ललितपुर। महरौनी तहसील क्षेत्र में बन रहे भौंरट बांध के लिए भूमि अधिग्रहण मुआवजे में आदिवासियों की आड़ में कुछ प्रभावशाली लोगों द्वारा जमकर खेल किया जा रहा है। डूब क्षेत्र में पड़ने वाली आदिवासियों की जमीन को कुछ भूमाफिया अपने विश्वसनीय दूसरे आदिवासी के नाम से खरीद कर मुआवजे के नाम पर लाखों रुपये डकार गए हैं।
इसमें मजे की बात यह है कि जिन आदिवासियों के नाम से डूब क्षेत्र की जमीन खरीदी गई तथा उसका मुआवजा भी निकाल लिया गया, इसके बारे में उन्हें पता तक नहीं है। इसमें सरकारी पेच न फंसे इसके लिए यह तरकीब इस्तेमाल की गई है कि आदिवासी की जमीन को दूसरे आदिवासी के नाम से खरीद कर रजिस्ट्री करवाई गई है तथा मुआवजा इस खेल में पीछे से शामिल प्रभावशाली लोग अपनी जेब में डाल रहे हैं। इसमें अफसरों की भूमिका भी संदिग्ध प्रतीत हो रही है, क्योेंकि डूबे क्षेत्र के वे किसान जिनकी जमीन पहले डूबना है, उन्हें मुआवजा मिल नहीं पाया तथा जो आखिरी छोर पर पानी से दूरी पर थे भू माफिया की साठगांठ से इन जमीनों का मुआवजा पहले जारी कर दिया गया है।
सहरिया समुदाय के लोगों के नाम पर उनके गांव से कई किलोमीटर दूर स्थित ग्राम किसरदा में अक्तूबर 2017 से जनवरी 2018 के बीच जमीन खरीदी गई। इस खरीद में पैसा भूमाफियाओं ने अपना लगाया। प्रभावशाली लोगों का मोहरा बने सहरियों को ये भी पता नहीं चला कि उनके नाम पर खरीदी जा रही लाखों रुपये की जमीन के पीछे क्या खेल चल रहा है। इस भूमि का बांध क्षेत्र में अधिग्रहण कर उसका मुआवजा ले लिया गया।
दस्तावेजों के अनुसार पाली तहसील के डोंगरा कला निवासी भागीरथ को 14 लाख 14 हजार रुपए, इसी गांव के हबू पुत्र बैरा को 25 लाख 48 हजार रुपये व मैनवार निवासी चैनू पुत्र मौनलाल को 18 लाख 6 हजार रुपए का मुआवजा दिया गया है। हैरानी की बात यह है कि इन आदिवासियों .ह भी पता नहीं है कि उनके नाम पर किस जमीन का मुआवजा उन्हें दिया गया है तथा धनराशि किसके पास चली गई है। हकीकत में इन लोगों के पास अपने गांव में ग्राम सभा द्वारा दी गई पट्टे की ही जमीन है और कुछ के पास वह भी नहीं है। इन आदिवासियों के नाम पर कुछ भू माफिया ने अक्तूबर 2017 से जनवरी 2018 के बीच अपने गांव से कई किलोमीटर दूर बसे तहसील महरौनी के ग्राम किसरदा में जमीन खरीदी और मात्र कुछ ही महीने में उस जमीन का अधिग्रहण करवाकर लाखों रुपये का मुआवजा पा लिया, जबकि बांध के नजदीकी डूब क्षेत्रों में अधिग्रहीत की गई जमीनों का अभी तक मुआवजा नहीं मिला है। साल 2016 में तत्कालीन डीएम डा. रूपेश कुमार ने भौंरट बांध के अधिग्रहण कार्य में जमीनों के क्रय विक्रय पर विशेष नजर रखने का लिखित आदेश जारी किया था।
हमें तो वे लिवा ले गए थे
