पोटाकेबिन और आश्रम छात्रावासों में पसरा सन्नाटा
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बीजापुर में नया शिक्षा सत्र 16 जून से शुरू हो चुका है, पर बीजापुर जिले के ट्राइबल आश्रमों और पोटाकेबिनों में सन्नाटा पसरा है। शासन की तमाम योजनाएं और अधिकारियों के निर्देश कागज़ों तक सिमटकर रह गए हैं। करीब 28 हजार नामांकित छात्र अभी भी आश्रमों और छात्रावासों से दूर हैं, जबकि उपस्थिति 10% से भी नीचे दर्ज की गई है। जिले में 137 ट्राइबल आश्रम शालाएं, 51 आश्रम छात्रावास और 34 पोटाकेबिन संचालित हैं, जिनकी क्षमता 28 हजार छात्रों के लिए है। जिले में लगभग 60 हजार बच्चें पढ़ाई करते है जिसमें ज्यादातर बच्चे आवासीय विद्यालय से आते है बावजूद इसके संस्थान खाली हैं और शिक्षा की शुरुआत अधर में लटकी है।
भोजन शुरू, बच्चे गायब –आखिर क्यों?
आश्रमों में 16 जून से भोजन व्यवस्था (मेश) शुरू हो चुकी है। फिर सवाल उठता है कि जब भोजन की व्यवस्था समय पर शुरू हो सकती है, तो छात्र अब तक क्यों नहीं पहुंचे?
प्रशासनिक सुस्ती बनी बड़ी वजह
सूत्रों की मानें तो बच्चों को 16 जून से आश्रमों में लाया जाना था, ताकि सत्र के साथ पढ़ाई भी शुरू हो सके। लेकिन न तो मंडल संयोजकों ने ज़िम्मेदारी निभाई, न ही बीआरसी स्तर पर पोटाकेबिनों की निगरानी हुई। जिला प्रशासन के निर्देश जारी करने के बावजूद भी यह स्थिति रही।
अफसरों के बयान जुदा
डीएमसी कमल झाड़ी का कहना है कि सभी अधीक्षकों को निर्देशित किया गया है और 1 जुलाई तक छात्र उपस्थित होंगे। वहीं जिला शिक्षा अधिकारी एल.एल. धानेलिया का बयान है कि मेश 1 जुलाई से ही प्रभावशील होती है, इसीलिए छात्रों को लाने में दिक्कत हो रही है।
बड़ा सवाल: शिक्षा सत्र शुरू, लेकिन तैयारी नदारद?
जब शिक्षा सत्र 16 जून से प्रारंभ हो गया, तो छात्रों को अब तक क्यों नहीं बुलाया गया?
जब मेश का बजट जारी हो चुका है, तो आवास में देरी क्यों? क्या यह स्थिति शासन के शिक्षा को प्राथमिकता देने के दावों पर सवाल नहीं खड़ा करती?
बच्चों का भविष्य खतरे में
स्थिति न केवल शैक्षणिक गुणवत्ता को प्रभावित कर रही है, बल्कि बच्चों के भविष्य पर भी प्रश्नचिह्न खड़े कर रही है। यदि जल्द ही सुधार नहीं हुआ, तो इसका प्रभाव आगामी परीक्षाओं और परिणामों में देखने को मिलेगा और इसकी कीमत बच्चे चुकाएंगे।