फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Exclusive: वीर नारायण सिंह का नाम सुनकर कांपते थे अंग्रेज; 1856 की लड़ाई में जान बचाकर भागी थी अंग्रेजी सेना

सार

Veer Narayan singh Biography: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में छत्तीसगढ़ के योगदान को भूलाया नहीं जा सकता। इस प्रदेश के महान और प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर नारायण सिंह का नाम आजादी के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से अंकित है। उन्होंने देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 के एक साल पहले सन 1856 में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई का बिगुल फूंक दिया था।
विज्ञापन
शहीद वीर नारायण सिंह की प्रतिमा - फोटो : Amar Ujala Digital
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

Veer Narayan singh Biography: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में छत्तीसगढ़ के योगदान को भूलाया नहीं जा सकता। इस प्रदेश के महान और प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर नारायण सिंह का नाम आजादी के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से अंकित है। उन्होंने देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 के एक साल पहले सन् 1856 में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई का बिगुल फूंका था। अंग्रेजी सेना के खिलाफ आजादी की लड़ाई का शंखनाद किया था। उनका नाम सुनकर बड़े-बड़े अंग्रेज अधिकारी भी कांपते थे। स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में उन्होंने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिये थे। बाद में आजादी के इस मसीहा ने गरीब जनता की जान बचाने के लिये खुद को कुर्बान कर दिया। आजादी की लड़ाई में उनकी शहादत को भूलाया नहीं जा सकता। 

विज्ञापन







जान बचाकर भागी अंग्रेजी सेना
अंग्रेजी सेना वीर नारायण सिंह को पकड़ने के लिये बार-बार सोनाखान में धावा बोलती रही। जैसे ही अंग्रेजों को पता चला कि वीर नारायण सिंह कुरुपाठ की पहाड़ी में हैं, तो वहां पर धावा बोल दिया। इस बीच अंग्रेजी सेना और नारायण सिंह के बीच भीषण युद्ध हुआ। नारायण सिंह ने अकेले ही शौर्य पराक्रम दिखाते हुए अंग्रेजी सेना को कुरुपाठ से मार भगाया। लड़ाई के मैदान से अंग्रेजी सेना भाग खड़ी हुई। कई सैनिकों की मौत से अंग्रेजी हुकूमत हिल गई। उन्होंने गौरिल्ला युद्ध नीति का प्रयोग कर के अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था। अंग्रेज उन्हें जान से मारने या कैद करने के लिये अपनी पूरी ताकत लगा दी। इसके बाद भी वो अंग्रेजों के कब्जे से बाहर रहे। जब अंग्रेज नारायण सिंह को पकड़ नहीं पाये, तो बौखलाकर सोनाखान की गरीब जनता पर कहर ढाना शुरू कर दिया। जनता के ऊपर अनगिनत जुल्म किये गये। जमकर शारीरिक यातनायें दी गईं। अंग्रेजी कूटनीति और पड़ाड़ी से उतरकर गद्दार एक साथी से चर्चा के दौरान अंग्रेजों ने नारायण सिंह को धोखे से गिरफ्तार कर लिया और रायपुर की जेल में कैद कर दिया। 


गोदाम से अनाज निकाल कर गरीबों में बांटी
छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध इतिहासकार आचार्य रमेंद्रनाथ मिश्र ने अमर उजाला खास बातचीत कहा कि भारतीय इतिहास में 1857 की क्रांति से लेकर 1947 तक का जो समय है, वह राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास के रूप में अंकित है। सन् 1857 की क्रांति जब शुरू हुई तो उसके पहले साल 1856 सोनाखान क्षेत्र में (वर्तमान में बलौदाबाजार जिला) अकाल पड़ा था। जनता भूख से तड़प रही थी। दाने-दाने को मोहताज थी। अपने क्षेत्र के लोगों का इतना बुरा हाल उनसे देखा नहीं गया। उस दौरान वीर नारायण सिंह ने व्यापारियों और जमाखोर साहूकारों से कहा कि भूख से तड़प रही जनता को अनाज बांट दो। किसान फसल के बाद ब्याज समेत वापस कर देंगे, लेकिन अंग्रेजों के वफादार व्यापारियों और साहूकारों ने उनकी एक न सुनी। ऐसे में उन्होंने जितनी जरूरत थी, उतना ही अनाज गोदाम से निकाल कर भूख से तड़प रही जनता को बांट दिए। अपनी कोठी से भी अनाज निकालकर गरीबों में बांट दिये। अंग्रेजों के पिट्ठू व्यापारियों को मौका मिल गया और खरौद या आस-पास के लोगों ने अंग्रेजों से मामले की शिकायत कर दी। अंग्रेजी सरकार ने इस घटना को डकैती करार दिया। 
विज्ञापन