पाली तहसील के ग्राम डोंगराकला निवासी भागरीथ सहरिया को उनकी ग्राम किसरदा में स्थित 0.202 हेक्टेयर जमीन के लिए 14 लाख 14 हजार रुपये का मुआवजा मिला है। भागीरथ ने यह जमीन 30 नवंबर 2017 को किसरदा के आदिवासी कुंजी पुत्र असउ से खरीदी थी। भागीरथ के पास अपने खुद के गांव में ग्राम सभा से मिली तीन एकड़ जमीन का पट्टा मात्र है और गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर कर रहा है। भागीरथ ने बताया कि पिछले साल उसे गांव के एक व्यक्ति द्वारा महरौनी तहसील में ले जाकर उसके नाम जमीन की रजिस्टी कराई थी। उसके नाम पर महरौनी स्थित बैंक में नया खाता खुलवाकर पासबुक, चेक व एटीएम भी उसी प्रभावशाली व्यक्ति ने अपने पास रख लिया था। ऐसी ही कहानी हबू व चैनू की भी है।
इनका कहना है
ऐसा कोई नियम नहीं है कि पहले किसको मुआवजा दिया जाए और किसको बाद में दिया जाए। यदि इस प्रकरण में भूमाफियाओं को लाभ पहुंचाया गया है, तो इसकी जानकारी मुझे नहीं है। यह मेरे कार्यकाल के पहले का मामला है।
राजीव सिंह, अधिशासी अभियंता, सिंचाई निर्माण खंड तृतीय ललितपुर।
शुरू से विवादों में घिरा रहा भौंरट बांध
ललितपुर। महरौनी तहसील में हजारों हेक्टेयर भूमि को पानी उपलब्ध कराने के लिए सिंचाई विभाग द्वारा वर्ष 2007 में भौंरट बांध बनाने की योजना तैयार की गई थी। उस समय इस बांध की लागत 8,540 लाख तय की गई थी। बांध निर्माण में देरी के चलते बजट में कई गुना बढ़ोत्तरी होने से इसकी लागत 61,277 लाख रुपये हो गई है और इसमें अभी और बढ़ोत्तरी की संभावना है। वर्ष 2007 में भौंरट, भैरा गांवों में किसानों से तत्कालीन सर्किल रेट के आधार पर जमीन खरीद कर मुआवजा वितरित किया गया। दस वर्ष काम शुरू न कर वर्ष 2016 में बांध के स्पिल वे का काम शुरू किया गया। दस वर्ष में जमीनों के दाम व मुआवजा दर में भारी परिवर्तन होने के कारण बढ़े हुए दरों की मांग को लेकर ग्राम भैरा, बम्हौरी घाट और भौंरट सतलींगा गांव के किसानों ने वर्ष 2016 के अक्टूबर माह में बांध के निर्माण कार्य का प्रदर्शन करके विरोध किया था।
इसी दौरान ग्राम भैरा निवासी गब्बर (24) पुत्र दुज्जे ने क्षुब्ध होकर निर्माणाधीन बांध में अधिकारियों के सामने ही छलांग लगा दी थी। युवक को पानी में डूबता देख अफसरों के हाथ पैर फूल गए थे। इसके बाद प्रदर्शन उग्र होता चला गया था दर्जनों महिलाएं हाथों में हंसिया व लाठी-डंडे लेकर आगे आ गईं। कई किसान ने कार्यदायी संस्था की मशीनों को अपने कब्जे में ले लिया था। प्रदर्शनकारी किसानों का कहना है कि अधिकारियों ने यह आश्वासन दिया था कि उन्हें बढ़े हुए दरों के अनुसार मुआवजा मिलेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। प्रशासनिक हस्तक्षेप के बाद किसानों ने आंदोलन वापस लिया था।
बांध एक नजर में
वर्ष 2007 में स्वीकृत भौंरट बांध को जामनी नदी पर बनाया जा रहा है। बांध की लंबाई 4.750 किमी व अधिकतम ऊंचाई 22.08 मीटर होगी। इसमें जलग्रहण क्षमता 45.08 एमसीएम होगी, जिसमें से 28.47 एमसीएम पानी सिंचाई, 1 एमसीएम पेयजल व 13.18 एमसीएम पानी जल तापीय विद्युत गृह के लिए आवंटित किया गया है। बांध के निर्माण से 16 हजार हेक्टेअर जमीन पर सिंचाई हो सकेगी। बांध के लिए वन विभाग की 209.58 हेक्टेअर जमीन का उपयोग किया जाना है। वन मंत्रालय द्वारा अभी तक अपनी जमीन के उपयोग की अनुमति सिंचाई विभाग को नहीं दी है।
