Bastar Lok Sabha Election 2024: बस्तर लोकसभा सीट छत्तीसगढ़ की महत्वपूर्ण सीटों में से एक मानी जाती है। वर्ष 1951 से पहले लोकसभा चुनाव से लेकर वर्ष 1996 तक यह कांग्रेस की परंपरागत सीट हुआ करती थी, लेकिन साल 1996 में पहली बार यहां के लोगों ने निर्दलीय प्रत्याशी को चुना। वर्ष 1998 से लेकर 2014 तक इस सीट पर बीजेपी का कब्जा रहा। यह सीट अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित है।
बस्तर लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे
साल 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के दीपक बैज ने बीजेपी के बैदूराम कश्यप को कड़ी टक्कर देते हुए हराया था। बैदूराम कश्यप को 38 हजार 982 हजार वोटों से हराया था। दीपक बैज को 4 लाख 2 हजार 527 वोट यानी 44 फीसदी वोट मिले थे जबकि बैदूराम कश्यप को 3 लाख 63 हजार 545 यानी 40 फीसदी वोट मिले थे। तीसरे नंबर पर सीपीआई के रामू राम थे। रामू को महज 38 हजार 395 वोट मिले थे।
बस्तर लोकसभा चुनाव 2014 का परिणाम
वर्ष 2014 में हुए चुनाव में करीब 12 लाख 98083 मतदाता थे। BJP प्रत्याशी दिनेश कश्यप ने कुल 3 लाख 85 हजार 829 वोट हासिल कर बाजी मारी थी। उन्हें 50।11 प्रतिशत वोट मिले थे। दूसरे नंबर पर कांग्रेस उम्मीदवार दीपक कर्मा (बंटी), को 2 लाख 61 हजार 470 वोट मिले थे। कुल वोटों का 33.96 प्रतिशत था। इस सीट पर जीत का अंतर 1 लाख 24 हजार 359 था।
बस्तर लोकसभा चुनाव 2009 का परिणाम
साल 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में 11 लाख 93 हजार 116 मतदाता थे। उस समय बीजेपी उम्मीदवार बलिराम कश्यप ने 2 लाख 49 हजार 373 वोट पाकर जीत दर्ज की थी। उन्हें कुल 44.16 प्रतिशत वोट मिले थे। दूसरे स्थान पर कांग्रेस उम्मीदवार शंकर सोढ़ी थे, जिन्हें 1 लाख 49 हजार 111 वोट मिले थे। कुल वोटों का 26.4 प्रतिशत था।
जातीय समीकरण
बस्तर की राजनीति में भतरा और गोंड समुदायों का प्रभाव रहा है। हल्बा और अन्य आदिवासी जातियों की मौजूदगी भी है, लेकिन मुख्य रूप से पूरी राजनीति भतरा आदिवासियों के इर्द गिर्द ही घूमती रहती है। बस्तर के संभागीय मुख्यालय जगदलपुर और इसके आसपास के इलाके में भतरा जनजाति का निवास है। भानपुरी के बलीराम कश्यप का परिवार भी इसी समुदाय से हैं। हालांकि आदिवासियों के बीच राजनीतिक विभाजन नहीं है पर चुनाव के दौरान समाज को साधना जरूरी हो जाता है। बस्तर में हल्बी, भतरी, गोंडी, दोरली, परजी, धुरवी आदि बोलियां बोली जाती हैं। बीजापुर, सुकमा, दंतेवाड़ा और अबूझमाड़ चारों जगह की गोंडी में फर्क है। दोरली बीजापुर और सुकमा के उन इलाकों में बोली जाती है, जो आंध्र या तेलंगाना से सटे हैं। इन जातियों के साधने पर ही यहां से जीत संभव हो पाता है।
निर्दलीय मुचाकी कोसा का रिकॉर्ड बरकरार
बस्तर लोकसभा सीट पर अब तक की सबसे बड़ी जीत पहले चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार मुचाकी कोसा की रही है। राजमहल समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी मुचाकी कोसा को वर्ष 1952 के चुनाव में कुल विधिमान्य मतों में से 83.05 प्रतिशत मत मिले थे, जबकि उनके प्रतिद्वंदी कांग्रेस के सुरती क्रिस्टैया को मात्र 16.95 प्रतिशत वोट मिले थे। मुचाकी कोसा को 1 लाख 77 हजार 588 मत और सुरती क्रिस्टा को 36 हजार 257 वोट मिले थे। मुचाकी ने 1 लाख 41 हजार 331 मत और 66.09 फीसद के भारी अंतर से जीत हासिल की थी। विधिमान्य मतों में एकतरफा रिकॉर्ड 83.05 मत आज तक कोई प्राप्त नहीं कर सका है।
बस्तर का इतिहास
आदिवासी बहुल बस्तर जिला छत्तीसगढ़ एक नक्सल प्रभावित क्षेत्र है। करीब 70 प्रतिशत जनसंख्या जनजातीय समुदाय की है। इस समाज की एक बड़ी आबादी आज भी घने जंगलों में रहती है। ये समुदाय अपनी संस्कृति, कला, पर्व और सहज जीवन शैली के लिए प्रख्यात है। बस्तर को ‘छत्तीसगढ़ का कश्मीर’ भी कहा जाता है। बस्तर घने जंगलों, ऊंची पहाड़ियों, झरनों, गुफाओं से भरा हुआ है। अपनी मनमोहक खूबसूरती से यह सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। नक्सलवाद की वजह से बस्तर कई दशकों से सुर्खियों में रहा है। 14वीं सदी में यहां पर काकतीय वंश का राज था। इस क्षेत्र पर अंग्रेज कभी अपना राज स्थापित नहीं कर पाए। आजादी के पहले बस्तर राजघराने की राजधानी थी। शुरुआत के दो दशक तक बस्तर की राजनीति में राजमहल का प्रभाव रहा। बस्तर राजशाही वाला इलाका रहा है। महाराजा स्वर्गीय प्रवीरचंद भंजदेव के इशारे पर चुनाव में जीत-हार तय होती थी। उन्हें तब मां दंतेश्वरी के माटी पुजारी और आदिवासियों के भगवान के नाम से भी जाना जाता था। बस्तर लोकसभा सीट का मुख्यालय जगदलपुर है।