आलोचक दीपांजना पाल ने लेखक शोवन चौधरी के संग उनकी किताब ‘द कंपीटेंट अथॉरिटी’ (अलफ बुक कंपनी) पर परिचर्चा की, तो विवेक, हास्य, जोश, ज्ञात-अज्ञात, भूत, वर्तमान और भविष्य सब कुछ एक साथ मंच पर नजर आने लगे।
यह ऐसा उपन्यास है जिसको लिखने में शोवन चौधरी ने ग्यारह साल लगाए। होटल ताज में आयोजित चंडीगढ़ लिटरेचर फेस्टिवल- 2013 के तीसरे दिन दूसरे सत्र में श्रोताओं को एक ऐसे आतंक के साम्राज्य में ले जाया गया जो अभी भी विद्यमान है।
कंपीटेंट अथॉरिटी सिविल सर्विसेस ऑफ इंडिया के प्रमुख हैं। नई दिल्ली से कामकाज संचालित करते हैं। वे एक सनकी और बड़े महत्वाकांक्षी विचारों वाले हैं। वे व्यवस्थाओं के प्रभारी हैं।
देश आखिरी जंग के बाद पुनर्गठित हो रहा है, जो भारत के बड़े हिस्से को लील गया। अमीर मृत डैड सर्कल में रहते हैं और संसाधनहीन या विद्रोही शांति नगर में। अफवाह फैलती है कि वे लोग बीमार और नाखुश विद्रोही हैं।
उपन्यास की एक तस्वीर दिखाते हुए उन्होंने कहा, ‘जब-जब शांति नगर में कोई शारीरिक अंग बदलवाता है तो वहां दानी नजर आते हैं।’ यह उपन्यास एक कटाक्ष है।
इसके माध्यम से व्यवस्था को दिखाया गया है। देश की राजनीतिक व्यवस्था के लिए, कठपुतली राजनीति, सांप्रदायिकता, आतंकवाद, झगड़े, निजीकरण, बाबूगिरी, ऑर्गन हारवेस्टिंग आदि उपन्यास के अंग हैं।
वे कहते हैं उन्हें कई बार हैरानी होती है कि सरकारी सरकुलरों पर कंपीटेंट अथॉरिटी के हस्ताक्षर वाला कोई असल व्यक्ति है भी? कोई नाम नहीं, कोई दल नहीं, कोई रंग नहीं... पर बेनाम का खौफ है।
इसमें दो कहानियां हैं जो समानांतर चलती हैं पर आपस में जुड़ी भी हुई हैं। लेखक ने कहा कि ‘मैंने इस उपन्यास को छह बार लिखा और उसे फिर संशोधित किया।