 Read More: Exclusive: ब्रिटिश काल में ऐसा था अपना छत्तीसगढ़; 'सीपी बरार' के नाम से था मशहूर, इन राजाओं ने किया था शासन






जंग से नहीं, कूटनीति से किया गिरफ्तार
इतिहासकार आचार्य मिश्र ने कहा कि अंग्रेज भी मौके की तलाश में थे। 24 अक्टूबर 1856 को नारायण सिंह को संभलपुर के रास्ते जाते हुए गिरफ्तार कर लिया और 1854 में बनी रायपुर जेल में लाकर कैद कर दिया। वर्ष 1854 में अंग्रेजी राज स्थापित हुआ, क्योंकि 1853 में रघुजी भोसले की मृत्यु के बाद लॉर्ड डलहौजी की हड़प नीति की वजह से नागपुर को अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया गया। छत्तीसगढ़ उस समय एक जिला था। वर्तमान में रायपुर का जो मोतीबाग और शास्त्री बाजार है। वहां पर बैजनाथ तालाब हुआ करता था। बैजनाथ तालाब के बाजू में ही 1857 की जेल थी। इसी जेल में वीर नारायण सिंह को कैदी बनाकर रखा गया था, जहां पर उन्हें शारीरिक यातनायें दी जाती थी। बाद में मुकदमा का नाटक चला। 9 दिसंबर 1857 को उन्हें फांसी देने के लिये अंग्रेज अधिकारियों ने पत्र जारी किया। उस समय रात हो गई थी। ऐसी स्थिति में दूसरे दिन 10 दिसंबर 1857 को इस जेल के आस-पास सार्वजनिक रूप से जनता और सैनिकों के सामने फांसी दे दी गई। जेल के सामने चारों तरफ खाली मैदान था। माना जाता है कि इसी के आस-पास की एरिया में उन्हें फांसी दी गई। उन्हें सार्वजनिक रूप से इसलिये फांसी दी गई ताकि लोगों में अंग्रेजों को लेकर खौफ बनी रहे और कोई बगावत न कर सके। इसी के साथ ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर हनुमान सिंह को भी पकड़ने की कोशिश की गई पर अंग्रेज सफल नहीं हो पाये। 18 जनवरी 1858 को उनके 17 साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया फिर 22 जनवरी 1858 को
इसी जेल के आस-पास सबको फांसी दे दी गई।








जय स्तंभ चौक पर नहीं, जेल के पास दी गई थी फांसी
रायपुर के जय स्तंभ चौक के पास वीर नारायण सिंह को फांसी देने की अफवाहों पर मिश्र ने कहा कि उस समय तो चौक बना ही नहीं था, तो फांसी देने का सवाल ही नहीं है। मध्य प्रदेश के जनसंपर्क विभाग के अधिकारी संतोष शुक्ल ने इस बात को लिखा है, उनसे जब हमने भोपाल में सवाल किया तो उन्होंने कहा कि सुनी-सुनाई बातों के आधार पर मैंने ये लिखा था। मेरे पास कोई तथ्य या प्रमाण नहीं है कि जय स्तंभ चौक के पास ही वीर नारायण सिंह को फांसी दी गई थी। बात जय स्तंभ चौक की करें तो 15 अगस्त 1947 के दिन ही आजादी की स्मृति में इसे बनाया गया था, क्योंकि यहीं पर आजादी का जश्न मना था। पूरे प्रदेश में होली और दीपावली जैसा माहौल था। 


Read More: Raipur: छायाचित्र प्रदर्शनी में दिख रही छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम की झलक; बड़ी संख्या में पहुंच रहे लोग
विज्ञापन








