फड़ पर तेंदूपत्ता बेचने के लिए पहुंचे ग्रामीण।
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छत्तीसगढ़ के गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (GPM) जिले में तेंदूपत्ता संग्राहकों से 'सड़ा' टैक्स वसूला जा रहा है। इसके तहत लघुवनोपज संघ के प्रभारियों और मुंशियों को पांच प्रतिशत देना होता है। यानि की 100 बंडल लाने पर इसमें से पांच मुंशी के होंगे। इसकी कोई एंट्री भी नहीं की जाती है। खास बात यह है कि ग्रामीण इसे 40 सालों से भी ज्यादा समय से देते आ रहे हैं। मुंशियों का कहना है कि, ग्रामीण इसे स्वेच्छा से देते हैं। हालांकि अधिकारी इसे गैरकानूनी बताते हैं कि, लेकिन रोकने के सवाल पर जांच की बात कही जाती है।
वसूलेंगे 1050 बोरे अतिरिक्त
दरअसल, छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से तेंदूपत्ता खरीदी शुरू हो चुकी है। इसके लिए राज्य सरकार ने चार हजार रुपये प्रति बोरा और 400 रुपये प्रति बंडल संग्रहरण की दर निर्धारित की है। इसके बाद GPM जिले के मरवाही वन मंडल की ओर से 22000 मानक बोरा खरीदी का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। ऐसे में इन बोरों की खरीदी पर सरा (सड़ा) टैक्स के आधार पर 1050 बोरे अतिरिक्त लिए जाएंगे। पेंड्रा के विभिन्न गांवों में तेंदूपत्ता फड़ में खरीदी की जा ही है, पर यहां भी 100 बंडल पर पांच वसूले जा रहे हैं।
पहले ही बंडल में 10-12 पत्ते रखते हैं अतिरिक्त
ग्रामीण बताते हैं कि दिन निकलने से पहले वे जंगलों में तेंदूपत्ता संग्रहण करने चले जाते हैं। कड़ी धूप में संग्रह करने के बाद इन पत्तों को घर लाया जाता है। जहां परिवार मिलकर 50-50 पत्तों का बंडल तैयार करता है। परेशानी से बचने के लिए ग्रामीण हर बंडल में 10-12 पत्ते अधिक ही रखते हैं। आरोप है कि इसके बाद भी उनसे हर बंडल पर वसूली की जाती है। इसमें मुंशी का हिस्सा होता है। पिछले वर्षों की तुलना में इस साल बारिश और ओलों के कारण काफी नुकसान हुआ है। जिससे पहले की तरह पत्ते नहीं मिल पाए हैं।
छत्तीसगढ़ में तेंदूपत्ता ग्रामीण आय का प्रमुख साधन
छत्तीसगढ़ में ग्रामीणों की आय के प्रमुख साधनों में से एक तेंदूपत्ता संग्रहण भी है। वर्षों से इस वनोपज का संग्रहण ग्रामीण करते रहे हैं। जिसे कभी ठेकेदारी प्रथा में खरीदी की जाती थी, पर अब वन विभाग और जिला लघु वनोपज संघ अपनी समितियों के माध्यम से करता है। खरीदी का उद्देश्य तेंदूपत्ता खरीदी में गड़बड़ी को दूर करना और ग्रामीणों को उसके सही दाम दिलाना है। इसके चलते ठेकेदारी प्रथा तो बंद हो गई, लेकिन ग्रामीणों से ठगी और लूटने की प्रथा जरूर जारी है।