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Aligarh News: किताबों के पन्नों पर ही रह गया भारत प्रकाशन मंदिर, यहीं छपी थी नोबेल विजेता मोरिस की नील विहग

Mon, 26 Dec 2022 04:39 PM IST
चमन शर्मा आशीष निगम

सार

1946 में पंडित बद्री प्रसाद द्वारा शुरू किया गया भारत प्रकाशन मंदिर अब बंद हो गया। घर में कोई बेटा न होने से इस मशहूर प्रकाशन केंद्र को इसके संचालक रमेश चंद्र ने बंद करने का फैसला किया। 
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अलीगढ़ का पहला भारत प्रकाशन मन्दिर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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उर्दू और हिंदी साहित्य के लिए देश-दुनिया में मशहूर अलीगढ़ का पहला प्रकाशन केंद्र रविवार को बंद हो गया। यहां की बहुमूल्य किताबें सुरक्षित रखवा दी गईं हैं। अब इसकी सेवाएं नहीं मिलेंगी। इसके संचालक एवं डीएस कॉलेज के हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. रमेश चंद्र शर्मा ने बेहद भरे हुए मन से इसे बंद करने का फैसला किया है।
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 आजादी से ठीक एक पहले सन 1946 में उनके पिता पंडित बद्री प्रसाद ने भारत प्रकाशन मंदिर की शुरुआत की थी। तत्कालीन रेलवे मजिस्ट्रेट एवं साहित्य प्रेमी जयपाल सिंह की प्रेरणा से उन्होंने इस प्रकाशन केंद्र को शुरू किया था। उस दौर में किताबों की बहुत मांग थी और अलीगढ़ में कोई प्रकाशन केंद्र नहीं था। तब भारत प्रकाशन मंदिर की शुरुआत रेलवे रोड स्थित सुभाष चौक से हुई और इसकी प्रेस रघुवीरपुरी में लगाई गई। पंडित बद्री प्रसाद के साथ उनके बड़े बेटे हरिश्चंद्र शर्मा और रमेश चंद्र शर्मा ने मिलकर इसकी जिम्मेदारी संभाली। 

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वर्ष 1989 में बद्री प्रसाद का निधन हो गया। उसके बाद कामकाज हरिश्चंद्र के कंधों पर आ गया। वर्ष 2019 में हरिश्चंद्र का भी निधन हो गया। 76 वर्ष के रमेश चंद्र पिता और भाई के जाने के बाद अकेले पड़ गए। घर में दो भाइयों के बीच कुल चार बेटियां थीं। इनमें से तीन अपने परिवारों के साथ अमेरिका में बस गईं। चौथी दिव्यांग बेटी घर पर ही है। घर में कोई बेटा न होने से इस मशहूर प्रकाशन केंद्र को संभालने के लिए कोई नहीं रह गया। ऐसे में रमेश चंद्र ने इसको बंद करने का फैसला किया। रविवार को उन्होंने बेहद भावुक मन से यहां का सामान शिफ्ट करना शुरू कर दिया। इसके साथ ही देश के जाने माने साहित्यकारों की बैठक का गवाह रहा भारत प्रकाशन मंदिर हमेशा के लिए अलीगढ़ के तालों में कैद हो गया। 


 
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नोबेल पुरस्कार विजेता की पुस्तक यहां प्रकाशित हुई थी

नोबेल पुरस्कार विजेता अंग्रेजी लेखक मोरिस मेटर लिंक की किताब ब्ल्यू बर्ड का हिंदी अनुवाद गोपालदास नीरज और गुजराती साहित्यकार कुंदनिका कपाड़िया ने किया था। हिंदी में ये किताब भारत प्रकाशन मंदिर से प्रकाशित की गई थी। जिसे नील विहग नाम दिया गया। लगभग 55 वर्ष पहले इस किताब की कीमत मात्र एक रुपये थी।   



बड़े रचनाकारों का रहा साथ 
यहां पर हजारी प्रसाद द्विवेदी, गोवर्धन नाथ शुक्ला, अंबा प्रसाद सुमन, कैलाश चंद्र भाटिया, रवींद्र भ्रमर, श्रीकृष्ण सहाय सहित कई प्रमुख साहित्यकारों का आना जाना रहा। गोपाल दास नीरज, बनारसी दास चतुर्वेदी, नवाब सिंह चौहान, हरवंश लाल शर्मा, डा. मनोहर लाल गौड़, डा. प्रेम स्वरूप गुप्ता, गोवर्धन नाथ शुक्ल, कुंदन लाल उत्प्रेती और रांगेय राघव की साहित्य एवंअन्य रचनाएं यहां से प्रकाशित हुई हैं। 

सफर एक नजर में
1-2000 से अधिक किताबों का प्रकाशन हुआ और उत्तर प्रदेश सरकार की पहली से आठवीं तक, यूपी बोर्ड की नौवीं से बारहवीं की किताबें प्रकाशित होती रहीं। 
2-1955 के आसपास इसका पंजीकरण नवीन चंद्र निधीश ने कोलकाता से कराया था। 1968 में इसका पंजीकरण रजिस्ट्रार चिट फंड कार्यालय आगरा से कराया गया। 
3-इसकी प्रेस रघुवीर पुरी में लगाई गई थी, जिसमें 20, ओपीआई सहित कई मशीनें थीं, ये अलीगढ़ की शुरुआती प्रेस था, जिसे वर्ष 2006 में बंद करा दिया गया था।
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