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सबसे कठिन चुनाव से गुजर रहे हैं रमन!

Wed, 06 Nov 2013 07:09 AM IST
सुदीप ठाकुर/ अमर उजाला, राजनांदगांव
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पांच वर्ष पहले राजनांदगांव ही नहीं, पूरे छत्तीसगढ़ में भाजपा के पास सिर्फ एक चेहरा था और वह थे खुद मुख्यमंत्री रमन सिंह। 2008 के विधानसभा चुनावों से ऐन कुछ महीने पहले शुरू की गई दो रुपये किलो चावल देने की उनकी योजना कुछ इस तरह रंग लाई कि आयुर्वेद चिकित्सक रमन 'डाक्टर साहब' से 'चाऊर वाले बाबा' बन गए!
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इन पांच वर्षों में बहुत कुछ बदल गया है, खुद उन्हें भी विकास का नया नारा तलाशना पड़ा है और नई रणनीति भी। हालांकि खुद डॉ रमन ऐसा नहीं मानते। अमर उजाला से बात करते हुए वे कहते हैं कि हमने देश को पहला खाद्य सुरक्षा कानून दिया है और यह सिर्फ खाद्य सुरक्षा तक सीमित नहीं है, इसमें पौष्टिकता भी जुड़ी है।

दस वर्ष के कार्यकाल की उनके पास लंबी फेहरिस्त है। मगर छत्तीसगढ़ दो ही कारणों से जाना गया, एक रमन की सार्वजनिक वितरण प्रणाली के कारण और दूसरा माओवादी हिंसा के कारण। हालत यह है कि खुद रमन स्वीकार करते हैं कि दक्षिण बस्तर के उन इलाकों से सड़क मार्ग से गुजरने से वे बचते हैं, जहां 25 मई को माओवादियों ने कांग्रेस के काफिले पर हमला किया था। इस हमले में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, बस्तर के दिग्गज आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल सहित 30 लोग मारे गए थे, जिनमें राजनांदगांव के पूर्व विधायक उदय मुदलियार भी थे।
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कांग्रेस ने उदय की पत्नी अलका मुदलियार को उम्मीदवार बनाया है, लिहाजा यहां चुनाव कांग्रेस के लिए भावनात्मक मुद्दा बन गया है। दरअसल इस चुनावी लड़ाई को 'विकास बनाम शहादत' की शक्ल दे दी गई है। जिसकी तस्दीक पूरे शहर में लगे होर्डिंग करते हैं। दिलचस्प है कि पूरे शहर में सिर्फ दो तरह के ही होर्डिंग्स नजर आ रहे हैं और ये दोनों आसपास लगे हुए हैं। एक कांग्रेस का, जिसमें उदय की तस्वीर के साथ अलका की तस्वीर है और लिखा हुआ है, 'मैं आपके सपने पूरे करूंगी।' तो भाजपा के होर्डिंग में रमन की तस्वीर के साथ विकास का वादा है।

शहर से पांच किमी दूर विधानसभा के हरदी ग्राम के एक शिक्षक कहते हैं, 'विकास तो हुआ है, मगर यह गुणवत्ताविहीन विकास है।' असल में जिस शिवनाथ नदी को पारकर उन्हें अपने स्कूल तक पहुंचना होता है, उस पर बने नए पुल को जोड़ने वाली सड़क पहली बारिश में ही बह गई! कांग्रेसी मेयर नरेश डाकलिया तो सीधे तोहमत लगाते हैं कि विकास के नाम पर सिर्फ भ्रष्टाचार ही हो रहा है। जाहिर है, यह एक राजनीतिक बयान है।

कांग्रेस का भी हाल यह है कि अलका यह लड़ाई अपने बेटे जीतेंद्र और उदय के खास रहे लोगों के साथ अकेले ही लड़ रही हैं। उनसे जब पूछा गया कि इस तरह चुनाव लड़ने का फैसला आपके लिए भारी रहा होगा...? कुछ देर खामोश रहने के बाद वे भरे शब्दों में कहती हैं, 'मुश्किल जरूर था, लेकिन बीते चार विधानसभा चुनावों में मैं उदय भैया के साथ ही थी।'

इसमें दो राय नहीं कि बीते पांच वर्षों में शहर की तस्वीर बदल गई है, रिंग रोड, गौरव पथ, एस्ट्रोटर्फ स्टेडियम, एग्रीकल्चर-हार्टीकल्चर कॉलेज, स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी और चुनाव से ऐन पहले मेडिकल कॉलेज की घोषणा। मगर यह तस्वीर का दूसरा पहलू है, पहला यह कि शहर के बीचोंबीच से गुजरने वाला मुंबई से कोलकाता को जोड़ने वाले नेशनल हाईवे पर बने तकरीबन तीन किमी लंबे ओवर ब्रिज ने शहर को अक्षरशः दो हिस्सों में बांट दिया है! मोतीपुर, चिखली, रविदास नगर या शंकरपुर जैसी निचली बस्तियों में ही नहीं, मुख्य चौराहे मानव मंदिर से जाने वाली हर सड़क बदहाल नजर आती है। इस सबके बावजूद लोग यह नहीं भूलते कि रमन सिंह उनके मुख्यमंत्री हैं।

पिछले विधानसभा चुनाव में उदय मुदलियार को रमन सिंह ने 32 हजार से कुछ अधिक मतों से पराजित किया था। उससे पहले 2003 में उदय यहां से महज 40 मतों से चुनाव जीत पाए थे। जीरम घाटी में हुए नक्सली हमलों के बाद चर्चा थी कि रमन सिंह अपनी सीट बदल सकते हैं। सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रहने वाले व्यवसायी संजय अग्रवाल कहते हैं, 'यदि रमन मुख्यमंत्री नहीं होते, तो यह मुकाबला कुछ और होता।'

वर्ष 1999 में जब अविभाजित मध्य प्रदेश की राजनांदगांव लोकसभा सीट से कांग्रेस ने मोतीलाल वोरा को अपना उम्मीदवार बनाया था, तब भाजपा के सामने मुश्किल थी कि वह किसे उम्मीदवार बनाए। तब जिला स्तर पर भी अपेक्षाकृत कम कद के डॉ रमन सिंह को यह चुनौती स्वीकार करने के लिए आगे किया गया था। आगे की कहानी इतिहास बन चुकी है।

संजय दिलचस्प जानकारी देते हैं, 1990 के बाद से राजनांदगांव में कोई भी विधायक दोबारा नहीं चुना गया। तो क्या यह मिथक इस बार टूटने वाला है? कई अखबारों से जुड़े रहे स्थानीय वरिष्ठ पत्रकार होल्कर बंछोर कहते हैं, 'ऐसा तो नहीं है कि वे हार जाएंगे, हां मार्जिन जरूर कम हो सकता है।' दरअसल रमन सिंह के लिए वाकई यही सबसे बड़ी चुनौती है। वाकई मुख्यमंत्री बनने के बाद वे अपने राजनीतिक जीवन के सबसे कठिन चुनाव से गुजर रहे हैं।
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