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Korba: 211 करोड़ की लागत से बने दीपका ओसीपी सीएचपी-साइलो का प्रधानमंत्री मोदी ने किया वर्चुअल उदघाटन

Sat, 24 Feb 2024 06:43 PM IST
Digvijay Singh अमर उजाला नेटवर्क, कोरबा

सार

कोरबा में साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड दीपका माइंस में 211 करोड़ की लागत से बने ओसीपी सीएचपी-साइलो का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्चुअल उदघाटन किया। बता दें कि दीपका खदान एसईसीएल के तीन मेगा प्रोजेक्ट्स में से एक है। 
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पीएम नरेंद्र मोदी - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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कोरबा में साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड दीपका माइंस में 211करोड़ की लागत से बने ओसीपी सीएचपी-साइलो का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्चुअल उदघाटन किया। बता दे कि दीपका खदान एसईसीएल के तीन मेगा प्रोजेक्ट्स में से एक है और देश की सबसे बड़ी कोयला खदानों में शामिल है, वर्तमान में खदान की क्षमता लगभग 40 मिलियन टन है एवं भविष्य में खदान की क्षमता में और वृद्धि करने की योजना है। इसे ध्यान में रखते हुए दूर खदान से कोयला परिवहन को और सुदृढ़ करने के उद्देश्य से दीपका ओसीपी सीएचपी साइलो एफएमसी परियोजना का निर्माण किया गया है।

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बंकर, कन्वेयर बेल्ट, साइलो तथा रैपिड लोडिंग सिस्टम से लैस इस एफएमसी परियोजना की लागत लगभग 211 करोड़ रुपए है एवं इससे सालाना 25 मिलियन टन कोयला मैकेनाइज्ड तरीके से बिजली संयन्त्रों सहित विभिन्न उद्योगों को भेजा जा सकेगा। दीपका ओसीपी सीएचपी साइलो, एसईसीएल दीपका मेगा प्रोजेक्ट में स्थित है जिसकी क्षमता 25 मिलियन टन प्रति वर्ष और नई परियोजना की लागत 211.22 करोड़ रुपये है।
 

ओवरग्राउंड बंकर क्षमता: 20,000 टन कन्वेयर बेस्ट की लंबाई: 1.86 किमी बताई गई है। उक्त परियोजना में साइलो की संख्या दो है जिसमें साइलो की क्षमता 3.000 टन आरएलएस की लोडिंग क्षमता 4500-8500 टन प्रति घंटा होगी। परियोजना के निर्माण चरण के दौरान हर दिन और 250 लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया तथा परियोजना के चालू हो जाने पर हर दिन 100 लोगों को रोजगार मिलेगा।

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उद्घाटन के अवसर पर पहुंचे दीपका एरिया के महाप्रबंधक अमित सक्सेना पत्रकारों से चर्चा के दौरान कहा कि अब तक उनके पास 15 मिलियन टन का ही साईलों था 40 मिलियन टन खदान की क्षमता होने की वजह से 25 मिलियन टन क्षमता वाली साईलों का निर्माण हो गया है आगामी समय में इस साईलों से प्रदूषण रहित कोल् ट्रांसपोर्टिंग की सुविधा मिल सकेगी वही सड़क मार्ग से होने वाले कोयला परिवहन पर भी दबाव कम होगा जिससे प्रदूषण पर काफी हद तक अंकुश लग सकेगा।

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