छत्तीसगढ़ के दुर्ग ज़िले के एक गांव में नौ साल की बच्ची से बलात्कार के अभियुक्त युवक को गांव के लोगों ने पीट-पीट कर मार डाला।
प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि गांव में पहुंची पुलिस ने युवक को बचाने की कोशिश की लेकिन आक्रोशित भीड़ ने पुलिस के कब्जे में भी युवक को पीटा।
दुर्ग के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक प्रशांत ठाकुर का कहना है कि बलात्कार के अभियुक्त युवक की पिटाई से मौत के मामले में अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया है।
फिलहाल पूरे मामले की जांच की जा रही है। पुलिस ने बच्ची के साथ बलात्कार का भी मामला दर्ज किया है।
स्कूल से लौट रही थी बच्ची
पुलिस ने बताया कि गुरुवार की दोपहर दुर्ग ज़िले के ढौर गांव में 9 साल की बच्ची स्कूल से लौट रही थी।
आरोप है कि इसी बीच गांव के 35 साल के युवक परसराम ठाकुर ने उसे रोका और पास के खेत में उसके साथ बलात्कार किया।
पीड़ित बच्ची ने घर आ कर घटना की जानकारी अपने परिजनों को दी।
इसके बाद गांव वालों ने मिल कर परसराम ठाकुर को पकड़ा और घटना के बारे में उससे पूछताछ की।
जब युवक ने अपना अपराध कबूल कर लिया तो गांव के लोगों ने उसकी पिटाई शुरू कर दी।
देर से पहुंची पुलिस
गांव की सरपंच रौशनी मिश्रा का कहना है कि बच्ची के साथ बलात्कार की घटना की खबर पुलिस को दोपहर में ही दे दी गई थी लेकिन पुलिस शाम को गांव पहुंची।
गांव वालों के गिरफ्त में आए अभियुक्त युवक ने भागने की कोशिश की तो आक्रोशित ग्रामीणों ने युवक को गांव की गलियों में दौड़ा-दौड़ा कर पीटा।
दुर्ग के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक प्रशांत ठाकुर के अनुसार- “पुलिस जब गांव में पहुंची तब भी गांव के आक्रोशित लोग उसकी पिटाई कर रहे थे। किसी तरह भीड़ से उसे छुड़ा कर अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।”
इस घटना के बाद गांव में तनाव का माहौल है और गांव में पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।
नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में हर दिन बलात्कार की औसतन तीन घटनाएं सामने आती हैं।
अपराध में दूसरे नंबर पर
2011 में राज्य में बलात्कार के 1,053 मामले सामने आए थे, जबकि 2012 में यह आंकड़ा 2,034 था।
छत्तीसगढ़ का दुर्ग पूरे देश में बलात्कार के अपराध दर के मामले में दूसरे नंबर पर है। यहां यह दर 13.50 है।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर देश में बलात्कार के मामले में पांचवें नंबर पर है। यहां इस अपराध की दर 11.76 है।
राज्य में महिला अधिकार और कानून को लेकर काम करने वाली सत्यभामा अवस्थी का कहना है कि इस तरह से कानून को हाथ में लेकर कोई फैसला करना अमानवीय और क्रूर है। लेकिन ऐसी स्थिति क्यों आई, इस पर विचार करने की ज़रूरत है।
वे कहती हैं- “यह पूरी घटना हमारी कानूनी और सामाजिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है। लेकिन दिक्कत यह है कि इस तरह से घटित होने वाली हर घटना को थाने में दर्ज कर के सरकार मुक्त हो जाती है। ऐसी स्थितियों पर हमें नए सिरे से विचार करने की ज़रूरत है।”