भले ही नक्सली वारदातें अब भी सामने आती रहती हों, मगर बस्तर में पिछले दो दशकों के मुकाबले हिंसा घटी है। सख्त सुरक्षा उपायों के समानांतर खामोशी से घटी ‘सांस्कृतिक क्रांति’ ने भी इलाके में नक्सली हिंसा कम करने में अहम भूमिका निभाई है। भीतरी इलाकों में घूमते हुए इस तथ्य को गहराई से महसूस किया जा सकता है।
जिला मुख्यालय जगदलपुर देश के किसी भी आम शहर जैसा ही लगता है। औसत से बेहतर सड़कें, उन पर दौड़ती छोटी-बड़ी तमाम गाड़ियां, विभिन्न शोरूमों में मौजूद ब्रांडेड कपड़े और दूसरे जरूरत के सामान इसे भारत के नक्शे का एक आम शहर बनाते हैं, हालांकि जिला मुख्यालय से 30-40 किलोमीटर आगे सुकमा और बीजापुर जैसे उन इलाकों, जिन्हें नक्सल प्रभावित कहा जाता है, आगे बढ़िए तो भी हालात बहुत भिन्न नहीं है।
जिले में हो रहे सामाजिक बदलावों पर नजर रखने वाले महेश लूनिया कहते हैं, 20-25 साल पहले इलाके में आए टीवी और मोबाइल ने सब बदल दिया है। सास-बहू की साजिश रंग ला चुकी है। इलाके की लड़कियों को एकता कपूर के सीरियलों का ऐसा चस्का लगा कि नक्सलियों की वर्ग संघर्ष की बात बेमानी लगने लगी। घर में भात न हो तो चलेगा, टीवी-मोबाइल जरूर चाहिए। कस्बों में गली-गली कुकुरमुत्ते की तरह उगे ब्यूटी पार्लर उनकी इस बात की तस्दीक करते हैं।
हाथ में मोबाइल, हर घर में टीवी
नक्सल प्रभावित इन इलाकों के लिए विपन्नता का जो अक्स दूर बैठकर जेहन में उभरता है, तस्वीर उससे अलग है। हर हाथ में मोबाइल, बहुतायत में दोपहिया वाहन और घरों में टीवी सामान्य बात है। सामान्य से रेस्त्रां के मीनू कार्ड में अगर आपको वर्जिन मोजैटो, किवी डिलाइट और लैमन सरप्राइज जैसी डिश दिख जाएं तो आश्चर्य करने की जरूरत नहीं है। लोगों की स्थानीय बोली हावी जरूर है, मगर मानसिकता किसी भी आम कस्बाई नागरिक से भिन्न नहीं।
आदर्शवादी नहीं रहे नक्सली
पत्रकार देव सरन तिवारी नक्सली हिंसा कम होने का एक और कारण गिनाते हैं। वह कहते हैं, सर्वहारा क्रांति की बात करने वाले नक्सली अब इतने आदर्शवादी नहीं रह गए हैं। उन्हें पता है कि अफसरशाही उनका डर दिखाकर सरकार को किस कदर लूट रही है। दुनिया को भले लगे कि मदारी, भालू को पाल रहा है, मगर हकीकत में मदारी को पता होता है कि भालू उसे पाल रहा है। अगर कहीं यह बात भालू को समझ आ जाए तो मदारी की दुकान बंद होना तय है। यही बस्तर में हुआ है। नक्सलियों को अफसरों की कारगुजारियां समझ में आ गई हैं। अब वह सरकारी इमदाद में अपना हिस्सा मांगने लगे हैं। मजबूरी में अफसरों को अपनी लूट कम करनी पड़ी है, जिसके नतीजे में सरकारी योजनाओं का लाभ गरीबों तक पहुंचा है।