छह जुलाई को प्रीतम बेड से नीचे गिर गया और उसके सिर पर चोट आ गई। सिर से खून नहीं आया। बच्चे को लेकर वह पहले मेडिकल कालेज पहुंचे। वहां से उसे पीजीआई रेफर कर दिया गया। डॉक्टरों ने उसे बचाने का प्रयास किया। मगर सफलता नहीं मिली। सोमवार को पीजीआई ने ब्रेन डेड घोषित किया। पैरेंट्स चाहते थे कि इस दुनिया से जाने से पहले यदि उसके अंग किसी के काम आते हैं तो वह इसके लिए तैयार हैं।
ऐसे किया गया ट्रांसप्लांट
पीजीआई के रीनल ट्रांसप्लांट सर्जरी के एचओडी डॉ. आशीष शर्मा ने बताया कि जब उन्हें सूचना मिली तो सबसे पहले उनके दिमाग में यह बात आई कि उसे ब्रेन डेड कैसे सर्टिफाइड करेंगे। क्योंकि इससे पहले उन्होंने इतनी कम उम्र के बच्चे के अंग ट्रांसप्लांट नहीं किए थे। इस बारे में पीडियाट्रिक न्यूरोलाजिस्ट से संपर्क किया गया। उन्होंने तुरंत एक टीम बनाई। छह-छह घंटे के अंतराल टीम ने बच्चे को दो बार ब्रेन डेड घोषित किया, ताकि कोई गुंजाइश न रहे। उसके बाद डॉ. दीपेश व डॉ. सर्वप्रीत के नेतृत्व में 15 लोगों की टीम गठित हुई। करीब 11 घंटे में बच्चे की किडनी निकालकर ट्रांसप्लांट कर दी गई।
भगवान का नाम लेकर किया ऑपरेशन
डॉ. आशीष ने बताया कि ब्रेन डेड घोषित होने के बाद जब बच्चा आया तो उसकी हालत काफी खराब हो गई थी। सिर्फ हार्ट चल रहा था। पल्स ढूढ़ने पर भी नहीं मिल रही थी। जब उसकी किडनी निकाली तो उसका साइज देखकर एक बार लगा कि क्या संभव हो सकेगा। आमतौर पर किडनी का साइज 10-12 सेंटीमीटर के बीच होता है, जबकि प्रीतम की किडनी का साइज मात्र पांच सेंटीमीटर था। फिर भगवान का नाम लिया और ट्रांसप्लांट शुरू कर दिया।
जिसमें किडनी ट्रांसप्लांट हुई, उसकी स्थिति ठीक नहीं थी
डॉक्टरों ने बताया कि जिस महिला में किडनी ट्रांसप्लांट की गई है, उसकी स्थिति ठीक नहीं थी। उसका पति उसे छोड़ गया था। ट्रांसप्लांट के लिए जो रुपये खर्च होने थे, उसके लिए रुपये नहीं थे। उसे हैपेटाइटिस का इंफेक्शन था। डाक्टरों ने इसके लिए एक संस्था से संपर्क किया। उसके बाद संस्था रुपये के लिए राजी हो गई और उसका ट्रांसप्लांट भी हो गया।
डोनर फैमिली के साथ मेरी पूरी संवेदनाएं हैं। बच्चे की फैमिली ने जो साहस दिखाया है, उसके लिए उन्हें मेरा सलाम। समाज के सामने एक मिसाल भी पेश की है। ट्रांसप्लांट करने वाली पीजीआई टीम को बधाई। -प्रो. जगतराम, डायरेक्टर पीजीआई
बच्चे के माता-पिता पहले से ही आर्गन डोनेशन के बारे में अवेयर थे। वे अंगों के महत्व को जानते थे, इसलिए खुद से वे आगे आए। इस साल यह हमारा 20वां आर्गन डोनेशन है।