छत्तीसगढ़ में बिलासपुर के गोंडपारा इलाके के इस घर में अगर आप आंखें बंद करके पहुंचें तो आपको लगेगा कि आप आठवीं शताब्दी में हैं।
आप कुछ पूछें उससे पहले ही संस्कृत में एक वाक्य कान से टकराता है, "तानि भ्रमात्मकानि स्थलानि अधुना अवलोकयाम।"
सामने से कोई आठ-नौ साल का बच्चा इसी अंदाज़ में उस वाक्य को लेकर संस्कृत में ही जवाब देता है।
संस्कृत के संवाद वाला यह घर डॉक्टर पुष्पा दीक्षित का है, जहां जीवन की भाषा संस्कृत है।
अमेरिका से छत्तीसगढ़ का सफर
अमरीका में पढ़ाई कर रही शमिनाज़ ख़ान को जब अपने प्रोफेसर शैलेन पॉलक के बारे में पता चला कि वे हॉवर्ड से संस्कृत पढ़ कर लौटे हैं तो उनके मन में भी संस्कृत पढ़ने की इच्छा जागी।
एक दिन अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर वह छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में संस्कृत पढ़ने चली आईं। इन दिनों वह दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में संस्कृत में ही पीएचडी कर रही हैं।
देश के अलग-अलग हिस्सों से बिलासपुर आकर संस्कृत पढ़ने वाले लोगों की संख्या सैकड़ों में है और इन्हें संस्कृत पढ़ाती हैं 72 साल की पुष्पा दीक्षित।
संस्कृत अध्ययन के सूत्र
सरकारी कॉलेज में संस्कृत पढ़ाते हुए पुष्पा दीक्षित ने पाणिनी, सिद्धांत कौमुदी और आर्य प्रणाली से संस्कृत व्याकरण को लेकर कोई तीन दशकों तक शोध किया।
और आख़िर पाणिनीय व्याकरण को इस तरह से सूत्रबद्ध किया कि कोई भी तीन महीने में ठीक-ठीक संस्कृत को जान-समझ सके।
बारह साल पहले उन्होंने अपने घर में ही पाणिनी शोध संस्थान की स्थापना की थी।
गुरुकुल की तरह संस्कृत सीखने वाले उनके घर में ही रहते और संस्कृत सीखते। यह सिलसिला आज भी जारी है।
संवाद की भाषा
पाणिनी शोध संस्थान में अभी 20 बच्चे एक साथ रहते हैं। इसके अलावा शौकिया तौर पर संस्कृत सीखने वाले हर शाम इकट्ठा हो जाते हैं।
पुष्पा दीक्षित रात में फ़ोन पर भी संस्कृत के पाठ पढ़ाती हैं।
पुष्पा दीक्षित कहती हैं, "देश-विदेश के अलग-अलग हिस्सों से, अलग-अलग जाति-धर्म के बच्चे और युवा हमारे साथ रहकर संस्कृत सीखते पढ़ते हैं। मैं चाहती हूं कि देश में कम से कम एक फीसदी लोग संस्कृत को जानें और दूसरे लोग संस्कृत को मानें।"