महज तीस दिन के भीतर सीआरपीएफ के दो जांबाज ग्राउंड कमांडर शहीद हो गए। दोनों घटना, सुकमा जिले में हुई हैं। खास बात है कि आईईडी ब्लास्ट की दोनों घटनाएं उस वक्त हुईं, जब सीआरपीएफ की कोबरा (कमांडो बटालियन फॉर रेजोल्यूट एक्शन) इकाई नक्सलियों के गढ़ में नए कैंप स्थापित करने वाले मार्ग की तरफ बढ़ रही थी। विद्रोहियों और आंतकियों के साथ, विशेषकर गुरिल्ला/जंगल वॉरफेयर जैसे ऑपरेशन में कठोर कार्यवाही करने के लिए कोबरा का नाम विश्व के सर्वश्रेष्ठ बलों में शामिल है।
रविवार रात, कोबरा 208वीं बटालियन के डिप्टी कमांडेंट विकास सिंघल आईईडी ब्लास्ट की चपेट में आने के बाद शहीद हो गए। ऑपरेशन से जुड़े सीआरपीएफ के एक सीनियर अफसर ने खुलासा किया है कि छत्तीसगढ़ सरकार की श्रेय लेने की होड़ सीआरपीएफ पर भारी पड़ रही है। सरकार नक्सलियों के गढ़ में स्थापित होने वाले पांच कैंपों की जानकारी विज्ञापन के जरिए दे रही है। अभी बहुत काम बाकी है, लेकिन सरकार ने पहले ही जानकारी लीक कर दी।
इसके अलावा स्थानीय पुलिस की भूमिका को लेकर भी सीआरपीएफ कमांडरों में गुस्सा है। जहां कोबरा एक्सपर्ट कहते हैं कि कैंप यहां स्थापित करना सुरक्षित रहेगा, उसे जिला पुलिस कप्तान बदल देते हैं। आखिर में खामियाजा सीआरपीएफ को भुगतना पड़ता है। सीआरपीएफ अधिकारी के अनुसार, उस वक्त सुरक्षा को लेकर मजाक हो रहा है, जब देश का सबसे बड़ा केंद्रीय अर्धसैनिक बल, नक्सलवाद को खत्म करने के बहुत करीब है।
पिछले माह 206वीं कोबरा बटालियन के सहायक कमांडेंट 33 वर्षीय नितिन पी भालेराव आईईडी ब्लास्ट में शहीद हो गए थे। अब उसके आसपास ही डिप्टी कमांडेंट विकास सिंघल को शहादत देनी पड़ी। छत्तीसगढ़ सरकार को यह मालूम है कि नक्सल क्षेत्र में नए कैंप स्थापित करने को लेकर नक्सली बौखलाए हुए हैं। इसके बावजूद सरकार ने अपनी पीठ थपथपाने के लिए दक्षिण बस्तर के सभी पांच कैंपों की जानकारी सार्वजनिक कर दी।
अब नक्सली उन सभी कैंपों के रास्ते में आईईडी बिछा रहे हैं। बेहतर होता कि जब सभी कैंप सुरक्षा के साथ स्थापित हो जाते तो उस वक्त सरकार उनका श्रेय ले लेती। पहले ही उन कैंपों के बारे में इतना प्रचार कर दिया गया कि वह सीआरपीएफ पर भारी पड़ने लगा है। नक्सलियों को सारी जानकारी आसानी से मिल रही है।
डिप्टी कमांडेंट विकास सिंघल के साथ ड्यूटी दे चुके एक अधिकारी बताते हैं कि अगर नक्सल क्षेत्र की सारी जिम्मेदारी सीआरपीएफ को दे दी जाए तो बहुत कम समय में नक्सलियों को खत्म किया जा सकता है। स्थानीय पुलिस के निर्णय ठीक नहीं होते। उन्हें जो भी इनपुट मिलता है, वह थाना स्तर तक पहुंचते-पहुंचते लोगों के व्हाट्सएप पर दौड़ने लगता है। कई बड़े प्लान लीक हो जाते हैं। हम उनके सहयोग के लिए हैं, न कि उनकी कमांड में ऑपरेशन करने के लिए हैं।
ताजा हमले कैंप स्थापित करने की वजह से हो रहे हैं। आरोप है कि पिछले दिनों सीआरपीएफ ने पलौदी कैंप को कसाराम नाले पर स्थापित करने के लिए कहा था, लेकिन सुकमा के एसपी अभिषेक ने कहा, कैंप पलौदी में ही रहेगा। अगर हमले की घटना पुलिस के साथ हो जाती तो कई लोगों को सस्पेंड होना पड़ता। अब सीआरपीएफ का कमांडर शहीद हो गया तो कोई भी यह जांच नहीं करेगा कि सूचना कहां से लीक हो रही है। पिछले माह जिस ऑपरेशन में नितिन पी भालेराव मारे गए थे, तब भी ऑपरेशन लीक होने की बात सामने आई थी।
नक्सल प्रभावित क्षेत्र सुकमा, द्रोणापाल, बीजापुर और कोंटा आदि इलाकों में एयर एंबुलेंस की सुविधा नहीं है। घने जंगलों में स्थित सीआरपीएफ कैंप में रात के समय में हेलीकॉप्टर नहीं उतर सकता। इस बाबत एक डीआईजी का कहना है, अनेक घटनाओं में देखा गया है कि घायल जवान या अफसर समय पर बेहतर इलाज न मिल पाने के कारण दम तोड़ देता है। इतने वर्षों बाद भी इस इलाके में रात के समय हेलीकॉप्टर उतरने की सुविधा क्यों नहीं है।
सीआरपीएफ को कम से कम उन इलाकों के लिए अपनी एयरविंग दे दी जाए, जहां पर लगातार आतंकी या नक्सल विरोधी ऑपरेशन चलते रहते हैं। सीआरपीएफ के पूर्व आईजी एसएस संधू बताते हैं कि ये पुरानी मांग है। चॉपर तो कई साल पहले ही मुहैया करा देने चाहिए थे। आईईडी ब्लास्ट में घायल होने के बाद अगर समय रहते उन्हें बेहतर इलाज की सुविधा मिल जाए तो उनकी जान बचने का चांस बना रहता है।