गई लेकिन वह रेत के ढेर पर ही टिकी हुई है। इमारतों में जरा सी हलचल नींव बर्दाश्त करने के काबिल नहीं है। चूंकि पहले यह बाढ़ग्रस्त क्षेत्र था। हिंडन और यमुना में बाढ़ के वक्त आपस में मिल जाती थीं। जरा सी खुदाई करने पर पानी निकल आता था लेकिन जैसे ही पत्थरों का शहर बनना शुरू हुआ तो सबसे पहले बिल्डरों ने जमीन के पानी को सुखाना शुरू किया। जब कोई बिल्डर फ्लैट बनाता है तो सबसे पहले बिल्डिंग के आसपास के जमीन के नीचे का पानी बाहर निकाला जाता है। जब पानी का तल बिल्कुल नीचे चला जाता है, तभी नींव रखी जाती है लेकिन कितनी भी खुदाई की जाए, रेत-ही-रेत जमीन के अंदर भरा हुआ है।

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खादर में ऊंची इमारत का मतलब ही नहीं

बिशनपुरा गांव निवासी रामकुमार तंवर ने बताया कि गांव में अभी भी ऐसे घर बने हुए हैं जिनमें दो पीढ़ी से लोग रह रहे हैं। लेकिन शहर में जो नई इमारतें बन रही हैं, उसमें घटिया निर्माण सामग्री प्रयोग की जाती है। एक से डेढ़ ईंट पर मकान खड़ा कर दिया जाता है। जो पिलर बनाए जा रहे हैं वह मजबूत नहीं है। ठेकेदार उसमें  सीमेंट, रेट समेत अन्य मिलावटी सामान मिला रहा है। मकानों में चमक दमक दिखाने के लिए टाइल्स का प्रयोग होता लेकिन अंदर से दीवार खोखला होती है।

अब तो 50 साल मकान चल जाए तो बड़ी बात
बिल्डिंग मैटेरियल के जानकार योगेंद्र शर्मा का मानना है कि नोएडा शहर व आसपास जो इमारतें बन रही हैं, उनकी उम्र 50 से 60 साल ही है। जबकि जो मकान मजबूत बनाए जा रहे हैं, उनका 100 साल तक भी कुछ नहीं बिगड़ेगा। अभी नोएडा को बसे हुए सिर्फ 42 साल हुए हैं। प्राधिकरण ने जितने भी मकान बनाए हैं, वे बेहद की कमजोर हैं। कहीं दीवार दरक रही है तो कहीं छत बारिश में टपकती मिल जाएगी। कहीं बीम ही टूटकर गिर रहे हैं। भवन निर्माण में प्रयोग होने वाले सामान में ठेकेदार बचत के चक्कर में रेत का ही ढांचा खड़ा कर रहे हैं।
 
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सीलन सबसे बुरी बीमारी है

- फोटो : अमर उजाला
न तो प्राधिकरण इस तरफ ध्यान दे रहे हैं और न ही बिल्डर। शहर की कोई भी ऐसी इमारत नहीं है, जिसमें सीलन न हो। श्योराज सिंह के मुताबिक सीलन से  तो मकान 30-40 साल में ही गिरने की स्थिति में आ जा रहा है। कोई तकनीकी भी काम नहीं कर पा रही है। प्राधिकरण भले ही 99 साल की लीज पर कोई प्रॉपर्टी देता हो लेकिन जब मकान या इमारत की उम्र ही 50 साल से अधिक नहीं होगी, तो प्राधिकरण को दोबारा इस बात पर सोचना चाहिए। सीलन एक तरह घुन है तो इमारत में लगी हर चीज को खराब कर देता है।

बिल्डर सोसायटी में शाहबेरी से भी ज्यादा खतरा
नेफोमा अध्यक्ष अन्नू खान की मानें तो आने वाले समय में सबसे बड़ा संकट यहां पर बिल्डर सोसायटी में होगा। तूफान या भूकंप की स्थिति में जो छोटे बिल्डर हैं, वह घटिया सामग्री प्रयोग कर रहे हैं। मानकों का पालन नहीं हो रहा है। कमजोर नींव पर इमारतें खड़ी हैं, वे भरभराकर गिरेंगी। शाहबेरी मामले में भी अवैध कॉलोनाइजरों ने ही खेल किया है। इसमें प्रशासनिक ढांचा व्यवस्था ही दोषी है। इनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
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