कुछ जमीनों पर विशेष मेहरबानी
भौंरट बांध परियोजना लंबे समय से प्रस्तावित है और इसके जरिये महरौनी तहसील में लगभग 16 हजार हेक्टेयर रकवा को सिंचित करने का लक्ष्य हैं। हालांकि वर्ष 2007 से प्रस्तावित योजना में तेजी नहीं आ पाई और लगातार बजट में बढ़ोत्तरी हुई है। सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए बजट की बंदरबाट के लिए सिंचाई विभाग के अधिकारियों, राजस्व विभाग व भूमाफिया का गठजोड़ सामने आया है। बांध के लिए जरूरी जमीन के नाम पर आदिवासियों की जमीन को औने पौने दाम पर खरीद कर सरकार से लाखों रुपये मुआवजा हड़प लिया गया है। भौंरट बांध के लिए बम्हौरीघाट, वेदपुर, मुड़िया, सकरौनी, पचौड़ा, भैरा, कुरोरा, सतलिंगा, भौंरट, छपरट, गगनिया व किसरदा गांवों की जमीन का अधिग्रहण किया जाना है। अधिकारियों ने बजट की बंदरबाट करने के लिए बांध के छोर पर स्थित ग्राम किसरदा की जमीन का अधिग्रहण कर लिया है और बड़ी तेजी से यहां कुछ विशेष जमीनों का मुआवजा भी वितरित कर डाला। जबकि, नियमानुसार सिंचाई विभाग द्वारा बांध में पूर्ण रूप से भराव वाली जमीन का अधिग्रहण प्राथमिकता पर होना चाहिए था। ग्राम किसरदा की जमीन का सर्किल रेट भराव क्षे़त्र में आने वाली जमीनों में सबसे ज्यादा होने के कारण यहां की जमीनों का सबसे ज्यादा बंदरबांट हो रहा है।
सांसद प्रतिनिधि ने की थी सिफारिश
सहरिया लोगों की आड़ में जो भूमाफिया ने लाखों रुपये का मुआवजा डकार लिया है, उसकी सिफारिश भारतीय जनता पार्टी की केंद्रीय स्वच्छता व पेयजल मंत्री व क्षेत्रीय सांसद उमा भारती के प्रतिनिधि और भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष प्रदीप चौबे के द्वारा अपने लेटर पैड पर की गई है। डोंगरा कलां के इन सहरियाओं हबू, भागीरथ समेत नंदकिशोर व चिनू से मुआवजे की मांग को लेकर केंद्रीय मंत्री व क्षेत्रीय सांसद उमा भारती के नाम एक प्रार्थना पत्र दिलाया गया। इसी के क्रम में सांसद प्रतिनिधि ने सिंचाई निर्माण खंड द्वितीय के अधिशासी अभियंता को पत्र भेजकर उनको मुआवजा दिलाने की सिफारिश की है। यह सिफारिश खाली नहीं गई, लेकिन गरीब सहारिया समुदाय के लोगों को मिलने वाला मुआवजा भूमाफिया डकार गए। दिलचस्प बात यह है कि सिफारिश के लिए जो पत्र दिलाया गया है, इसमें भी समान भाषा है। सभी ने जल्द से जल्द मुआवजा पाने के लिए अपनी बेटी की शादी का कारण बताया है। गौरतलब है कि यह भूमाफिया व दबंग भारतीय जनता पार्टी से भी ताल्लुक रखता है।
भूमाफिया नहीं किसानों के लिए की थी सिफारिश
किसानों ने केंद्रीय मंत्री व सांसद उमा भारती से मुआवजा दिलाने की मांग की थी। मैनें किसानों के प्रार्थना पत्र पर मुआवजा दिलाने के सिफारिश की है, जो जनता का प्रतिनिधि होने के नाते मेरा कर्तव्य है। यदि इसकी आड़ में भूमाफिया ने लाभ लिया है तो मामले की जांच कराकर आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई भी होनी चाहिए।
- प्रदीप चौबे, सांसद प्रतिनिधि।