वे गूगल के माध्यम से इस क्षेत्र की जानकारी इकट्ठा कर रही थीं तब उन्हें यहां की संस्कृति, बाजार, मेले-मड़ाई के अलावा अतिरिक्त नक्सलवाद से संबंधित जानकारी भी मिली। पांडिचेरी के स्थानीय लोगों से जब बस्तर जाने की बात कही तो अधिकांश लोगों ने उन्हें बस्तर ना जाने व गलत भ्रामक जानकारी भी दी। इसी मध्य उन्हें बस्तर ट्राइबल होमस्टे के विषय में भी पता चला तो उन्होंने शकील रिजवी से संपर्क किया। शकील ने विस्तारपूर्वक बस्तर के संबंध में जानकारी उपलब्ध कराई और उन्हें बस्तर आने का न्योता दिया। सभी सैलानी 22 जनवरी को बस्तर पहुंचे। बस्तर के करपावण्ड ग्राम का मेला, तीरथगढ़, चित्रकोट, दरभा और नानगुर का बाजार, एंथ्रोपोलॉजी म्यूजियम के साथ स्थानीय कलाकार महेश सागर से मिलने भी पहुंचे।
बस्तर ट्राइबल होमस्टे में रहकर उन्होंने स्थानीय भोजन का आनंद लिया। कांगेर वेली स्थित गुड़ियापदर व बामनारास में गोंड व धुरवा जनजाति समाज की जीवनशैली व नृत्य को देखा और उसे बेहद सराहा भी। बस्तर की लाल चींटी की चटनी का भी आनंद लिया। 26 जनवरी को सैलानियों के द्वारा नियानार माध्यमिक विद्यालय में जाकर गणतन्त्र दिवस के कायक्रम को देखा और बच्चों का उत्साहवर्धन किया और बस्तर कला गुड़ी में तमन्ना जैन और उनके छात्रों से मिलकर बस्तर पेंटिंग भी देखी। सभी सैलानियों का यह मानना था कि भारत का यह क्षेत्र नितांत ऐसा क्षेत्र है, जहां न केवल संस्कृति, कला और शानदार जीवन शैली है, बल्कि वनों से आच्छादित यह क्षेत्र सुंदर जल प्रपात, पशु पक्षियों से परिपूर्ण है। यहां का पारिस्थितिक तंत्र बेहद नाजुक है और इसे सहेजने की भी आवश्यकता है।