थर-थर कांपता था अंग्रेज अधिकारी स्मिथ
उन्होंने कहा कि नारायण सिंह ने आखिरी दम तक अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया था। 28 अगस्त 1857 को ब्रिटिश सेना में कार्यरत भारतीयों और स्थानीय लोगों ने वीर नारायण सिंह को जेल से मुक्त करवाकर अपना नेता मान लिया। जनसमर्थन मिलने पर उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिये 500 लोगों की एक बंदूकधारी सेना की टुकड़ी बनाई और तीन तरफ से घेराबंदी की। वे एक घोड़े पर सवार रहते थे, जिसका नाम कबरा था। कुरुपाठ की दुर्गम पहाड़ियों को अपनी लड़ाई का केंद्र बिंदु बनाया। यहीं पर वे अंग्रेजों पर विजय पाने के लिये दंतेश्वरी माता की पूजा किया करते थे। जेल से छुटने के कुछ दिनों बाद ही अंग्रेजी कूटनीति के तहत दोबारा गिरफ्तार कर लिया गया। उन्होंने कोशिश जरूर कि थी कि अंग्रेजों के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ें। अंग्रेज अधिकारी स्मिथ ने लिखा था कि कुरुपाठ की पहाड़ियों पर वो अपने कुल देवी की पूजा करने के लिये रात में पहाड़ी से मशाल लेकर उतरते-चढ़ते थे। जब अंग्रेज अधिकारी ने उन्हें देखा तो वह रातभर सो नहीं पाया। जब अंग्रेज लड़ाई में उनसे जीत नहीं पाये, तो गरीबों के घर जला दिये। गांव में आग लगा दी। वीर नारायण की समर्थित जनता पर घोर अत्याचार करने लगे। गरीब जनता पर अत्याचार होते देख उनकी जान बचाने के लिये उन्होंने अपने आप को कुर्बान कर दिया। 


35 की उम्र में संभाली जमींदारी
उनका जन्म बलौदाबाजार जिले के कसडोल विकासखंड के सोनाखान में 1795 में एक जमींदार परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम राम राय था। उनके पूर्वजों के पास 300 गांवों की जमींदारी थी। वह बिंझवार जनजाति के थे। पिता की मृत्यु के बाद 35 वर्ष की उम्र में वीर नारायण सिंह ने जमींदारी संभाली। उनके पिता भी अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल चुके थे। ऐसे में वीर नारायण सिंह का स्थानीय लोगों से गहरा लगाव था। 


तोप से नहीं उड़ाया, फांसी दी गई थी
फांसी देने के बाद उनके शव को तोप से बांधकर उड़ाने के सवाल पर इतिहासकार मिश्र ने कहा कि यह बात पूरी तरह से अफवाह और सुनी-सुनाई बातों पर आधारित है। इसका कोई एतिहासिक तथ्य और प्रमाण नहीं हैं। उन्हें तोप से नहीं उड़ाया गया था बल्कि 10 दिसंबर 1857 को रायपुर की जेल के आस-पास फांसी दी गई थी। वर्ष 1987 में उनकी 130वीं बरसी पर भारत सरकार ने 60 पैसे का डाक टिकट जारी करने और टिकट में तोप से उड़ाते हुए उनका फोटो दिखाये जाने के सवाल पर कहा कि इसका भी कोई एतिहासिक साक्ष्य नहीं है। कुछ गलत इतिहासकारों की वजह से ऐसा हुआ है। इस संबंध में उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को खत लिखा था ताकि डाक टिकट में सुधार किया जा सके पर अभी तक ऐसा नहीं हुआ। यह एक सच्चे वीर सपूत का अपमान है। 

उनके नाम पर हैं ये भवन
छत्तीसगढ़ सरकार आदिवासी उत्थान के लिए हर साल शहीद वीर नारायण सिंह सम्मान देती है। वहीं वर्ष 2008 में रायपुर में उनके नाम पर शहीद वीर नारायण सिंह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम परसदा और वर्ष 2025 में नवा रायपुर में शहीद वीर नारायण सिंह आदिवासी डिजिटल म्यूजियम बनाकर सम्मान दिया गया है। उनकी शहादत की याद में सोनाखान में हर साल तीन दिन का वीर मेला भी आयोजित किया जाता है। 

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें